कैसी विडम्बना है। जो हमें फूटी आंख नहीं सुहाने चाहिए। जिन्हें देखते ही गोली मार देनी चाहिए। उनकी हम इतनी सुरक्षा करते फिरते हैं कि कहीं उनके बाल की खाल भी भी बांकी न हो जाए। अगर उन पर कोई हमला करता है तो हम उन्हें बचाते हैं और चोट लग जाने पर मरहम पट्टी करते हैं। दवाई का खर्चा भी हमारा ही।
जी, बात कर रहा हूं। अबू सलेम साहब की। अरे साहब न कहूं तो क्या कहूं। साहब जैसा ही तो ठाट है उनका। आम आदमी मरे चाहे जिए, किसी को कोई परवाह नहीं। पर अबू साहब को कुछ हो जाए तो सरकार के कान के बाल खड़े हो जाते हैं। अरे ये कैसे हो गया? उन जनाब पर हमला हो गया, घायल हो गए। हमलावर कौन? उनके ही पुराने साथी मुस्तफा दोसा साहब। दोनों जनों ने मिलकर 12 मार्च 1993 में मुंबई में सिलसिलेवार बम विस्फोट किए। तब दोनों साथी थे। यानी हमजोली। अब दुश्मन हो गए, एक दूसरे की खून के प्यासे। कहते भी हैं दोस्त अगर दुश्मन हो जाए तो उससे बड़ा दुश्मन और कोई नहीं होता। तब दोनों भाई दाउद इब्राहिम जी के लिए काम करते थे। अबू साहब ने जब नई राह अपनाई तो दोसा जी को यह बात बर्दाश्त नहीं हुआ। भाई से दगाबाजी? तब से ही दोसा जी अबू साहब से नाराज थे। मन में था कि इसको तो मैं देख लूंगा। दोसा जी कई दिनों से उन चम्मच को चमका या यूं कहें घिर रहे थे जो उन्हें खाना खाने के लिए दी जाती है। जब चमक गई तो बस फिर क्या था। कर दिया अबू साहब पर हमला। पता चला है कि उन्हें गले में कुछ चोटें आई हैं। तुरंत उनकी दवाई कराई गई और अब वह विश्राम कर रहे हैं। हालांकि अबू साहब भी कम नहीं हैं। वो तो दोसा जी की सेहत अबू जी से अच्छी थी नहीं तो अबू जी भी कुछ कर देते तो कोई बड़ी बात नहीं।
एक सवाल यहां उठ रहा है कि क्या जेल में कैदियों को जो चम्मच दी जाती है वह भी बंद कर देनी चाहिए। हालांकि अभी तक इस तरह की कोई खबर नहीं आई है कि सरकार इस पर विचार कर रही है पर अगर एक दो इस तरह की वारदात हो गईं तो सरकार को सोचना होगा। मैं सरकार से थोड़ा पहले सोच ले रहा हूं। एक बात और अगर चम्मच बंद कर दी तो ये माननीय कैदी साहब लोग खाना कैसे खाएंगे। हाथ से? ऐसे तो उन्होंने कभी नहीं खाया। ठहरिए खाया तो है। जब अबू साहब आजमगढ़ में रहते थे तो कैसे खाते होंगे। तब तो गरीबी थी। तो शायद हाथों से ही खाते होंगे। और खाने से हाथ गंदे हो जाते थे तो उन्हें धोने के लिए साबुन भी नहीं मिलता था। मिट्टी से हाथ धोने पड़ते थे। लेकिन वो तो गुजरे जमाने की बात हो गई। अब तो चम्मच-कांटे और न जाने क्या क्या। अब कैसे हाथ से खाएंगे। हाथ मैले नहीं हो जाएंगे? खैर यह दूर की कौड़ी है। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।
हां, सरकार जिस बात को लेेकर परेशान है वह परम आदरणीय मोहम्मद आमिर अजमल कसाब साहब की सुरक्षा है। इतनी महान शख्सियत की सुरक्षा में कहीं सेंध न लग जाए इसको लेकर सरकार के कान खड़े हो गए हैं। अगर कसाब को कुछ हो गया तो क्या होगा। पाकिस्तान को क्या जवाब देगी हमारी सरकार? क्या किया हमारे कसाब के साथ? हमारा एक आदमी भी ठीक से नहीं रख पाए और बातें करते हो? चलो जाओ हम तुमसे कोई बात नहीं करेंगे। आतंकवाद पर भी नहीं। हमारा लाल कसाब कहां है?
आम आदमी जो देश के लिए मरा जा रहा है, देश की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देश की सेवा कर रहा है, देश की अर्थव्यवस्था में कोई न कोई सहयोग दे रहा है। तिरंगे को अपनी आन, बान और सम्मान समझता है। उसकी हमारी सरकार को कोई फिक्र नहीं। यहां एक सवाल और भी उठता है। यह आम आदमी है कौन? सवाल किया तो जवाब आया जो आम के मौसम में भी जो आम न खा पाए वही आम आदमी है। तो साहब यह तो आम का मौसम चल रहा है। मैं देखता हूं कि बहुत बड़ी संख्या में लोग आम नहीं खा पा रहे हैं। दुकानों और ठेलियों पर रखे आम सड़ रहे हैं पर कोई खरीदार नहीं मिल रहा। क्यों? जवाब वही महंगाई डायन खाए जात है।
खैर, महंगाई की बात फिर कभी, फिलहाल महान लोगों की हो रही थी। बात यहीं खत्म करना चाहता हूं। सवाल कई हैं और जवाब सरकार को तलाशने हैं। जो सरकार तय करेगी हम सभी को मानना है, क्योंकि सरकार तो हम सबने मिलकर बनाई है ना। तो ठीक है साहब ईश्वर से यही प्रार्थना है कि अबू साहब, दोसा साहब और अजमल साहब की सुरक्षा में कोई सेंध न लगे नहीं तो गजब ही हो जाएगा। जरा संभलकर..................
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रविवार, जुलाई 25, 2010
शनिवार, जुलाई 10, 2010
काफिले में बुझा चिराग-ए-अमन
एक हिन्दू और एक मुसलमान। जब खाप पंचायत के नाम पर लोग एक ही सम्प्रदाय में विवाह के लिए मौत तक का फरमान जारी कर सकते हैं ऐसे में अलग अलग सम्प्रदायों को मानने वाले शादी के बारे में कैसे सोच सकते हैं। खासकर हिन्दू और मुसलमान में तो बिल्कुल भी नहीं। लेकिन, उन्होंने न सिर्फ सोचा बल्कि किया भी।
तसदुद्दीन और ऊषा शर्मा ने विवाह के लिए परिवार वालों, आस पड़ोस वालों और समाज से न जाने क्या क्या सुना। लेकिन, किसी की परवाह नहीं की। प्यार किया, शादी की और इज्जत के साथ समाज में रहने लगे। कुछ दिन बाद उनके एक पुत्र हुआ। नाम रखा 'अमनÓ। इसलिए कि लोगों को बताना जो था कि एक हिन्दू और मुसलमान शादी करके कैसे अमन के साथ जी सकते हैं। ये कट्टरवादियों के मुंह पर एक जोरदार तमाचे की तरह था। लेकिन.... लेकिन.... लेकिन शायद उनकी यह खुशी कुछ ही दिन की थी। दस साल का होते होते अमन मौत के आगोश में समा चुका था। एक तरह से उसकी हत्या की गई थी। और हत्या का कारण बना हमारे देश का प्रधानमंत्री। जी, मनमोहन सिंह।
अमन एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया। परिजन उसे लेकर अस्पताल जा रहे थे, लेकिन उसी दिन हमारे प्रधानमंत्री जी उसी शहर कानपुर में आना था। उनकी सुरक्षा के लिए ऐसे बंदोबस्त की परिंदा भी आसमान से उडऩे से पहले घबरा जाए और दस बार सोचे। एक तरफ उनकी सुरक्षा में लगे जवान और दूसरी ओर अपने घर के इकलौते चिराग की जान की भीख मांगते अमन के माता पिता। हालात ऐसे कि किसी का भी कलेजा मुंह में आ जाए, लेकिन अमन को खून से तर-बतर देखने के बाद भी किसी का दिल नहीं पसीजा। उन्हें अस्पताल नहीं जाने दिया गया। सो तसदुद्दीन और उषा का इकलौता चिराग और हिन्दू -मुस्लिम एकता का प्रतीक रास्ते में ही मिट गया।
संभव है अगर अमन सही समय पर अस्पताल पहुंच गया होता तो बच जाता। लेकिन, अफसोस ऐसा नहीं हो सका। मैं प्रधानमंत्री की सुरक्षा की खिलाफत नहीं कर रहा। किसी भी देश के प्रधानमंंत्री की सुरक्षा की जानी चाहिए। बात जब भारत की हो तो मामला और भी गंभीर हो जाता है। लेकिन, सुरक्षा के नाम पर किसी की बलि ले ली जाए तो कहना पड़ता है। सुरक्षा अपनी जगह है पर आम आदमी की जान की कुछ तो कीमत होनी चाहिए। क्या प्रधानमंत्री की सुरक्षा में जवान अपने वाहन से अमन को अस्पताल नहीं ले जा सकते थे? अगर किसी नेता या अधिकारी के साथ या उनके परिजन के साथ ऐसा होता तो भी जवान ऐसे ही अपना कत्र्तव्य निभाते या फिर कोई रास्ता निकालते ? एक बड़ा सवाल यहां यह भी उठता है कि अमन की मौत का जिम्मेदार किसे माना जाए? प्रधानमंत्री को ? इस व्यवस्था को ? या फिर किसी और को ? जाहिर सी बात है जिम्मेदार किसी और को ही माना जाएगा। कोई और इतना शक्तिशाली जो नहीं है। मामला कोई भी हो गलत काम की जिम्मेदारी हमेशा कमजोर की ही बनती है। क्योंकि उसकी सबसे बड़ी गलती यही है कि वह कमजोर है। और विडम्बना ये है कि वह शक्तिशाली बन भी नहीं सकता। क्योंकि शक्तिशाली नहीं चाहेंगे कि कोई कमजोर उनके करीब आए।
दुखियारी मां ने प्रधानमंत्री से तो कुछ नहीं कहा, क्योंकि देश की जनता की तरह वह अभागी भी जानती है कि वे कुछ नहीं कर सकते। हालांकि उसने सोनिया गांधी से जरूर गुहार लगाई है। उषा ने उन्हें एक पत्र लिखा है और याद दिलाया है कि अपनों से दूर होने का गम कैसा होता है और जब हालात ऐसे हों। उषा ने अपने लिए कोई मुआवजा नहीं मांगा है बल्कि इस व्यवस्था को बदलने की मांग की है। ऐसी व्यवस्था किस काम की जो आम आदमी की जान ले ले।
लगता तो नहीं कि व्यवस्था में कुछ परिवर्तन होगा, हां उसे अपने बेटे की मौत के बदले में कुछ लाख रुपए की मुआवजा राशि जरूर दे दी जाएगी कि ये लो तुम्हारे बेटे की कीमत और चुप हो जाओ, जो चल रहा है उसे चलने दो........
तसदुद्दीन और ऊषा शर्मा ने विवाह के लिए परिवार वालों, आस पड़ोस वालों और समाज से न जाने क्या क्या सुना। लेकिन, किसी की परवाह नहीं की। प्यार किया, शादी की और इज्जत के साथ समाज में रहने लगे। कुछ दिन बाद उनके एक पुत्र हुआ। नाम रखा 'अमनÓ। इसलिए कि लोगों को बताना जो था कि एक हिन्दू और मुसलमान शादी करके कैसे अमन के साथ जी सकते हैं। ये कट्टरवादियों के मुंह पर एक जोरदार तमाचे की तरह था। लेकिन.... लेकिन.... लेकिन शायद उनकी यह खुशी कुछ ही दिन की थी। दस साल का होते होते अमन मौत के आगोश में समा चुका था। एक तरह से उसकी हत्या की गई थी। और हत्या का कारण बना हमारे देश का प्रधानमंत्री। जी, मनमोहन सिंह।
अमन एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया। परिजन उसे लेकर अस्पताल जा रहे थे, लेकिन उसी दिन हमारे प्रधानमंत्री जी उसी शहर कानपुर में आना था। उनकी सुरक्षा के लिए ऐसे बंदोबस्त की परिंदा भी आसमान से उडऩे से पहले घबरा जाए और दस बार सोचे। एक तरफ उनकी सुरक्षा में लगे जवान और दूसरी ओर अपने घर के इकलौते चिराग की जान की भीख मांगते अमन के माता पिता। हालात ऐसे कि किसी का भी कलेजा मुंह में आ जाए, लेकिन अमन को खून से तर-बतर देखने के बाद भी किसी का दिल नहीं पसीजा। उन्हें अस्पताल नहीं जाने दिया गया। सो तसदुद्दीन और उषा का इकलौता चिराग और हिन्दू -मुस्लिम एकता का प्रतीक रास्ते में ही मिट गया।
संभव है अगर अमन सही समय पर अस्पताल पहुंच गया होता तो बच जाता। लेकिन, अफसोस ऐसा नहीं हो सका। मैं प्रधानमंत्री की सुरक्षा की खिलाफत नहीं कर रहा। किसी भी देश के प्रधानमंंत्री की सुरक्षा की जानी चाहिए। बात जब भारत की हो तो मामला और भी गंभीर हो जाता है। लेकिन, सुरक्षा के नाम पर किसी की बलि ले ली जाए तो कहना पड़ता है। सुरक्षा अपनी जगह है पर आम आदमी की जान की कुछ तो कीमत होनी चाहिए। क्या प्रधानमंत्री की सुरक्षा में जवान अपने वाहन से अमन को अस्पताल नहीं ले जा सकते थे? अगर किसी नेता या अधिकारी के साथ या उनके परिजन के साथ ऐसा होता तो भी जवान ऐसे ही अपना कत्र्तव्य निभाते या फिर कोई रास्ता निकालते ? एक बड़ा सवाल यहां यह भी उठता है कि अमन की मौत का जिम्मेदार किसे माना जाए? प्रधानमंत्री को ? इस व्यवस्था को ? या फिर किसी और को ? जाहिर सी बात है जिम्मेदार किसी और को ही माना जाएगा। कोई और इतना शक्तिशाली जो नहीं है। मामला कोई भी हो गलत काम की जिम्मेदारी हमेशा कमजोर की ही बनती है। क्योंकि उसकी सबसे बड़ी गलती यही है कि वह कमजोर है। और विडम्बना ये है कि वह शक्तिशाली बन भी नहीं सकता। क्योंकि शक्तिशाली नहीं चाहेंगे कि कोई कमजोर उनके करीब आए।
दुखियारी मां ने प्रधानमंत्री से तो कुछ नहीं कहा, क्योंकि देश की जनता की तरह वह अभागी भी जानती है कि वे कुछ नहीं कर सकते। हालांकि उसने सोनिया गांधी से जरूर गुहार लगाई है। उषा ने उन्हें एक पत्र लिखा है और याद दिलाया है कि अपनों से दूर होने का गम कैसा होता है और जब हालात ऐसे हों। उषा ने अपने लिए कोई मुआवजा नहीं मांगा है बल्कि इस व्यवस्था को बदलने की मांग की है। ऐसी व्यवस्था किस काम की जो आम आदमी की जान ले ले।
लगता तो नहीं कि व्यवस्था में कुछ परिवर्तन होगा, हां उसे अपने बेटे की मौत के बदले में कुछ लाख रुपए की मुआवजा राशि जरूर दे दी जाएगी कि ये लो तुम्हारे बेटे की कीमत और चुप हो जाओ, जो चल रहा है उसे चलने दो........
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