राष्ट्रमंडल खेलों के बाद अब एशियाड भी समाप्त हो गया। भारत को इस बार छठा स्थान प्राप्त हुआ। इस बार भी कई ऐसे खिलाडिय़ों ने भारत को गौरवांवित कराया, जिन्हें देश तो क्या उनके मोहल्ले के लोग ही नहीं जानते थे। अब साबित हो गया है कि राष्ट्रमंडल खेलों में मिली सफलता कोई तुक्का नहीं थी और न ही यह इसलिए मिली कि खिलाड़ी अपनी जमीन पर खेल रहे थे। कुल मिलाकर उन्होंने कड़ी मेहनत की और अच्छा प्रदर्शन किया जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें सफलता मिली।
राष्टमंडल खेलों की समाप्ति पर कई विशेषज्ञ इस बात पर चिंता जाहिर कर रहे थे कि क्या इतनी जल्दी हमारे खिलाड़ी फिर से अपने आप को तैयार करके वैसा ही प्रदर्शन दोहरा पाएंगे जैसा उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में किया। खिलाडिय़ों ने हाल के दिनों में अपने आप को मिले दो मौकों पर साबित कर दिया है और आगे भी अगर मौका मिलेगा तो वे किसी से पीछे नहीं रहेंगे और साबित कर देंगे। अब सरकार की बारी है कि वह इन नये सितारों को दिश दे जिससे यह और ऊंचाईयों को छू सकें।
मुझे लगता है अब क्रिकेट क्रिकेट का शोर बंद होना चाहिए। क्रिकेट के अलावा और भी खेल हैं। खास बात यह है कि ये खेल क्रिकेट जितना समय भी नहीं लेते और खिलाड़ी जीतकर भी दिखाते हैं। अब क्रिकेट के लिए पूरा दिन बर्बाद करने से कोई लाभ नहीं। हमें चीन की ओर देखना चाहिए, जो दो सौ स्वर्ण जीतने के करीब था। वह क्रिकेट नहीं खेलता। हम क्रिकेट में विश्व विजेता रहे लेकिन अन्य खेलों में कुछ नहीं कर पाए। अब जबकि नई पीढ़ी क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में रुचि ले रही है तो हमें उनका उत्साहवद्र्धन करना चाहिए। अगले कुछ समय में जनसंख्या के मामले में हम चीन को पीछे छोड़ देंगे। क्या यही एक क्षेत्र है जिसमें हम चीन को पछाड़ सकते हैं। हमारे युवा खिलाडिय़ों ने साबित कर दिया है कि बिना किसी खास टे्रनिंग के भी वे पदक जीत सकते हैं अगर उन्हें थोड़ा सा संबल मिल जाए तो वे और भी कमाल कर सकते हैं। हालांकि, हम लोग दिल्ली और दोहा को पीछे छोड़कर खुश हैं पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी तो यह आगाज है अब भारत सबकी निगाहों में आ गया है और अब असल परीक्षा शुरू होगी। शिखर पर पहुंचना आसान है लेकिन उसे कायम रखना मुश्किल होता है। अब यही मुश्किल काम हमें करना होगा।
मीडिया को भी इसमें अहम रोल अदा करना है। राष्ट्रमंडल खेल चूंकि दिल्ली में ही हो रहे थे, सो पदक जीतते ही मीडिया उन्हें अपने स्टूडियो में बुला रहा था। एक बारगी तो ऐसा लगा कि हर चैनल में होड़ सी है कि कौन सा चैनल पहले विजेताओं से बात करे। अब जबकि एशियन गेम्स के चैम्पियन आएंगे तो उनका स्वागत कैसे होता है। कौन चैनल विजेता के घर तक की स्थिति का जायजा लेता है। यह देखना होगा।
अक्सर क्रिकेट के अलावा किसी खेल में जीत के बाद कुछ देर तो हम उसे याद रखते हैं और फिर देखने लगते हैं क्रिकेट। अब इसमें बदलाव आना चाहिए। 1983 का विश्वकप जीतने के बाद देश में क्रिकेट क्रांति आई थी। हर बच्चा क्रिकेटर बनना चाहता था। उसी का परिणाम है कि आज क्रिकेट में हम नम्बर वन हैं। अब जबकि जिमनास्टिक में भी देश का नाम रोशन हो चुका है तो बच्चों और युवाओं के साथ-साथ उनके अभिभावकों को भी सोचना चाहिए कि उनका बच्चा क्रिकेट में 13 खिलाड़ी बन कर रहे या रेस में सबसे आगे आए। अब उन क्रिकेटरों से दूरी जरूरी है जो आराम करने के लिए समय तब मांगते हैं जब न्यूजीलैंड जैसी टीम हमारे घर में ही खेल रही है। उन्हें तब आराम की दरकार नहीं होती जब आईपीएल चल रहा होता है। आईपीएल में आराम न करने की वजह सब जानते हैं। अगर कोई क्रिकेटर वाकई देश के लिए खेलता है तो फिर आईपीएल से आराम ले ना कि किसी एक दिवसीय या टेस्ट शृंखला में। यह बदलाव का दौर है और मुझे यकीन है कि बदलाव खेल में भी आएगा...
रविवार, नवंबर 28, 2010
शुक्रवार, नवंबर 19, 2010
यह संक्रमण काल है!
बहुत मुश्किल है। समझ नहीं आ रहा है कि क्या करूं। इधर कई बार कुछ लिखने की कोशिश की लेकिन जब तक एक विषय पर लिखने का मन बनाया तब तक कोई दूसरी घटना हो जाती, जो पहली से बड़ी लगती। जब तक उस पर सोचा तब तक उससे बड़ी बात हो जाती। यही करते-करते एक माह से अधिक बीत गया। अब लगने लगा है कि जिस तरह खबरों का सिलसिला लगातार जारी रहता है और एंकर बाद में कह जाता है कि आप देखते रहिए उसी तरह आप देश को और उसकी हालात को देखते रहिए। आपके टीवी बंद कर देने से यह क्रम टूटेगा नहीं।
इस देश की क्या हालत हो गई है। किस पर भरोसा करूं। देश भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुका है। अभी बहुत समय नहीं बीता जब राजनीति बहुत नेक पेशा माना जाता था। बल्कि इसे तो पेशा माना ही नहीं जाता था। यह तो समाज सेवा का एक माध्यम था। इसमें भी बहुत समय नहीं बीता जब हर तरह के भ्रष्टाचार में, घपलों में, घोटालों में किसी न किसी नेता की ही संलिप्तता पाई जाने लगी। इसके बाद नेता का मतलब बहुत ही तुच्छ व्यक्ति हो गया। लोग नेता शब्द से ही घृणा करने लगे। जब भी किसी बड़ी परीक्षा के परिणाम आते और उनमें विजयी हुए प्रतिभागियों से पूछा जाता, तो वे सब कुछ बनना चाहते हैं, लेकिन नेता नहीं। नेता शब्द कितना बदनाम हो चुका है इस उदाहरण से यह आसानी से समझा जा सकता है। अब सवाल यह है कि किस-किस से घृणा कीजिएगा, क्या-क्या नहीं बनिएगा। सब तो एक ही जैसे हैं। जीवन में कुछ करना है तो कुछ तो करना ही पड़ेगा।
गौर करें तो पाएंगे कि बोफोर्स को छोड़ दें तो मुझे याद नहीं पड़ता कि इतने बड़े घोटाले में किसी प्रधानमंत्री का नाम सामने आया हो। मंत्री ही अपने स्तर पर इससे निपट लेते थे। लेकिन, अब एक बार फिर प्रधानमंत्री जैसा पद दागदार हो गया है। भले वे पाक साफ हों पर उनकी साफ सुथरी पोशाक पर 'कीचड़Ó के छीटे तो पड़ ही गए हैं। बाद में क्या होता है। यह बाद की बात है। अभी तक चाल, चरित्र और चेहरे की दुहाई देने वाले भाजपाई हालांकि समय समय पर अपना असली चेहरा उजागर करते आए हैं, लेकिन जब आप किसी पर अंगुली उठा रहे हो कम से कम उस समय तो आप पर कोई ऐसा आरोप न लगे, जिसके लिए आप दूसरे को घेर रहे हों। भाजपा कुछ-कुछ उसी तरह के घोटाले के लिए महाराष्ट्र में कांग्रेस को घेर रही थी, जैसा उनके मुख्यमंत्री ने कर्नाटक में कथित रूप से किया है। बड़ी हैरानी होती है।
अगर यह ढूंढऩे निकला जाए कि कौन से पेशे से जुड़ा व्यक्ति सही है तो मुझे नहीं लगता कि आपको किसी पेशे से जुड़ा व्यक्ति मिल पाएगा। हालांकि, यह बात सही है कि किसी एक व्यक्ति के भ्रष्ट हो जाने से कोई पेशा कलंकित नहीं हो जाता। लेकिन, कहीं न कहीं यह तो लगता ही है कि इस पेशे से जुड़ा व्यक्ति गलत काम में संलिप्त है। हमारी भारतीय संस्कृति में बाबा को बहुत मान और सम्मान दिया जाता है। दरअसल उन्हें भगवान का ही दूसरा रूप माना जाता है। लेकिन, बड़े-बड़े और नामी बाबाओं ने कैसे हमारी भक्ति और उम्मीदों पर तुषारापात किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। मैं यहां किसी बाबा का नाम नहीं लूंगा। क्योंकि, एक तो इससे उनके भक्तों को आघात लगेगा और दूसरा यह सूची बहुत लम्बी हो जाएगी। हमारे देश की पुलिस तो रिश्वत लेने , फर्जी एनकाउंटर करने और अन्य कई तरहों की हरकतों के कारण बहुत बदनाम हो चुकी है, लेकिन सेना को तो बहुत पूज्य माना जाता है। उन्हें हम अपना रक्षक मानते हैं। लेकिन, जब उन्हीं रक्षकों का सेनापति ही किसी भ्रष्टाचार में संलिप्त पाया जाता है तो क्या कह कर अपने मन को समझाइएगा। बात किस सेना प्रमुख की हो रही है और उन महाशय ने क्या किया है, मुझे नहीं लगता कि यह बताने और समझाने की जरूरत है।
बहुत दिनों तक यह मानता रहा कि कम से कम कोई पत्रकार किसी भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं पाया जाता। इसके कई कारण रहे। एक तो यह कि उसके ऊपर पहले से ही समाज के समाने सबकी कलई खोलने की जिम्मेदारी होती है वही अगर कुछ गलत करेगा तो किस मुंह से किसी को गलत कहेगा। मैं खुद इस पेशे में आया इसका अन्य कारणों के साथ-साथ शायद एक बड़ा कारण यह भी था। लेकिन, अभी हाल ही में देश के दो पत्रकारों ने कथित रूप से दलाली में शामिल होकर मेरी इस धारणा को भी चूर-चूर कर दिया। बड़ी बात यह रही कि ये दो वे नाम हैं, जिनका नाम बहुत सलीके और सम्मान के साथ लिया जाता है। बहुत से युवा पत्रकार उनसे मिलने, बात करने और उनके जैसा बनने का ही सपना संजाते रहते हैं। लेकिन, मुझे नहीं लगता कि अब कोई भी उनके जैसा बनने की सोचेगा भी। कम से कम जब तक वे पाक-साफ नहीं हो जाते तब तक तो कतई नहीं।
हालांकि, अंत में यह कह देना भी जरूरी है कि मैं बहुत आशवादी व्यक्ति हूं और यह मानता हूं कि परिवर्तन ही संसार का नियम है और जो आज है वह कल नहीं रहेगा। यह भी बदल जाएगा।
इस देश की क्या हालत हो गई है। किस पर भरोसा करूं। देश भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुका है। अभी बहुत समय नहीं बीता जब राजनीति बहुत नेक पेशा माना जाता था। बल्कि इसे तो पेशा माना ही नहीं जाता था। यह तो समाज सेवा का एक माध्यम था। इसमें भी बहुत समय नहीं बीता जब हर तरह के भ्रष्टाचार में, घपलों में, घोटालों में किसी न किसी नेता की ही संलिप्तता पाई जाने लगी। इसके बाद नेता का मतलब बहुत ही तुच्छ व्यक्ति हो गया। लोग नेता शब्द से ही घृणा करने लगे। जब भी किसी बड़ी परीक्षा के परिणाम आते और उनमें विजयी हुए प्रतिभागियों से पूछा जाता, तो वे सब कुछ बनना चाहते हैं, लेकिन नेता नहीं। नेता शब्द कितना बदनाम हो चुका है इस उदाहरण से यह आसानी से समझा जा सकता है। अब सवाल यह है कि किस-किस से घृणा कीजिएगा, क्या-क्या नहीं बनिएगा। सब तो एक ही जैसे हैं। जीवन में कुछ करना है तो कुछ तो करना ही पड़ेगा।
गौर करें तो पाएंगे कि बोफोर्स को छोड़ दें तो मुझे याद नहीं पड़ता कि इतने बड़े घोटाले में किसी प्रधानमंत्री का नाम सामने आया हो। मंत्री ही अपने स्तर पर इससे निपट लेते थे। लेकिन, अब एक बार फिर प्रधानमंत्री जैसा पद दागदार हो गया है। भले वे पाक साफ हों पर उनकी साफ सुथरी पोशाक पर 'कीचड़Ó के छीटे तो पड़ ही गए हैं। बाद में क्या होता है। यह बाद की बात है। अभी तक चाल, चरित्र और चेहरे की दुहाई देने वाले भाजपाई हालांकि समय समय पर अपना असली चेहरा उजागर करते आए हैं, लेकिन जब आप किसी पर अंगुली उठा रहे हो कम से कम उस समय तो आप पर कोई ऐसा आरोप न लगे, जिसके लिए आप दूसरे को घेर रहे हों। भाजपा कुछ-कुछ उसी तरह के घोटाले के लिए महाराष्ट्र में कांग्रेस को घेर रही थी, जैसा उनके मुख्यमंत्री ने कर्नाटक में कथित रूप से किया है। बड़ी हैरानी होती है।
अगर यह ढूंढऩे निकला जाए कि कौन से पेशे से जुड़ा व्यक्ति सही है तो मुझे नहीं लगता कि आपको किसी पेशे से जुड़ा व्यक्ति मिल पाएगा। हालांकि, यह बात सही है कि किसी एक व्यक्ति के भ्रष्ट हो जाने से कोई पेशा कलंकित नहीं हो जाता। लेकिन, कहीं न कहीं यह तो लगता ही है कि इस पेशे से जुड़ा व्यक्ति गलत काम में संलिप्त है। हमारी भारतीय संस्कृति में बाबा को बहुत मान और सम्मान दिया जाता है। दरअसल उन्हें भगवान का ही दूसरा रूप माना जाता है। लेकिन, बड़े-बड़े और नामी बाबाओं ने कैसे हमारी भक्ति और उम्मीदों पर तुषारापात किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। मैं यहां किसी बाबा का नाम नहीं लूंगा। क्योंकि, एक तो इससे उनके भक्तों को आघात लगेगा और दूसरा यह सूची बहुत लम्बी हो जाएगी। हमारे देश की पुलिस तो रिश्वत लेने , फर्जी एनकाउंटर करने और अन्य कई तरहों की हरकतों के कारण बहुत बदनाम हो चुकी है, लेकिन सेना को तो बहुत पूज्य माना जाता है। उन्हें हम अपना रक्षक मानते हैं। लेकिन, जब उन्हीं रक्षकों का सेनापति ही किसी भ्रष्टाचार में संलिप्त पाया जाता है तो क्या कह कर अपने मन को समझाइएगा। बात किस सेना प्रमुख की हो रही है और उन महाशय ने क्या किया है, मुझे नहीं लगता कि यह बताने और समझाने की जरूरत है।
बहुत दिनों तक यह मानता रहा कि कम से कम कोई पत्रकार किसी भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं पाया जाता। इसके कई कारण रहे। एक तो यह कि उसके ऊपर पहले से ही समाज के समाने सबकी कलई खोलने की जिम्मेदारी होती है वही अगर कुछ गलत करेगा तो किस मुंह से किसी को गलत कहेगा। मैं खुद इस पेशे में आया इसका अन्य कारणों के साथ-साथ शायद एक बड़ा कारण यह भी था। लेकिन, अभी हाल ही में देश के दो पत्रकारों ने कथित रूप से दलाली में शामिल होकर मेरी इस धारणा को भी चूर-चूर कर दिया। बड़ी बात यह रही कि ये दो वे नाम हैं, जिनका नाम बहुत सलीके और सम्मान के साथ लिया जाता है। बहुत से युवा पत्रकार उनसे मिलने, बात करने और उनके जैसा बनने का ही सपना संजाते रहते हैं। लेकिन, मुझे नहीं लगता कि अब कोई भी उनके जैसा बनने की सोचेगा भी। कम से कम जब तक वे पाक-साफ नहीं हो जाते तब तक तो कतई नहीं।
हालांकि, अंत में यह कह देना भी जरूरी है कि मैं बहुत आशवादी व्यक्ति हूं और यह मानता हूं कि परिवर्तन ही संसार का नियम है और जो आज है वह कल नहीं रहेगा। यह भी बदल जाएगा।
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रविवार, अक्टूबर 17, 2010
भारत और इंडिया के फर्क को समझिए

एक महिला ने दूसरी से कहा, तुम्हें पता है भारत और इंडिया में लड़ाई हो गई है? दूसरी ने कहा, इससे हमें क्या, हम तो हिन्दुस्तान में रहते हैं ना।
यह एक चुटकुला है, लेकिन कहीं न कहीं यह सच्चाई भी बयां करता है। इस पर जरा सोच कर देखिए। क्या भारत और इंडिया अलग-अलग हैं? क्या इन दोनों में अक्सर लड़ाई होती रहती है? दोनों के जवाब हां में ही हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स या फिर राष्ट्रमंडल खेलों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि हम वाकई ऐसी जगह रहते हैं, जहां दो देश बसते हैं। गौर कीजिएगा तो साफ पता चल ही जाएगा।
हाल ही में हमारे यहां विश्वस्तरीय खेल हुए। खेल मात्र दस दिन हुए, लेकिन इसकी तैयारियां सालों से हो रही थी। होनी भी चाहिए आखिर देश की प्रतिष्ठा का सवाल है। भाजपानीत राजग के शासनकाल में इन खेलों की मेजबानी की अनुमति मिली तो कांग्रेसनीत संप्रग शासनकाल में ये खेल सम्पन्न हुए। यानी दो धुर विरोधी दलों ने खेल के लिए एक मंच पर आकर बिना राजनीति के एक दूसरे का सहयोग किया। खेल का मामला ऐसा होता है कि जहां अक्सर कहा जाता है कि इसे राजनीति से अलग रखा जाए, लेकिन रखा नहीं जाता। राजनीति में अक्सर खेल होता रहता है और खेल में राजनीति। खैर यह बहस और चर्चा का दूसर विषय हो सकता है।
खेलों के दौरान देश के दो चेहरे देखने को मिले। एक चेहरा वह जिसने कॉमनवेल्थ गेम्स कराए और दूसरा वह जो राष्ट्रमंडल खेलों में भागीदारी कर रहे थे। जिन लोगों ने कॉमनवेल्थ गेम्स कराए उसने देश के कॉमन लोगों की वेल्थ पर जमकर डाका डाला। अनुमानित खर्च कितना था और कितना खर्च किया गया यह सभी को पता है, जो खर्च ज्यादा किया गया वह खर्च करने वालों ने अपनी जेब से नहीं किया, बल्कि आम आदमी की जेब से ही किया है। तैयारियां वर्षों से हो रही थीं, लेकिन खेल के ऐन वक्त तक काम जारी रहा। काम में विलम्ब इसलिए किया गया ताकि अंतिम समय पर अनाप-शनाप पैसा खर्च किया जाए और इसे देश की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाए। इस पर कोई बोलेगा नहीं। जो बोलेगा वह राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया जाएगा।
खेलों के दौरान दूसरा चेहरा उन लोगों का देखने को मिला, जो राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रहे थे। उन्होंने राष्ट्र के लिए कितने पद जीते और देश को किस मुकाम तक पहुंचाया। यह जगजाहिर है। जहां कॉमनवेल्थ के आयोजक वेल्थ बनाते रहे, वहीं राष्ट्रमंडल के प्रतिभागी राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाते रहे। यानी एक तो हिन्दी के खेल हुए दूसरे अंग्रेजी का खेल। पदक जीतने वालों में ज्यादातर खिलाड़ी भारत के थे बजाए इंडिया के।
एक खेल खत्म तो दूसर शुरू हो गया है। अब खेल हो रहा है खेलों के आयोजन की प्रशंसा पाने का। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक विजेताओं से मिल रहे हैं। क्या ये लोग कभी उन अखाड़ों में गए हैं, जहां से ये पदक विजेता निकले हैं। राहुल गांधी को लगता है कि दलित के घर जाकर उसकी खटिया पर बैठकर चार बातें कर लेने और उसकी रोटी खा लेने से ही उन्होंने असली भारत को देख लिया। क्या इन लोगों को उन लोगों की पीठ नहीं थपथपानी चाहिए जो मात्र कुछ अंतर से ही पदक जीतने से रह गए। उनमें नया जोश नई स्फूर्ति कौन भरेगा। क्या जीतने वालों को ही टीवी पर दिखने का हक है? उन लोगों के बारे में कौन सोचेगा जो हार गए। मीडिया भी उन्हीं के गुण गा रही है, जो जीते हैं। हारे हुए लोगों को फिर से नए सिरे से खड़ा करने का जिम्मा कौन उठाएगा? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगले ही महीने एशियाड होने हैं और अगर से विजेता किन्हीं कारणों से फिर से यही कारनामा नहीं दोहरा पाए तो जो कुछ अंतर से हारे हैं उन्हीं पर जीतने का दारोमदार होगा। अगर उन्हें अभी से तैयार नहीं किया गया तो क्या होगा? इंडिया की जयजयकार छोड़कर भारत की भी परवाह कीजिए नहीं तो...
बुधवार, अक्टूबर 06, 2010
थिंक बिफोर यू स्पीक
राहुल गांधी। इस समय कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं और युवा कांग्रेस की देखरेख की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री कहा जाता है, हालांकि उन्होंने कभी नहीं कहा कि वे प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। दरअसल वे कुछ और ही कह रहे हैं। वे कह रहे हैं कि संघ और सिमी एक ही थाली के चट्टे- बट्टे हैं। उन्हें दोनों में कोई फर्क दिखाई नहीं देता। उन्हें चमचागिरि और चापलूसी करने वाले लोग भी कतई पसंद नहीं। वे कहते हैं कि हर मर्ज की सिर्फ एक ही दवा है और वह है राजनीति।
अपने मध्य प्रदेश के दौरे के दौरान राहुल गांधी ने कई बातें कहीं। कुछ ऐसी जो कहनी चाहिए थी और कुछ ऐसी जो मेरे ख्याल से नहीं कहनी चाहिए। राहुल ने कहा कि उन्हें चाटुकार और चमचे पसंद नहीं हैं। मुझे नहीं पता कि ये राहुल के निजी विचार हैं या फिर पारिवारिक। राहुल को भले चाटुकार पसंद न हों पर उनकी मां को चाटुकार और चमचे ही पसंद हैं। अगर नहीं होते तो प्रतिभादेवी सिंह पाटिल आज देश की राष्ट्रपति नहीं होतीं। हो सकता है कि मेरी इस बात की जमकर आलोचना की जाए पर मैं जानना चाहता हूं कि प्रतिभादेवी सिंह पाटिल में ऐसी कौन सी खूबी है जो वह राष्ट्रपति के उम्मीदवार हो गईं। अगर महिला होने की वजह से उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया तो प्रधानमंत्री पद क्यों किसी पुरुष के सुपुर्द कर दिया गया। क्या पार्टी में कोई ऐसी योग्य महिला नहीं जो प्रधानमंत्री बन सके? या फिर ऐसी महिला नहीं जो सोनिया गांधी की बात को आंख पर पट्टी बांध कर मान ले। खुद के प्रधानमंत्री न बन पाने के बाद क्यों उन्होंने कठपुतली मनमोहन सिंह का चयन किया। क्या कांग्रेस में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो अपने दम पर लोकसभा चुनाव जीत सके और प्रधानमंत्री बन सके। दरअसल सोनिया अच्छी तरह जानती हैं कि जो नेता लोकसभा का चुनाव जीत सकता है उसका अपना अच्छा खासा जनाधार होता है। मनमोहन सिंह चूंकि लोकसभा से संसद में प्रवेश नहीं करते सो उनका जनाधार भी नहीं होगा। सोनिया सिर्फ उन्हीं लोगों को पद बख्श रहीं हैं जो उनके कहे पर चलें। वे कहेंं दिन तो दिन और कहें रात तो रात। ऐसे नामों में केवल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि कई नाम हैं। अगले लोकसभा चुनाव में जब राहुल प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे उससे पहले ही मनमोहन सिंह को राष्ट्रपित भवन भेजने की पूरी तैयारी अभी से की जा रही है। राहुल को पहले अपने घर से चमचागिरि खत्म करनी होगी तब वे कार्यकर्ताओं को चमचागिरी न करने का पाठ पढ़ाएं तो ज्यादा अच्छा होगा।
राहुल कहते हैं कि देश की हर समस्या की खात्मा तभी होगा जब युवा राजनीति में आएंगे। यानी हर मर्ज की एक ही दवा। राजनीति और सिर्फ राजनीति। कोई कम अक्ल का व्यक्ति भी यह बता सकता है कि कभी भी हर मर्ज की एक ही दवा नहीं हुआ करती। अगर देश का हर व्यक्ति राजनीति करने लगेगा तो बाकी के काम कौन करेगा, यह भी राहुल को तय करना होगा। केवल राजनीति से देश नहीं चला करता। राजनीति पेट नहीं भरती। वे युवाओं को देश की राजनीति में लाना चाहते हैं। पहले उन्हें अपनी पार्टी में युवाओं को स्थान देना होगा। पहले वे अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से अपनी मां को हटाकर किसी युवा नेता को इसकी जिम्मेदारी सौंपे और फिर किसी युवा को ही प्रधानमंत्री बनने की घोषणा करें। केवल युवा कांग्रेस को बदलकर देश की राजनीति नहीं बदली जा सकती। राहुल को यह बात भी समझनी होगी कि कहने और करने में बहुत फर्क होता है। देशभर में घूमने से, दलित के घर जाकर रोटी खाने से और उसके घर सोने से दलित को अच्छा तो लग सकता है, लेकिन इससे उसके पेट की भूख कम नहीं हो सकती। देश भूख है, कराह रहा है। इसके लिए राहुल के पास क्या दवा है? राजनीति। देश घूमकर उसकी समस्याओं को समझना एक बात है और उसकी समस्याओं का निराकरण करना दूसरी बात।
राहुल कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते। राहुल को चाहिए कि वे पहले अपनी पार्टी के उन नेताओं को यह कहने से मना करें, जो उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं। राहुल को यह पता है कि अगले लोकसभा चुनाव में अगर उनकी पार्टी को बहुमत मिला तो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार वही होंगे सो अभी से ढोल-ताशे क्यों पीटे जाएं। हालांकि भीतर ही भीतर इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। योजना तैयार की जा रही है।
मजे की बात यह रही कि राहुल यहीं तक नहीं रुके। बुधवार को तो उन्होंने गजब ही कर दिया। उन्होंने कह दिया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और सिमी में उन्हें कोई फर्क नजर नहीं आता। सवाल यह है कि क्या राहुल ने कभी निष्पक्ष भाव से दोनों में कोई फर्क देखने की चेष्टा की है। नहीं की होगी, क्योंकि उनकी आंखों पर एक तरह का चश्मा लगा है और उन्हें जो कुछ भी दिखता है। उस चश्मे से ही दिखता है। अगर निष्पक्ष भाव से देखते तो उन्हें पता चल जाता कि संघ और सिमी में क्या फर्क है। सिमी जहां एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन है, वहीं संघ भारत भूमि की आत्मा से जुड़ा हुआ संगठन है। राहुल को अगर देशप्रेमी और देशद्रोही संगठनों में कोई फर्क नजर नहीं आता तो कोई क्या कर सकता है। बस उनकी बुद्धि पर मुस्कराया ही जा सकता है। वे जिस देश की राजनीति में युवाओं को लाने की बात कह रहे हैं क्या वे उस देश को समझ पा रहे हैं। इतने दिनों से देश भ्रमण के बाद भी अगर राहुल ऐसी बातें करते हैं तो लगता है कि लोग उन्हें यूं ही बच्चा नहीं समझते। वे वास्तव में अभी बड़े हो ही नहीं पाए हैं। बिना सोचे समझे बोलना उनकी आदत सी हो गई है। अंगे्रजी में पले बढ़े राहुल ने क्या थिंक बिफोर यू स्पीक की युक्ति नहीं सुनी होगी। सुनी होगी पर शायद उस पर अमल नहीं करना चाहते।
दरअसल राहुल की दिक्कत यही है कि वे अपने आप को बहुत बड़ा और विद्धान समझते हैं, वहीं अन्य लोग उन्हें बच्चा समझते हैं। राहुल को यह तक नहीं पता कि किसी के यहां जाते हैं तो कैसे पेश आते हैं। मध्यप्रदेश आगमन से एक दिन पहले ही यहां की सरकार ने उन्हें प्रदेश का अतिथि घोषित कर दिया था, लेकिन राहुल को शायद अतिथि भाव पसंद नहीं आया। उन्हें तो मायावती जैसे लोग ही पसंद आते हैं, जो उनके आने पर कोई व्यवस्था नहीं करती बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गाली ही देती हैं। राहुल की हर गलती को बच्चा समझकर माफ कर दिया जाता है, लेकिन कब तक? बच्चा जब कोई गलती करता है तो पहले उस पर हंसी आती है और जब बड़ा होकर भी वह ऐसा ही करता है तो सजा दी जाती है। राहुल को चाहिए कि वे ऐसी नौबत न आने दें और कोई भी बात बोलने से पहले सोचें।
अपने मध्य प्रदेश के दौरे के दौरान राहुल गांधी ने कई बातें कहीं। कुछ ऐसी जो कहनी चाहिए थी और कुछ ऐसी जो मेरे ख्याल से नहीं कहनी चाहिए। राहुल ने कहा कि उन्हें चाटुकार और चमचे पसंद नहीं हैं। मुझे नहीं पता कि ये राहुल के निजी विचार हैं या फिर पारिवारिक। राहुल को भले चाटुकार पसंद न हों पर उनकी मां को चाटुकार और चमचे ही पसंद हैं। अगर नहीं होते तो प्रतिभादेवी सिंह पाटिल आज देश की राष्ट्रपति नहीं होतीं। हो सकता है कि मेरी इस बात की जमकर आलोचना की जाए पर मैं जानना चाहता हूं कि प्रतिभादेवी सिंह पाटिल में ऐसी कौन सी खूबी है जो वह राष्ट्रपति के उम्मीदवार हो गईं। अगर महिला होने की वजह से उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया तो प्रधानमंत्री पद क्यों किसी पुरुष के सुपुर्द कर दिया गया। क्या पार्टी में कोई ऐसी योग्य महिला नहीं जो प्रधानमंत्री बन सके? या फिर ऐसी महिला नहीं जो सोनिया गांधी की बात को आंख पर पट्टी बांध कर मान ले। खुद के प्रधानमंत्री न बन पाने के बाद क्यों उन्होंने कठपुतली मनमोहन सिंह का चयन किया। क्या कांग्रेस में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो अपने दम पर लोकसभा चुनाव जीत सके और प्रधानमंत्री बन सके। दरअसल सोनिया अच्छी तरह जानती हैं कि जो नेता लोकसभा का चुनाव जीत सकता है उसका अपना अच्छा खासा जनाधार होता है। मनमोहन सिंह चूंकि लोकसभा से संसद में प्रवेश नहीं करते सो उनका जनाधार भी नहीं होगा। सोनिया सिर्फ उन्हीं लोगों को पद बख्श रहीं हैं जो उनके कहे पर चलें। वे कहेंं दिन तो दिन और कहें रात तो रात। ऐसे नामों में केवल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि कई नाम हैं। अगले लोकसभा चुनाव में जब राहुल प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे उससे पहले ही मनमोहन सिंह को राष्ट्रपित भवन भेजने की पूरी तैयारी अभी से की जा रही है। राहुल को पहले अपने घर से चमचागिरि खत्म करनी होगी तब वे कार्यकर्ताओं को चमचागिरी न करने का पाठ पढ़ाएं तो ज्यादा अच्छा होगा।
राहुल कहते हैं कि देश की हर समस्या की खात्मा तभी होगा जब युवा राजनीति में आएंगे। यानी हर मर्ज की एक ही दवा। राजनीति और सिर्फ राजनीति। कोई कम अक्ल का व्यक्ति भी यह बता सकता है कि कभी भी हर मर्ज की एक ही दवा नहीं हुआ करती। अगर देश का हर व्यक्ति राजनीति करने लगेगा तो बाकी के काम कौन करेगा, यह भी राहुल को तय करना होगा। केवल राजनीति से देश नहीं चला करता। राजनीति पेट नहीं भरती। वे युवाओं को देश की राजनीति में लाना चाहते हैं। पहले उन्हें अपनी पार्टी में युवाओं को स्थान देना होगा। पहले वे अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से अपनी मां को हटाकर किसी युवा नेता को इसकी जिम्मेदारी सौंपे और फिर किसी युवा को ही प्रधानमंत्री बनने की घोषणा करें। केवल युवा कांग्रेस को बदलकर देश की राजनीति नहीं बदली जा सकती। राहुल को यह बात भी समझनी होगी कि कहने और करने में बहुत फर्क होता है। देशभर में घूमने से, दलित के घर जाकर रोटी खाने से और उसके घर सोने से दलित को अच्छा तो लग सकता है, लेकिन इससे उसके पेट की भूख कम नहीं हो सकती। देश भूख है, कराह रहा है। इसके लिए राहुल के पास क्या दवा है? राजनीति। देश घूमकर उसकी समस्याओं को समझना एक बात है और उसकी समस्याओं का निराकरण करना दूसरी बात।
राहुल कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते। राहुल को चाहिए कि वे पहले अपनी पार्टी के उन नेताओं को यह कहने से मना करें, जो उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं। राहुल को यह पता है कि अगले लोकसभा चुनाव में अगर उनकी पार्टी को बहुमत मिला तो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार वही होंगे सो अभी से ढोल-ताशे क्यों पीटे जाएं। हालांकि भीतर ही भीतर इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। योजना तैयार की जा रही है।
मजे की बात यह रही कि राहुल यहीं तक नहीं रुके। बुधवार को तो उन्होंने गजब ही कर दिया। उन्होंने कह दिया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और सिमी में उन्हें कोई फर्क नजर नहीं आता। सवाल यह है कि क्या राहुल ने कभी निष्पक्ष भाव से दोनों में कोई फर्क देखने की चेष्टा की है। नहीं की होगी, क्योंकि उनकी आंखों पर एक तरह का चश्मा लगा है और उन्हें जो कुछ भी दिखता है। उस चश्मे से ही दिखता है। अगर निष्पक्ष भाव से देखते तो उन्हें पता चल जाता कि संघ और सिमी में क्या फर्क है। सिमी जहां एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन है, वहीं संघ भारत भूमि की आत्मा से जुड़ा हुआ संगठन है। राहुल को अगर देशप्रेमी और देशद्रोही संगठनों में कोई फर्क नजर नहीं आता तो कोई क्या कर सकता है। बस उनकी बुद्धि पर मुस्कराया ही जा सकता है। वे जिस देश की राजनीति में युवाओं को लाने की बात कह रहे हैं क्या वे उस देश को समझ पा रहे हैं। इतने दिनों से देश भ्रमण के बाद भी अगर राहुल ऐसी बातें करते हैं तो लगता है कि लोग उन्हें यूं ही बच्चा नहीं समझते। वे वास्तव में अभी बड़े हो ही नहीं पाए हैं। बिना सोचे समझे बोलना उनकी आदत सी हो गई है। अंगे्रजी में पले बढ़े राहुल ने क्या थिंक बिफोर यू स्पीक की युक्ति नहीं सुनी होगी। सुनी होगी पर शायद उस पर अमल नहीं करना चाहते।
दरअसल राहुल की दिक्कत यही है कि वे अपने आप को बहुत बड़ा और विद्धान समझते हैं, वहीं अन्य लोग उन्हें बच्चा समझते हैं। राहुल को यह तक नहीं पता कि किसी के यहां जाते हैं तो कैसे पेश आते हैं। मध्यप्रदेश आगमन से एक दिन पहले ही यहां की सरकार ने उन्हें प्रदेश का अतिथि घोषित कर दिया था, लेकिन राहुल को शायद अतिथि भाव पसंद नहीं आया। उन्हें तो मायावती जैसे लोग ही पसंद आते हैं, जो उनके आने पर कोई व्यवस्था नहीं करती बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गाली ही देती हैं। राहुल की हर गलती को बच्चा समझकर माफ कर दिया जाता है, लेकिन कब तक? बच्चा जब कोई गलती करता है तो पहले उस पर हंसी आती है और जब बड़ा होकर भी वह ऐसा ही करता है तो सजा दी जाती है। राहुल को चाहिए कि वे ऐसी नौबत न आने दें और कोई भी बात बोलने से पहले सोचें।
शनिवार, अक्टूबर 02, 2010
वाह इंडिया, शाबाश मीडिया

इसे इत्तेफाक ही कहें कि जिस मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने पूरे जीवन हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया उनकी जयंती से दो दिन पूर्व ही एक ऐसे मामले का निर्णय आया जो लम्बे समय से लटका था। खास बात यह भी की मुद्दा तब ही गरमाया जब गांधी को सिधारे कुछ ही साल बीते थे।
सुखद बात यह रही कि आजादी के इतने वर्षों बाद पहली बार लगा कि भारत गांधी, कबीर और बुद्ध का देश है। अगर 30 सितंबर को कहीं पत्ता भी खड़कता तो यह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता और दुनिया भर में भारत की जो फजीहत होती वह अलग से। पूरे देश ने एक बार फिर साबित किया कि वह अब किसी नेता और धार्मिक रंग में रंगने वाले नहीं हैं, अब वह अपनी बुद्धि का भी इस्तेमाल करेंगे। ऐसा नहीं है कि अब देश में कट्टरवादियों की कमी हो गई है। वे अब भी हैं और रहेंगे भी, लेकिन उनकी संख्या अब बहुत कम रह गई है और आम जनता अब उनके बहकावे में नहीं आने वाली। कट्टरवादी हिन्दुओं में भी हैं और मुसलमानों में भी। सच कहा जाए तो गांधी की मौत के बाद इस बार पहली बार लगा कि हमने सच माएने में उन्हें श्रद्धांजलि दी है। गांधी ने भी शायद ऐसे ही भारत का सपना देखा था, जो अब साकार होता दिख रहा है।
अपने जन्म से ही तमाम अवसरों पर कई तरह की आलोचनाओं का सामना कर रहे मीडिया ने भी इस बार एक नई इबारत लिख दी। अगर देश में कुछ नहीं हुआ तो इसके पीछे लोगों की समझदारी तो थी ही, लेकिन इसमें मीडिया की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। फैसला जब 24 सितम्बर को आना था तब भी मीडिया ने पूरा संयम बरता और जब पता लगा कि फैसला टल गया है तब भी पूरी ईमानदारी से काम जारी रखा। यह एक ऐसा मुद्दा था, जिस पर देश के अरबों लोगों की ही नहीं, बल्कि विदेशियों की भी निगाहें थीं। वे भी जानना चाह रहे थे कि भारत में 1992 की अपेक्षा कुछ परिवर्तन और परिवक्वता आई है कि नहीं। ऐसे में कोई भी चैनल टीआरपी में आगे जा सकती थी, लेकिन किसी चैनल ने ऐसा नहीं किया। सबने यही कहा कि टीआरपी आती रहेगी, अगर देश का अमन-चैन गया तो वह वापस नहीं आएगा। चैनलों पर हिन्दू-मुस्लिम एकता का अद्भुत सामन्जस्य भी देखने को मिला। लगभग हर छोटे-बड़े चैनल पर दो एंकर बिठाए गए और उनमें एक हिन्दू और एक मुसलमान रहा। फैसला आने के बाद किसी एंकर के चेहरे पर खुशी या दुख का भाव देखने को नहीं मिला। यह स्थिति फैसला आने के दिन ही नहीं उसके दो दिन बाद तक जारी रही। दो दिन बाद तक किसी ऐसे चेहरे को टीवी पर नहीं दिखाया गया जो अतिवादी हो या फिर कुछ उल्टा-सीधा कह जाए। अगर वह आया भी तो अमन और शांति की अपील करता हुआ ही दिखा।
अब बात पिं्रट मीडिया यानी अखबारों की। किसी भी अखबार ने अपने संपादकीय में या फिर अपने किसी लेख में ऐसा प्रदर्शित नहीं किया वह किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष के लगाव रखता है। 1992 में कई अखबारों में यह आरोप लगा था कि वे किसी पार्टी विशेष के अखबार हैं, इस बार ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। फैसले के अगले दिन मुख्य हेडिंग में भी किसी अखबार ने ऐसी हेडिंग नहीं दी जिससे लगे कि किसी की जीत और किसी की हार हुई है। हेडिंग में वही कहा गया जो एक लाइन मेें कुछ शब्दों के इस्तेमाल से लिखा जा सकता है।
सच कहूं तो मुझे खुद को बहुत दिन बाद गौरवान्वित महसूस करने का मौका मिला है। मैं आज शान से कह सकता हूं कि मैं भारत में रहता हूं और एक मीडियाकर्मी हूं। शुक्रिया इंडिया...
गुरुवार, सितंबर 30, 2010
अब फिर बदलेगा परिदृश्य
अयोध्या विवाद पर न्यायालय का फैसला आ गया है। पहली नजर में फैसला हिन्दुओं के पक्ष में जाता दिख रहा है, हालांकि यह भी सही है कि फैसला बहुत ज्यादा बड़ा है और उसे पढऩे, समझने और उसके मायने निकालने में समय लगेगा।
यह बात पहले से ही जाहिर थी कि मामला यही खत्म नहीं होगा और जो भी पक्ष यहां मुंह की खाएगा वह उच्च अदालत की शरण में जरूर जाएगा। होने भी यही जा रहा है, जल्द से जल्द वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। फैसला सही है या गलत यह दूसरा मुद्दा हो सकता है, लेकिन अहम सवाल जो अब उभर कर सामने आ रहा है वह यह है कि क्या अब हमारे समाज में बदला हुआ परिदृश्य नजर आएगा। 30 सितम्बर2010 से पहले और 30 सितम्बर 2010 के बाद के माहौल और स्थिति में कुछ परिवर्तन आएगा क्या ? या सब कुछ पहले की ही तरह चलता रहेगा। पहली नजर में तो यही लगता है कि स्थितियों में निश्चित रूप से परिवर्तन ही नहीं बल्कि भारी परिवर्तन आने जा रहा है। यह बात अलग है कि यह परिवर्तन कब से आएगा। कुछ दिन बाद, कुछ महीने बाद या फिर कुछ साल बाद।
जिस तरह से 6 दिसम्बर1992 इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है, उससे बड़ी तारीख 30 सितम्बर2010 है। इस तारीख को60 साल बाद ऐसा फैसला सुनाया गया जिस पर करोड़ों नहीं बल्कि अरबों नजरें थीं। यह बात अलग है कि 6 दिसम्बर एक काला अध्याय था और 30 सितम्बर एक सफेद सच।6 दिसम्बर को मैं काला अध्याय इसलिए नहीं कह रहा कि उस दिन मस्जिद तोड़ी गई थी बल्कि इसलिए कह रहा हूं जो भी काम उस दिन किया गया वह गैर-कानूनी रूप से किया गया था और 30 सितम्बर को जो फैसला आया वह न्याय पालिका का फैसला है और यह बात सच है कि न्याय पालिका किसी धर्म, किसी मान्यता और किसी भावना को नहीं समझती उसे तो बस तर्क और सबूत चाहिए।
खैर, यह अलग मुद्दा हो सकता है। बात हो रही थी आने वाले समय के परिदृश्य में परिवर्तन की। जिस तरह 6 दिसम्बर की घटना के बाद देश की राजनीति और सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया उसी तरह अब भी आएगा। अगर मेरे कहे को अन्यथा न लें तो मैं यह भी कहना चाहूंगा कि देश इस समय जिस सबसे बड़ी समस्याओं में से एक से लड़ रहा है वह और बढ़ेगी और उसे रोकना अब और भी मुश्किल हो जाएगा। बात हो रही है आतंक की। जिस तरह से 6 दिसम्बर1992 की घटना के बाद देश में आतंकी घटनाओं में एकदम से बाढ़ आ गई थी कहीं न कहीं वही स्थिति फिर आने वाली है। आज अगर हर आतंकी घटना के पीछे किसी मुस्लिम नवयुवक का नाम आता है तो मैं दृढ़ता के साथ कहना चाहता हूूं कि उसके पीछे कहीं न कहीं 6 दिसम्बर 1992 भी है।
दरअसल देश के दुश्मनों को इसी तरह के मौकों की तलाश रहती है। और हम उन्हें जाने अनजाने इस तरह के मौके देते भी रहते हैं। देश विरोधी ताकतों को युवाओं को बरगलाने के लिए इसी तरह की घटनाओं का इंतजार रहता है। अब देश के दुश्मन युवाओं खासकर मुस्लिम युवाओं को इस बात का ज्ञान देंगी कि देखो जिस देश को तुम अपना कहते हो वह तुम्हारा है ही नहीं। वहां की कार्यपालिका और विधायिका तो तुम्हें अपना पहले से ही नहीं मानती थी अब एक ऐसा निर्णय सुनाया गया है जिससे यह साबित होता है कि न्यायपालिका भी ऐसा ही सोचती है।
मुझे आंकड़ों की जानकारी तो नहीं है, लेकिन याददाश्त के आधार पर इतना जरूर कह सकता हूं कि 6 दिसम्बर 1992 के 18 साल पहले कितने आतंकी हमले देश के ऊपर हुए और उसमें कितने देशवासी शहीद हुए और 6 दिसम्बर 1992 के बाद कितने आतंकी हमले हुए और कितने निर्दोष मौत के मुंह में असमय ही समा गए।
यहां कहना चाहता हूं कि जब मैंने पिछले दिनों सावधान आगे खतरा है हेडिंग से लेख लिखा था तो कई साथियों की टिप्पणी आई कि आप एक पत्रकार हैं पत्रकार ही रहिए ज्योतिषी मत बनिए। उनकी राय बिल्कुल सही है। मैं ज्योतिषी बनना भी नहीं चाहता पर जो चीज लगती है उसे यहां लिख देता हूं। यह भी सच है कि मेरी वह बात सच भी साबित हुई और दिल्ली में जामा मस्जिद के पास विदेशियों पर फायरिंग हुई। इतने संवेदनशील समय में भी पुलिस और अन्य विभाग अभी तक यह पता नहीं लगा पाए है कि आखिर वे हमलावर कौन थे? वे अभी भी देश में ही होंगे और भारत की ही रोटी खाकर पल रहे होंगे, लेकिन किसी को पता नहीं कि वे कहां हैं।
अंत में इतना ही और कि मैं न तो फैसला को अच्छा कह रहा हूं और न ही गलत, क्योंकि अदालत ने जो फैसला किया उसके लिए 60 साल का समय लिया और न जाने कितने लोगों की बात सुनी होगी, तब जाकर यह फैसला आया है, ऐसे में एक शब्द में इसका अर्थ निकालना मेरे ख्याल से बेवकूफी ही होगी। मेरा काम आगाह करना था सो कर दिया बाकी आपकी मर्जी.....
यह बात पहले से ही जाहिर थी कि मामला यही खत्म नहीं होगा और जो भी पक्ष यहां मुंह की खाएगा वह उच्च अदालत की शरण में जरूर जाएगा। होने भी यही जा रहा है, जल्द से जल्द वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। फैसला सही है या गलत यह दूसरा मुद्दा हो सकता है, लेकिन अहम सवाल जो अब उभर कर सामने आ रहा है वह यह है कि क्या अब हमारे समाज में बदला हुआ परिदृश्य नजर आएगा। 30 सितम्बर2010 से पहले और 30 सितम्बर 2010 के बाद के माहौल और स्थिति में कुछ परिवर्तन आएगा क्या ? या सब कुछ पहले की ही तरह चलता रहेगा। पहली नजर में तो यही लगता है कि स्थितियों में निश्चित रूप से परिवर्तन ही नहीं बल्कि भारी परिवर्तन आने जा रहा है। यह बात अलग है कि यह परिवर्तन कब से आएगा। कुछ दिन बाद, कुछ महीने बाद या फिर कुछ साल बाद।
जिस तरह से 6 दिसम्बर1992 इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है, उससे बड़ी तारीख 30 सितम्बर2010 है। इस तारीख को60 साल बाद ऐसा फैसला सुनाया गया जिस पर करोड़ों नहीं बल्कि अरबों नजरें थीं। यह बात अलग है कि 6 दिसम्बर एक काला अध्याय था और 30 सितम्बर एक सफेद सच।6 दिसम्बर को मैं काला अध्याय इसलिए नहीं कह रहा कि उस दिन मस्जिद तोड़ी गई थी बल्कि इसलिए कह रहा हूं जो भी काम उस दिन किया गया वह गैर-कानूनी रूप से किया गया था और 30 सितम्बर को जो फैसला आया वह न्याय पालिका का फैसला है और यह बात सच है कि न्याय पालिका किसी धर्म, किसी मान्यता और किसी भावना को नहीं समझती उसे तो बस तर्क और सबूत चाहिए।
खैर, यह अलग मुद्दा हो सकता है। बात हो रही थी आने वाले समय के परिदृश्य में परिवर्तन की। जिस तरह 6 दिसम्बर की घटना के बाद देश की राजनीति और सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया उसी तरह अब भी आएगा। अगर मेरे कहे को अन्यथा न लें तो मैं यह भी कहना चाहूंगा कि देश इस समय जिस सबसे बड़ी समस्याओं में से एक से लड़ रहा है वह और बढ़ेगी और उसे रोकना अब और भी मुश्किल हो जाएगा। बात हो रही है आतंक की। जिस तरह से 6 दिसम्बर1992 की घटना के बाद देश में आतंकी घटनाओं में एकदम से बाढ़ आ गई थी कहीं न कहीं वही स्थिति फिर आने वाली है। आज अगर हर आतंकी घटना के पीछे किसी मुस्लिम नवयुवक का नाम आता है तो मैं दृढ़ता के साथ कहना चाहता हूूं कि उसके पीछे कहीं न कहीं 6 दिसम्बर 1992 भी है।
दरअसल देश के दुश्मनों को इसी तरह के मौकों की तलाश रहती है। और हम उन्हें जाने अनजाने इस तरह के मौके देते भी रहते हैं। देश विरोधी ताकतों को युवाओं को बरगलाने के लिए इसी तरह की घटनाओं का इंतजार रहता है। अब देश के दुश्मन युवाओं खासकर मुस्लिम युवाओं को इस बात का ज्ञान देंगी कि देखो जिस देश को तुम अपना कहते हो वह तुम्हारा है ही नहीं। वहां की कार्यपालिका और विधायिका तो तुम्हें अपना पहले से ही नहीं मानती थी अब एक ऐसा निर्णय सुनाया गया है जिससे यह साबित होता है कि न्यायपालिका भी ऐसा ही सोचती है।
मुझे आंकड़ों की जानकारी तो नहीं है, लेकिन याददाश्त के आधार पर इतना जरूर कह सकता हूं कि 6 दिसम्बर 1992 के 18 साल पहले कितने आतंकी हमले देश के ऊपर हुए और उसमें कितने देशवासी शहीद हुए और 6 दिसम्बर 1992 के बाद कितने आतंकी हमले हुए और कितने निर्दोष मौत के मुंह में असमय ही समा गए।
यहां कहना चाहता हूं कि जब मैंने पिछले दिनों सावधान आगे खतरा है हेडिंग से लेख लिखा था तो कई साथियों की टिप्पणी आई कि आप एक पत्रकार हैं पत्रकार ही रहिए ज्योतिषी मत बनिए। उनकी राय बिल्कुल सही है। मैं ज्योतिषी बनना भी नहीं चाहता पर जो चीज लगती है उसे यहां लिख देता हूं। यह भी सच है कि मेरी वह बात सच भी साबित हुई और दिल्ली में जामा मस्जिद के पास विदेशियों पर फायरिंग हुई। इतने संवेदनशील समय में भी पुलिस और अन्य विभाग अभी तक यह पता नहीं लगा पाए है कि आखिर वे हमलावर कौन थे? वे अभी भी देश में ही होंगे और भारत की ही रोटी खाकर पल रहे होंगे, लेकिन किसी को पता नहीं कि वे कहां हैं।
अंत में इतना ही और कि मैं न तो फैसला को अच्छा कह रहा हूं और न ही गलत, क्योंकि अदालत ने जो फैसला किया उसके लिए 60 साल का समय लिया और न जाने कितने लोगों की बात सुनी होगी, तब जाकर यह फैसला आया है, ऐसे में एक शब्द में इसका अर्थ निकालना मेरे ख्याल से बेवकूफी ही होगी। मेरा काम आगाह करना था सो कर दिया बाकी आपकी मर्जी.....
शनिवार, सितंबर 25, 2010
ऐसे नहीं रुकेगा आतंक
क्या आपको लगता है कि आतंकवाद खत्म किया जा सकता है? क्या आपको लगता है कि भारत में कभी अमेरिका या ब्रिटेन जैसी स्थिति बन पाएगी, कि कोई आतंकी संगठन वहां वारदात करने से पहले कई बार सोचे? क्या हम और आने वाली पीढ़ी कभी डर के साए से बाहर निकल पाएंगे? सवाल और भी हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय इन सवालों का जवाब हां में दे पाएगा। क्या हम आगे भी इसी तरह जीते रहेंगे जैसे आज जी रहे हैं? या फिर इसमें कोई बदलाव की स्थिति निकट भविष्य में दीखती है। खैर, मुझे तो नहीं दिखती।
भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जो मानते हैं कि भारत में आतंकवाद का कारण पाकिस्तान है और पाकिस्तान चूंकि कश्मीर को पाना चाहता है इसलिए कश्मीर सहित पूरे देश में आतंक का माहौल बनाना चाहता है, ताकि थक-हारकर भारत कश्मीर पर समझौता करने पर तैयार हो जाए। बहुत से लोग मानते हैं कि अगर कश्मीर की समस्या का हल हो जाए तो आतंकवाद पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। पहली बात तो यह है कि कश्मीर की समस्या हल नहीं होगी और अगर मान लीजिए किसी तरह हो भी जाएगी तो क्या आतंक कम हो जाएगा? साहब आतंक तब भी कम नहीं होगा। हर व्यक्ति सजग और सतर्क हो जाए और उसे जरा भी लगे कि फलां व्यक्ति किसी गलत काम में या आतंकी गतिविधि में लिप्त है तो पुलिस को सूचित कर दे तो भी क्या आतंकी घटनाओं को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। तो जनाब मुझे ऐसा नहीं लगता।
एक लाइन में कहूं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जब तक न्यायालय द्वारा आतंककारी घोषित किए जा चुके लोगों को निर्धारित सजा नहीं मिल जाती, तब तक कोई खास उम्मीद रखना निरा बेमानी ही होगी।
पिछले दिनों दिल्ली में जामा मस्जिद के पास हुआ हमला कुछ नए संकेत कर रहा है। अब आतंकी खुद को नष्ट करके हमें खत्म नहीं करना चाहते बल्कि वे चाहते हैं कि वे सुरक्षित रहें और हमें खत्म करें। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आतंकियों के निशाने पर अब भारतीय नहीं बल्कि भारत आने वाले विदेशी हैं ताकि दुनियाभर में भारत की भद्द पिटे।
्र
किसी आतंकी घटना को अंजाम देकर निकल भागने वालों को पकडऩा कितना मुश्किल काम होता है यह सब जानते हैं। न जाने कितनी मुसीबत और मेहनत के बाद पुलिस और अन्य फोर्सेस उन्हें पकड़ पाते हैं। उसके बाद अदालत में मुकदमा चलता है। चूंकि अदालत सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती है इसलिए यह साबित करना कि यह व्यक्ति आतंकी है बड़ा टेढ़ा काम होता है। कड़ी मशक्कत के बाद अदालत में यह साबित भी हो जाता है कि फलां आदमी आतंकी है तब कहीं जाकर न्यायालय फैसला सुनाती है। खास बात यह भी कि इसमें कुछ दिन या महीनों का समय नहीं बल्कि अक्सर कई साल लग जाते हैं। अदालत से अपराधी घोषित व्यक्ति को सजा मिल जाती है, लेकिन अदालत के निर्णय का क्रियान्वयन नहीं हो पाता। बड़ी दिक्कत यही है।
जब तक अदालत से दोषी करार दिए गए व्यक्ति को सजा नहीं मिलती यह सोचना कि देश से आतंक कम हो जाएगा बिल्कुल दिन में सपने देखने जैसा ही है। सबसे पहले आतंकियों को सजा दी जानी चाहिए, ताकि जो लोग भविष्य में ऐसा कुछ करने के बारे में विचार कर रहे हैं वे ऐसा करने से बचें। बाकी तो ख्याली पुलाव हैं आप भी पकाइए मैं भी पकाऊं...
भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जो मानते हैं कि भारत में आतंकवाद का कारण पाकिस्तान है और पाकिस्तान चूंकि कश्मीर को पाना चाहता है इसलिए कश्मीर सहित पूरे देश में आतंक का माहौल बनाना चाहता है, ताकि थक-हारकर भारत कश्मीर पर समझौता करने पर तैयार हो जाए। बहुत से लोग मानते हैं कि अगर कश्मीर की समस्या का हल हो जाए तो आतंकवाद पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। पहली बात तो यह है कि कश्मीर की समस्या हल नहीं होगी और अगर मान लीजिए किसी तरह हो भी जाएगी तो क्या आतंक कम हो जाएगा? साहब आतंक तब भी कम नहीं होगा। हर व्यक्ति सजग और सतर्क हो जाए और उसे जरा भी लगे कि फलां व्यक्ति किसी गलत काम में या आतंकी गतिविधि में लिप्त है तो पुलिस को सूचित कर दे तो भी क्या आतंकी घटनाओं को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। तो जनाब मुझे ऐसा नहीं लगता।
एक लाइन में कहूं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जब तक न्यायालय द्वारा आतंककारी घोषित किए जा चुके लोगों को निर्धारित सजा नहीं मिल जाती, तब तक कोई खास उम्मीद रखना निरा बेमानी ही होगी।
पिछले दिनों दिल्ली में जामा मस्जिद के पास हुआ हमला कुछ नए संकेत कर रहा है। अब आतंकी खुद को नष्ट करके हमें खत्म नहीं करना चाहते बल्कि वे चाहते हैं कि वे सुरक्षित रहें और हमें खत्म करें। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आतंकियों के निशाने पर अब भारतीय नहीं बल्कि भारत आने वाले विदेशी हैं ताकि दुनियाभर में भारत की भद्द पिटे।
्र
किसी आतंकी घटना को अंजाम देकर निकल भागने वालों को पकडऩा कितना मुश्किल काम होता है यह सब जानते हैं। न जाने कितनी मुसीबत और मेहनत के बाद पुलिस और अन्य फोर्सेस उन्हें पकड़ पाते हैं। उसके बाद अदालत में मुकदमा चलता है। चूंकि अदालत सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती है इसलिए यह साबित करना कि यह व्यक्ति आतंकी है बड़ा टेढ़ा काम होता है। कड़ी मशक्कत के बाद अदालत में यह साबित भी हो जाता है कि फलां आदमी आतंकी है तब कहीं जाकर न्यायालय फैसला सुनाती है। खास बात यह भी कि इसमें कुछ दिन या महीनों का समय नहीं बल्कि अक्सर कई साल लग जाते हैं। अदालत से अपराधी घोषित व्यक्ति को सजा मिल जाती है, लेकिन अदालत के निर्णय का क्रियान्वयन नहीं हो पाता। बड़ी दिक्कत यही है।
जब तक अदालत से दोषी करार दिए गए व्यक्ति को सजा नहीं मिलती यह सोचना कि देश से आतंक कम हो जाएगा बिल्कुल दिन में सपने देखने जैसा ही है। सबसे पहले आतंकियों को सजा दी जानी चाहिए, ताकि जो लोग भविष्य में ऐसा कुछ करने के बारे में विचार कर रहे हैं वे ऐसा करने से बचें। बाकी तो ख्याली पुलाव हैं आप भी पकाइए मैं भी पकाऊं...
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