क्या आपको लगता है कि आतंकवाद खत्म किया जा सकता है? क्या आपको लगता है कि भारत में कभी अमेरिका या ब्रिटेन जैसी स्थिति बन पाएगी, कि कोई आतंकी संगठन वहां वारदात करने से पहले कई बार सोचे? क्या हम और आने वाली पीढ़ी कभी डर के साए से बाहर निकल पाएंगे? सवाल और भी हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय इन सवालों का जवाब हां में दे पाएगा। क्या हम आगे भी इसी तरह जीते रहेंगे जैसे आज जी रहे हैं? या फिर इसमें कोई बदलाव की स्थिति निकट भविष्य में दीखती है। खैर, मुझे तो नहीं दिखती।
भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जो मानते हैं कि भारत में आतंकवाद का कारण पाकिस्तान है और पाकिस्तान चूंकि कश्मीर को पाना चाहता है इसलिए कश्मीर सहित पूरे देश में आतंक का माहौल बनाना चाहता है, ताकि थक-हारकर भारत कश्मीर पर समझौता करने पर तैयार हो जाए। बहुत से लोग मानते हैं कि अगर कश्मीर की समस्या का हल हो जाए तो आतंकवाद पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। पहली बात तो यह है कि कश्मीर की समस्या हल नहीं होगी और अगर मान लीजिए किसी तरह हो भी जाएगी तो क्या आतंक कम हो जाएगा? साहब आतंक तब भी कम नहीं होगा। हर व्यक्ति सजग और सतर्क हो जाए और उसे जरा भी लगे कि फलां व्यक्ति किसी गलत काम में या आतंकी गतिविधि में लिप्त है तो पुलिस को सूचित कर दे तो भी क्या आतंकी घटनाओं को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। तो जनाब मुझे ऐसा नहीं लगता।
एक लाइन में कहूं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जब तक न्यायालय द्वारा आतंककारी घोषित किए जा चुके लोगों को निर्धारित सजा नहीं मिल जाती, तब तक कोई खास उम्मीद रखना निरा बेमानी ही होगी।
पिछले दिनों दिल्ली में जामा मस्जिद के पास हुआ हमला कुछ नए संकेत कर रहा है। अब आतंकी खुद को नष्ट करके हमें खत्म नहीं करना चाहते बल्कि वे चाहते हैं कि वे सुरक्षित रहें और हमें खत्म करें। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आतंकियों के निशाने पर अब भारतीय नहीं बल्कि भारत आने वाले विदेशी हैं ताकि दुनियाभर में भारत की भद्द पिटे।
्र
किसी आतंकी घटना को अंजाम देकर निकल भागने वालों को पकडऩा कितना मुश्किल काम होता है यह सब जानते हैं। न जाने कितनी मुसीबत और मेहनत के बाद पुलिस और अन्य फोर्सेस उन्हें पकड़ पाते हैं। उसके बाद अदालत में मुकदमा चलता है। चूंकि अदालत सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती है इसलिए यह साबित करना कि यह व्यक्ति आतंकी है बड़ा टेढ़ा काम होता है। कड़ी मशक्कत के बाद अदालत में यह साबित भी हो जाता है कि फलां आदमी आतंकी है तब कहीं जाकर न्यायालय फैसला सुनाती है। खास बात यह भी कि इसमें कुछ दिन या महीनों का समय नहीं बल्कि अक्सर कई साल लग जाते हैं। अदालत से अपराधी घोषित व्यक्ति को सजा मिल जाती है, लेकिन अदालत के निर्णय का क्रियान्वयन नहीं हो पाता। बड़ी दिक्कत यही है।
जब तक अदालत से दोषी करार दिए गए व्यक्ति को सजा नहीं मिलती यह सोचना कि देश से आतंक कम हो जाएगा बिल्कुल दिन में सपने देखने जैसा ही है। सबसे पहले आतंकियों को सजा दी जानी चाहिए, ताकि जो लोग भविष्य में ऐसा कुछ करने के बारे में विचार कर रहे हैं वे ऐसा करने से बचें। बाकी तो ख्याली पुलाव हैं आप भी पकाइए मैं भी पकाऊं...
आतंकवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आतंकवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शनिवार, सितंबर 25, 2010
रविवार, अगस्त 22, 2010
सावधान ! आगे खतरा है
सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि मैं जो कुछ भी यहां लिखने जा रहा हूं मैं चाहता हूं कि वह गलत निकले। क्योंकि अगर मेरी कही हुई बात गलत निकली तो ही ठीक है। लेकिन फिर भी आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं।
15 अगस्त शांति से निपट गया है। जम्मू-कश्मीर की घटना छोड़ दें तो बाकी सभी जगह सब ठीक ठाक रहा। अगस्त का महीना समाप्त होते ही ऐसा कुछ होने वाला हैै कि कुछ भी हो सकता है। सबसे पहले इस बात की संभावना है कि अयोध्या विवाद का फैसला सितम्बर में आ जाए। फैसला आएगा तो यह तय कि कुछ न कुछ जरूर होगा। अगर फैसला मुसलमानों के पक्ष में जाएगा तो हिन्दूवादी संगठन चुप नहीं बैठेंगे और कुछ न कुछ जरूर करेंगे, इसके लिए अंदरखाते योजना बननी भी शुरू हो गई है। फैसला आते ही कुछ न कुछ होगा। अगर फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया तो मुसलमान भी चुप बैठेंगे यह मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी। हालांकि यह सही है कि मुस्लिम संगठनों ने अभी कुछ आक्रामक तेवर नहीं दिखाए हैं लेकिन फैसला आने के बाद क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। चुंकि यह धार्मिक मुद्दा है लोगों की भावनाओं का मुद्दा है, इसलिए यह कुछ सीमित स्थानों पर ही सीमित रहेगा यह भी नहीं कहा जा सकता। अगर जरा सी भी आग लगी तो पूरे देश में फैलेगी और न जाने कितनों को जला कर राख कर देगी। शायद इसीलिए यूपी की मुख्यमंत्री ने दूरदृष्टि का परिचय देते हुए पुलिस अधिकारियों की छुट्टी रद्द कर दी है। ताकि अगर हालात खराब हों तो स्थिति पर तत्काल नियंत्रण पाया जा सके।
मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो, लेकिन बहुत हद तक आशंका है कि कुछ न कुछ होगा जरूर।
दूसरी स्थित बनेगी अक्टूबर में। इस माह में कॉमनवेल्थ गेम्स यानी राष्ट्रमंडल खेल होंगे। हमारे देश के नेताओं को जो कुछ भी करना है वे कर चुके हैं और अंदरखाते कर भी रहे होंगे जिनका खुलासा शायद बाद में हो। लेकिन बाहर के लोगों का क्या कहिएगा। जी, हां मैं बात कर रहा हूं भाड़े के आतंककारियों की। क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान और तालिबान यह चाहेंगे कि भारत में राष्ट्रमंडल खेल शांति से हो पाएं? मुझे तो नहीं लगता। वैसे भी भारत में पिछले बहुत दिन से कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ है। पाकिस्तान के हालात खराब चल रहे हैं। बाढ़ से पूरा देश त्रस्त हैं। लोग भूखों मर रहे हैं। सेना राष्ट्रपति जरदारी हो हटाने के लिए पूरे प्रयास कर रही है। कुछ दिनों में ही वहां कुछ बड़ा परिवर्तन दिखे तो अचरज नहीं होना चाहिए। बहुत संभव है कि भारत पर कुछ दिन से इसलिए हमला न हुआ हो कि राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। ऐसे मौके पर कुछ किया जाए तो कहने ही क्या। तय है कि निश्चित रूप से बड़ी संख्या में विदेशी भी मारे जाएंगे और भारत की भद्द पिटेगी वह अलग से। वैसे भी आतंककारी अब चाहते हैं कि भारतीयों के साथ साथ विदेशी भी मारे जाएं, इसीलिए होटल ताज पर हमला किया गया था। दिल्ली सुरक्षा इंतजामात को लेकर वैसे भी संतुष्ट नहीं है। भले कोई बड़ी वारदात न हो लेकिन आतंककारी माहौल बिगाडऩे का प्रयास नहीं करेंगे यह मानने वाली बात नहीं है।
तीसरी बात, पेंटागन से खबर आई है कि चीन ने भारत की सीमा पर परमाणु मिसाइल तैनात कर दी है। हालांकि चीन ने इसका खंडन किया और बकवास करार दिया है लेकिन फिर भी चौकन्ना तो रहना ही होगा। यह सही है कि चीन ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा, जिससे उसे कोई परेशानी हो, लेकिन वह भारत पर अतिरिक्त दबाव बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। वह सीमा तक अपने सड़क मार्ग को दुरुस्त कर रहा है। यह सही है कि हाल-फिलहाल इस मामले में कोई संकट नहीं आने वाला लेकिन भविष्य किसने देखा है? चीन जिस स्तर की तैयारियां कर रहा है वह निश्चित रूप से चौंकाने वाली और सतर्क करने वाली है। अगर चीन के इरादे नेक हैं तब तो कोई बात नहीं लेकिन अगर जरा भी शंका हुई तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। पूरा देश राष्ट्रमंडल खेल की तैयारियों में लगा रहे और चीन सिर पर आकर बैठ जाए तो क्या कहिएगा।
खतरे और भी हैं, जो बिना बताए आ सकते हैं। सतर्क सबसे रहने की जरूरत है। मैं एक बार फिर कह दूं कि मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो। मंदिर-मस्जिद मामले का कोई ऐसा हल निकले जो दोनों पक्ष मान लें और देश में सौहार्द का माहौल बना रहे। राष्ट्रमंडल खेलों में अभी तक जो हुआ सो हुआ अब सब सही हो जाए। आतंककारी अपने झंझावातों में फंसे रहे और इधर न आ पाएं। आएं भी तो उनका कोई मंसूबा पूरा न होने दिया जाए, उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया जाए। चीन अपने देश में जो कुछ भी कर रहा है वह अपने विकास के लिए कर रहा हो, उसका इरादा भारत को नुकसान पहुंचाने का न हो। चाहता तो यही हूं, लेकिन कौन जाने कब क्या हो जाए।
जाने क्या होगा रामा रे...
15 अगस्त शांति से निपट गया है। जम्मू-कश्मीर की घटना छोड़ दें तो बाकी सभी जगह सब ठीक ठाक रहा। अगस्त का महीना समाप्त होते ही ऐसा कुछ होने वाला हैै कि कुछ भी हो सकता है। सबसे पहले इस बात की संभावना है कि अयोध्या विवाद का फैसला सितम्बर में आ जाए। फैसला आएगा तो यह तय कि कुछ न कुछ जरूर होगा। अगर फैसला मुसलमानों के पक्ष में जाएगा तो हिन्दूवादी संगठन चुप नहीं बैठेंगे और कुछ न कुछ जरूर करेंगे, इसके लिए अंदरखाते योजना बननी भी शुरू हो गई है। फैसला आते ही कुछ न कुछ होगा। अगर फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया तो मुसलमान भी चुप बैठेंगे यह मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी। हालांकि यह सही है कि मुस्लिम संगठनों ने अभी कुछ आक्रामक तेवर नहीं दिखाए हैं लेकिन फैसला आने के बाद क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। चुंकि यह धार्मिक मुद्दा है लोगों की भावनाओं का मुद्दा है, इसलिए यह कुछ सीमित स्थानों पर ही सीमित रहेगा यह भी नहीं कहा जा सकता। अगर जरा सी भी आग लगी तो पूरे देश में फैलेगी और न जाने कितनों को जला कर राख कर देगी। शायद इसीलिए यूपी की मुख्यमंत्री ने दूरदृष्टि का परिचय देते हुए पुलिस अधिकारियों की छुट्टी रद्द कर दी है। ताकि अगर हालात खराब हों तो स्थिति पर तत्काल नियंत्रण पाया जा सके।
मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो, लेकिन बहुत हद तक आशंका है कि कुछ न कुछ होगा जरूर।
दूसरी स्थित बनेगी अक्टूबर में। इस माह में कॉमनवेल्थ गेम्स यानी राष्ट्रमंडल खेल होंगे। हमारे देश के नेताओं को जो कुछ भी करना है वे कर चुके हैं और अंदरखाते कर भी रहे होंगे जिनका खुलासा शायद बाद में हो। लेकिन बाहर के लोगों का क्या कहिएगा। जी, हां मैं बात कर रहा हूं भाड़े के आतंककारियों की। क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान और तालिबान यह चाहेंगे कि भारत में राष्ट्रमंडल खेल शांति से हो पाएं? मुझे तो नहीं लगता। वैसे भी भारत में पिछले बहुत दिन से कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ है। पाकिस्तान के हालात खराब चल रहे हैं। बाढ़ से पूरा देश त्रस्त हैं। लोग भूखों मर रहे हैं। सेना राष्ट्रपति जरदारी हो हटाने के लिए पूरे प्रयास कर रही है। कुछ दिनों में ही वहां कुछ बड़ा परिवर्तन दिखे तो अचरज नहीं होना चाहिए। बहुत संभव है कि भारत पर कुछ दिन से इसलिए हमला न हुआ हो कि राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। ऐसे मौके पर कुछ किया जाए तो कहने ही क्या। तय है कि निश्चित रूप से बड़ी संख्या में विदेशी भी मारे जाएंगे और भारत की भद्द पिटेगी वह अलग से। वैसे भी आतंककारी अब चाहते हैं कि भारतीयों के साथ साथ विदेशी भी मारे जाएं, इसीलिए होटल ताज पर हमला किया गया था। दिल्ली सुरक्षा इंतजामात को लेकर वैसे भी संतुष्ट नहीं है। भले कोई बड़ी वारदात न हो लेकिन आतंककारी माहौल बिगाडऩे का प्रयास नहीं करेंगे यह मानने वाली बात नहीं है।
तीसरी बात, पेंटागन से खबर आई है कि चीन ने भारत की सीमा पर परमाणु मिसाइल तैनात कर दी है। हालांकि चीन ने इसका खंडन किया और बकवास करार दिया है लेकिन फिर भी चौकन्ना तो रहना ही होगा। यह सही है कि चीन ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा, जिससे उसे कोई परेशानी हो, लेकिन वह भारत पर अतिरिक्त दबाव बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। वह सीमा तक अपने सड़क मार्ग को दुरुस्त कर रहा है। यह सही है कि हाल-फिलहाल इस मामले में कोई संकट नहीं आने वाला लेकिन भविष्य किसने देखा है? चीन जिस स्तर की तैयारियां कर रहा है वह निश्चित रूप से चौंकाने वाली और सतर्क करने वाली है। अगर चीन के इरादे नेक हैं तब तो कोई बात नहीं लेकिन अगर जरा भी शंका हुई तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। पूरा देश राष्ट्रमंडल खेल की तैयारियों में लगा रहे और चीन सिर पर आकर बैठ जाए तो क्या कहिएगा।
खतरे और भी हैं, जो बिना बताए आ सकते हैं। सतर्क सबसे रहने की जरूरत है। मैं एक बार फिर कह दूं कि मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो। मंदिर-मस्जिद मामले का कोई ऐसा हल निकले जो दोनों पक्ष मान लें और देश में सौहार्द का माहौल बना रहे। राष्ट्रमंडल खेलों में अभी तक जो हुआ सो हुआ अब सब सही हो जाए। आतंककारी अपने झंझावातों में फंसे रहे और इधर न आ पाएं। आएं भी तो उनका कोई मंसूबा पूरा न होने दिया जाए, उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया जाए। चीन अपने देश में जो कुछ भी कर रहा है वह अपने विकास के लिए कर रहा हो, उसका इरादा भारत को नुकसान पहुंचाने का न हो। चाहता तो यही हूं, लेकिन कौन जाने कब क्या हो जाए।
जाने क्या होगा रामा रे...
रविवार, जुलाई 25, 2010
तो क्या अब चम्मच भी न दी जाए!
कैसी विडम्बना है। जो हमें फूटी आंख नहीं सुहाने चाहिए। जिन्हें देखते ही गोली मार देनी चाहिए। उनकी हम इतनी सुरक्षा करते फिरते हैं कि कहीं उनके बाल की खाल भी भी बांकी न हो जाए। अगर उन पर कोई हमला करता है तो हम उन्हें बचाते हैं और चोट लग जाने पर मरहम पट्टी करते हैं। दवाई का खर्चा भी हमारा ही।
जी, बात कर रहा हूं। अबू सलेम साहब की। अरे साहब न कहूं तो क्या कहूं। साहब जैसा ही तो ठाट है उनका। आम आदमी मरे चाहे जिए, किसी को कोई परवाह नहीं। पर अबू साहब को कुछ हो जाए तो सरकार के कान के बाल खड़े हो जाते हैं। अरे ये कैसे हो गया? उन जनाब पर हमला हो गया, घायल हो गए। हमलावर कौन? उनके ही पुराने साथी मुस्तफा दोसा साहब। दोनों जनों ने मिलकर 12 मार्च 1993 में मुंबई में सिलसिलेवार बम विस्फोट किए। तब दोनों साथी थे। यानी हमजोली। अब दुश्मन हो गए, एक दूसरे की खून के प्यासे। कहते भी हैं दोस्त अगर दुश्मन हो जाए तो उससे बड़ा दुश्मन और कोई नहीं होता। तब दोनों भाई दाउद इब्राहिम जी के लिए काम करते थे। अबू साहब ने जब नई राह अपनाई तो दोसा जी को यह बात बर्दाश्त नहीं हुआ। भाई से दगाबाजी? तब से ही दोसा जी अबू साहब से नाराज थे। मन में था कि इसको तो मैं देख लूंगा। दोसा जी कई दिनों से उन चम्मच को चमका या यूं कहें घिर रहे थे जो उन्हें खाना खाने के लिए दी जाती है। जब चमक गई तो बस फिर क्या था। कर दिया अबू साहब पर हमला। पता चला है कि उन्हें गले में कुछ चोटें आई हैं। तुरंत उनकी दवाई कराई गई और अब वह विश्राम कर रहे हैं। हालांकि अबू साहब भी कम नहीं हैं। वो तो दोसा जी की सेहत अबू जी से अच्छी थी नहीं तो अबू जी भी कुछ कर देते तो कोई बड़ी बात नहीं।
एक सवाल यहां उठ रहा है कि क्या जेल में कैदियों को जो चम्मच दी जाती है वह भी बंद कर देनी चाहिए। हालांकि अभी तक इस तरह की कोई खबर नहीं आई है कि सरकार इस पर विचार कर रही है पर अगर एक दो इस तरह की वारदात हो गईं तो सरकार को सोचना होगा। मैं सरकार से थोड़ा पहले सोच ले रहा हूं। एक बात और अगर चम्मच बंद कर दी तो ये माननीय कैदी साहब लोग खाना कैसे खाएंगे। हाथ से? ऐसे तो उन्होंने कभी नहीं खाया। ठहरिए खाया तो है। जब अबू साहब आजमगढ़ में रहते थे तो कैसे खाते होंगे। तब तो गरीबी थी। तो शायद हाथों से ही खाते होंगे। और खाने से हाथ गंदे हो जाते थे तो उन्हें धोने के लिए साबुन भी नहीं मिलता था। मिट्टी से हाथ धोने पड़ते थे। लेकिन वो तो गुजरे जमाने की बात हो गई। अब तो चम्मच-कांटे और न जाने क्या क्या। अब कैसे हाथ से खाएंगे। हाथ मैले नहीं हो जाएंगे? खैर यह दूर की कौड़ी है। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।
हां, सरकार जिस बात को लेेकर परेशान है वह परम आदरणीय मोहम्मद आमिर अजमल कसाब साहब की सुरक्षा है। इतनी महान शख्सियत की सुरक्षा में कहीं सेंध न लग जाए इसको लेकर सरकार के कान खड़े हो गए हैं। अगर कसाब को कुछ हो गया तो क्या होगा। पाकिस्तान को क्या जवाब देगी हमारी सरकार? क्या किया हमारे कसाब के साथ? हमारा एक आदमी भी ठीक से नहीं रख पाए और बातें करते हो? चलो जाओ हम तुमसे कोई बात नहीं करेंगे। आतंकवाद पर भी नहीं। हमारा लाल कसाब कहां है?
आम आदमी जो देश के लिए मरा जा रहा है, देश की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देश की सेवा कर रहा है, देश की अर्थव्यवस्था में कोई न कोई सहयोग दे रहा है। तिरंगे को अपनी आन, बान और सम्मान समझता है। उसकी हमारी सरकार को कोई फिक्र नहीं। यहां एक सवाल और भी उठता है। यह आम आदमी है कौन? सवाल किया तो जवाब आया जो आम के मौसम में भी जो आम न खा पाए वही आम आदमी है। तो साहब यह तो आम का मौसम चल रहा है। मैं देखता हूं कि बहुत बड़ी संख्या में लोग आम नहीं खा पा रहे हैं। दुकानों और ठेलियों पर रखे आम सड़ रहे हैं पर कोई खरीदार नहीं मिल रहा। क्यों? जवाब वही महंगाई डायन खाए जात है।
खैर, महंगाई की बात फिर कभी, फिलहाल महान लोगों की हो रही थी। बात यहीं खत्म करना चाहता हूं। सवाल कई हैं और जवाब सरकार को तलाशने हैं। जो सरकार तय करेगी हम सभी को मानना है, क्योंकि सरकार तो हम सबने मिलकर बनाई है ना। तो ठीक है साहब ईश्वर से यही प्रार्थना है कि अबू साहब, दोसा साहब और अजमल साहब की सुरक्षा में कोई सेंध न लगे नहीं तो गजब ही हो जाएगा। जरा संभलकर..................
जी, बात कर रहा हूं। अबू सलेम साहब की। अरे साहब न कहूं तो क्या कहूं। साहब जैसा ही तो ठाट है उनका। आम आदमी मरे चाहे जिए, किसी को कोई परवाह नहीं। पर अबू साहब को कुछ हो जाए तो सरकार के कान के बाल खड़े हो जाते हैं। अरे ये कैसे हो गया? उन जनाब पर हमला हो गया, घायल हो गए। हमलावर कौन? उनके ही पुराने साथी मुस्तफा दोसा साहब। दोनों जनों ने मिलकर 12 मार्च 1993 में मुंबई में सिलसिलेवार बम विस्फोट किए। तब दोनों साथी थे। यानी हमजोली। अब दुश्मन हो गए, एक दूसरे की खून के प्यासे। कहते भी हैं दोस्त अगर दुश्मन हो जाए तो उससे बड़ा दुश्मन और कोई नहीं होता। तब दोनों भाई दाउद इब्राहिम जी के लिए काम करते थे। अबू साहब ने जब नई राह अपनाई तो दोसा जी को यह बात बर्दाश्त नहीं हुआ। भाई से दगाबाजी? तब से ही दोसा जी अबू साहब से नाराज थे। मन में था कि इसको तो मैं देख लूंगा। दोसा जी कई दिनों से उन चम्मच को चमका या यूं कहें घिर रहे थे जो उन्हें खाना खाने के लिए दी जाती है। जब चमक गई तो बस फिर क्या था। कर दिया अबू साहब पर हमला। पता चला है कि उन्हें गले में कुछ चोटें आई हैं। तुरंत उनकी दवाई कराई गई और अब वह विश्राम कर रहे हैं। हालांकि अबू साहब भी कम नहीं हैं। वो तो दोसा जी की सेहत अबू जी से अच्छी थी नहीं तो अबू जी भी कुछ कर देते तो कोई बड़ी बात नहीं।
एक सवाल यहां उठ रहा है कि क्या जेल में कैदियों को जो चम्मच दी जाती है वह भी बंद कर देनी चाहिए। हालांकि अभी तक इस तरह की कोई खबर नहीं आई है कि सरकार इस पर विचार कर रही है पर अगर एक दो इस तरह की वारदात हो गईं तो सरकार को सोचना होगा। मैं सरकार से थोड़ा पहले सोच ले रहा हूं। एक बात और अगर चम्मच बंद कर दी तो ये माननीय कैदी साहब लोग खाना कैसे खाएंगे। हाथ से? ऐसे तो उन्होंने कभी नहीं खाया। ठहरिए खाया तो है। जब अबू साहब आजमगढ़ में रहते थे तो कैसे खाते होंगे। तब तो गरीबी थी। तो शायद हाथों से ही खाते होंगे। और खाने से हाथ गंदे हो जाते थे तो उन्हें धोने के लिए साबुन भी नहीं मिलता था। मिट्टी से हाथ धोने पड़ते थे। लेकिन वो तो गुजरे जमाने की बात हो गई। अब तो चम्मच-कांटे और न जाने क्या क्या। अब कैसे हाथ से खाएंगे। हाथ मैले नहीं हो जाएंगे? खैर यह दूर की कौड़ी है। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।
हां, सरकार जिस बात को लेेकर परेशान है वह परम आदरणीय मोहम्मद आमिर अजमल कसाब साहब की सुरक्षा है। इतनी महान शख्सियत की सुरक्षा में कहीं सेंध न लग जाए इसको लेकर सरकार के कान खड़े हो गए हैं। अगर कसाब को कुछ हो गया तो क्या होगा। पाकिस्तान को क्या जवाब देगी हमारी सरकार? क्या किया हमारे कसाब के साथ? हमारा एक आदमी भी ठीक से नहीं रख पाए और बातें करते हो? चलो जाओ हम तुमसे कोई बात नहीं करेंगे। आतंकवाद पर भी नहीं। हमारा लाल कसाब कहां है?
आम आदमी जो देश के लिए मरा जा रहा है, देश की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देश की सेवा कर रहा है, देश की अर्थव्यवस्था में कोई न कोई सहयोग दे रहा है। तिरंगे को अपनी आन, बान और सम्मान समझता है। उसकी हमारी सरकार को कोई फिक्र नहीं। यहां एक सवाल और भी उठता है। यह आम आदमी है कौन? सवाल किया तो जवाब आया जो आम के मौसम में भी जो आम न खा पाए वही आम आदमी है। तो साहब यह तो आम का मौसम चल रहा है। मैं देखता हूं कि बहुत बड़ी संख्या में लोग आम नहीं खा पा रहे हैं। दुकानों और ठेलियों पर रखे आम सड़ रहे हैं पर कोई खरीदार नहीं मिल रहा। क्यों? जवाब वही महंगाई डायन खाए जात है।
खैर, महंगाई की बात फिर कभी, फिलहाल महान लोगों की हो रही थी। बात यहीं खत्म करना चाहता हूं। सवाल कई हैं और जवाब सरकार को तलाशने हैं। जो सरकार तय करेगी हम सभी को मानना है, क्योंकि सरकार तो हम सबने मिलकर बनाई है ना। तो ठीक है साहब ईश्वर से यही प्रार्थना है कि अबू साहब, दोसा साहब और अजमल साहब की सुरक्षा में कोई सेंध न लगे नहीं तो गजब ही हो जाएगा। जरा संभलकर..................
सोमवार, मई 03, 2010
अजमल आमिर कसाब

अजमल आमिर कसाब। है तो एक आतंकी का नाम लेकिन आज उसे बच्चा बच्चा जानता है। बचपन में सुना था कि या तो बहुत अच्छे बन जाओ या फिर बहुत बुरे। जो बहुत अच्छा काम करते हैं या तो वे याद रखे जाते हैं या फिर दो दुष्टता की हद पार कर जाते हैं वे जाने जाते हैं। बाकी बीच के लोगों को कोई नहीं जानता। आज वह बात सही सी लग रही है। कसाब को बच्चा बच्चा इसलिए जानता है कि उसे जघन्यता की सारी हदें पार कर दीं। बहुत संभव है कि इसमें मीडिया का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। अखबारों और टीवी में उसकी खबरें खूब प्रमुखता से छापी और दिखाई गईं। और जब लगातार तीन दिन तक मुंम्बई पर आतंकी साया रहा तब तो लाइव दिखाया गया। लगातार लाइव। अब २४ घंटे में कोई समय तो एेसा आएगा ही जब बच्चा टीवी देखेगा कि कभी नहीं देखेगा। खैर यह मुद्दा नहीं है। मूल बात कुछ और ही है।
वही हुआ जिसकी उम्मीद थी और जो होना चाहिए था। अजमल आमिर कसाब को अदालत ने दोषी करार दे दिया है। यानी उसके ऊपर जो आरोप लगे वे सही हैं। अब बहस होगी कि उसे सजा क्या दी जाए। इस पर तरह तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि उसे मौत की सजा दे कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। कोई कह रहा है कि मौत की सजा से क्या होगा। उसे जिन्दा रख कर ऐसी सजा दी जाए जो वह याद रखे। अजमल तो खुद ही चाहता है कि उसे मार दिया जाए। कुछ लोगों को मत इससे हटकर है। उनका कहना है कि यह सब सजाएं तो किसी को भी मिल ही जाती हैं। पहले से चली आ रही हैं यानी परम्परागत सजाएं हैं। अजमल भारत के ऊपर अब तक के इतिहास में हुए सबसे बड़े हमले का आरोपी है। उसने 166 भारतीयों क जान ली है। इन 166 लोगों में विजय सालस्कर,हेमंत करकरे और अशोक काम्टे जैसे भारत के सपूतों को मार डाला हो। उसे कोई परम्परागत सजा कैसे मिल सकती है। इस जघन्य अपराध के लिए तो कोई नई सजा बनानी चाहिए, जिसे देख कर कोई भी कांप जाए और आतंक फैलाने वालों और उनका साथ देने वाले अपना काम करने से पहले सौ बार सोचें। अदालत को इसके लिए कुछ खास कदम उठाने चाहिए। उसी पिटी पिटाई लकीर पर चलकर कुछ नहीं होगा। इस तरह की परम्परागत सजा कितनों को मिली। कितनों को उम्रकैद दी गई और कितनों को फांसी की सजा दी गई। उससे क्या हुआ।
इन्हीं सब बातों के बीच एक सवाल मेरे जहन में भी कौंधा। सवाल यह कि अदालत ने अगर कसाब को दोषी माना है तो बहुत हद तक संभव है कि उसे उम्रकैद तो न ही हो। हो सकता है उसे फांसी की सजा दे दी जाए। लेकिन असल सवाल सही है कि क्या उसे फांसी पर लटकाया जा सकेगा। क्या अब तक आतंक फैलाने वालों को अदालत से फांसी की सजा दी गई उन्हें लटका दिया गया। क्या अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। यही भारतीय लोकतंत्र की कहें या किसी भी कहें विडम्बना है। वे सब अभी जिंदा हैं और शान से रह रहे हैं। यही नहीं जिस देश के खिलाफ उन्होंने षड्यंत्र रचा जिस देश के लोगों को उन्होंने माना उसी देश के लोगों की मेहनत की रोटी वे खा रहे हैं। उनके लिए सुरक्षाकर्मी भी तैनात किए गए हैं। बस यही सवाल मुझे परेशान कर रहा है। मैं खुद यह समझ नहीं पा रहा हूं कि अजमल आमिर कसाब को क्या सजा मिलनी चाहिए। क्या उसे मौत दे देनी चाहिए या फिर जिंदा रखकर ऐसा सबक सिखाना चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। कुछ भी हो लेकिन मेरा खुद का मानना भी यही है कि कुछ तो खास इस बार होना चाहिए। हालांकि, इस बात पर संतोष जाहिर किया जा सकता है कि यह केस मात्र ५२१ दिन में ही पूरा हो गया और उसे दोषी करार दिया गया। शायद यही कारण है कि लोगों में न्यायपालिका के प्रति थोड़ा बहुत सम्मान अभी बचा है। अगर सजा का निर्धारण भी जल्द कर लिया जाए और उसका क्रियान्वयन भी ध्रुत गति से हो तो शायद लोगों के मन में यह आए कि चलो कोई हो या न हो लेकिन न्यायपालिका अभी जिंदा है और उस पर भरोसा किया जा सकता है।
हालांकि, इस आपाधापी के जीवन में बहुत कम लोग एेसे होते हैं जो ब्लॉग के लेख को पूरा पढ़ते हैं। कुछ लोग चार लाइनें पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं। यह जरूरी नहीं कि जो टिप्पणी कर रहा है उसने पूरी पोस्ट पढ़ी ही हो। फिर भी मेरा फर्ज है इसलिए लिख रहा हूं कि अगर आपने पूरी पोस्ट पढ़ी है और टिप्पणी करने का मन कर रहा है तो कृपया कम से कम इस पोस्ट पर चलताऊ टिप्पणी न करें। अगर हो सके तो यह बताएं कि अजमल आमिर कसाब को क्या सजा दी जा सकती है। क्या हो सकता है। हालांकि यह बहुत छोटा मंच है। यहां लिखने से कोई खास फर्क पडऩे वाला नहीं है। जो न्यायाधीश इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं वह इस ब्लॉग को नहीं पढ़ेंगे और मैं कहता हूं पढ़ भी लें तो आपके कहने से सजा का निर्धारण नहीं करेंगे। लेकिन फिर भी यह मामला चुंकि बहुत संवेदनशील है इसलिए उतनी ही संवेदनशीलता से ही टिप्पणी कीजिएगा। कुछ समझ में न आए तो कुछ मत कीजिएगा पर फिर वही बात कहूंगा कि चलताऊ टिप्पणी कृपया इस पोस्ट पर न करें।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)