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मंगलवार, फ़रवरी 22, 2011

खेल के लिए शुभसंकेत



आखिरकार इंग्लैंड ने नीदरलैंड को हरा दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जीत जीत है। कहने को कहा जा सकता है कि जीत आखिर जीत होती है चाहे जैसे प्राप्त की जाए। यह सही भी है। अंत में येन केन प्रकारेण हासिल की गई जीत ही मायने रखती है।
अब जरा इस जीत और हार का विश्लेषण कर लिया जाए। नीदरलैंड हार भले ही गया हो पर यह सच है कि उसने सबका मन मोह लिया और 100 ओवर के मैच में कई बार ऐसा लगा कि वह मैच जीत भी सकता है। दीगर है कि क्रिकेट का कम अनुभव और अक्सर इस तरह की स्थिति न आने के कारण ही नीदरलैंड को इस हार का सामना करना पड़ा। लेकिन इस बीच यह तय हो गया है कि नीदरलैंड आने वाले मैचों में अन्य टीमों को कड़ा मुकाबला देगी और इतनी आसानी से किसी को जीतने नहीं देगी जितना आसान शिकार उसे अब तक समझा जा रहा था।
एक दिन पहले ही हुए एक और मैच ने क्रिकेट के लिए आशाएं जगाने का काम किया है। यह मैच जिम्बाब्बे और आस्ट्रेलिया के बीच खेला गया। इसमें जिम्बाब्बे ने आस्ट्रेलिया की नाक में दम कर दिया था। लग ही नहीं रहा था एक दोयम दर्जे की टीम विश्वविजेता के खिलाफ खेल रही है। न सिर्फ विश्वविजेता बल्कि तीन बार की विश्वविजेता। जिस अंदाज में आस्टे्रलियाई कप्तान रिकी पोटिंग को चाल्र्स कोवेंट्री ने सीमा रेखा से गेंद फेंक कर रनआउट किया वह लम्बे समय तक याद रखा जाएगा। सबसे बड़ी बात जो इस बार अभी तक के मुकाबलों में छोटी टीमों की ओर से देखने को मिल रही है वह यह है कि वे जीतने के लिए खेल रही हैं। चाहे बांग्लादेश को या जिम्बाब्बे और नीदरलैंड का तो कहना ही क्या। यह बात अलग है कि कनाडा न्यूजीलैंड का आसान शिकार रहा। लेकिन यह तय है कि अगर कनाडा कि खिलाड़ी सजग और सचेत रहे तो वे भले कोई मैच न जीतें पर इस टूर्नांमेंट से बहुत कुछ लेकर जाने वाले हैं। कई क्रिकेट विश्लेषक टीवी पर कहते और अखबार में लिखते मिल जा रहे हैं, जो कह रहे हैं कि छोटी और दोयम दर्जे की टीमों को विश्वकप में नहीं खिलाना चाहिए। लेकिन मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पहले की क्रिकेट बहुत कम देशों के बीच खेला जाता है और उसमें भी अगर कुछ कमजोर टीमों को आप खेलने से बंचित कर देंगे तो कैसा विश्वकप। कुछ गिनी चुनी टीमें ही रह जाएंगी। फिर क्रिकेट अंतरराष्ट्रीय स्तर का खेल कैसे बन पाएगा। मुझे लगता है यह विचारणीय पहलू है। यही नहीं जब तक छोटी टीमें बड़ी टीमों से बड़े मुकाबले नहीं खेलेेंगी तब तक जीत के बारे में कैसे सोचेंगी। क्रिकेट जहां भी खेल और देखा जाता है वहां दीवानगी हद से ज्यादा लोग इसे प्यार करते हैं, लेकिन यह आलम बहुत कम देशों तक ही हैं। क्योंकि इसका उतना विस्तार नहीं हो सका जितना अन्य का हुआ है। इसलिए मुझे लगता है कि छोटी टीमों को भी बड़े मुकाबले खेलने चाहिए और अपनी प्रतिभा मुजायरा करना चाहिए।
अब तक हुए मैचों में जो तस्वीर निकलकर सामने आ रही है वह संतोषजनक है और उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे भी कुछ ऐसे मुकाबले देखने को मिलेंगे जिसमें छोटी टीमें बड़ी टीमों की नाक में दम कर देंगी। और सबसे ज्यादा मजा तो उस वक्त आएगा जब कोई बड़ा उलटफेर होगा। न जाने किस दिन किसी छोटी टीम का हो और वह ऐसा कर जाए कि किसी ने सोचा ही न हो। उसके बाद विश्वकप की दिशा और दशा दोनों में तत्काल बदलाव आ जाएगा। फिर आएगा खेल देखने का मजा...

शनिवार, फ़रवरी 19, 2011

आगाज, चौका, छक्का और जीत



विश्वकप का पहला मैच भारत ने जीत लिया। इस जीत में कई नई और अनोखी चीजें देखने को मिलीं। भारत की पारी जब ३७० रन पर खत्म हुई तो भारत की जीत पक्की हो गई थी, लेकिन जब बांग्लादेश के शेर मैदान पर उतरे तो लगा कि कहीं पांसा पलट न जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मैच भारत ही जीता।
इस मैच की खास बात यह रही कि भारत के वीरेंद्र सहवाग ने पहली गेंद का सामना किया और उस पर चौका जड़कर अपने विजयी अभियान की शुरुआत की। यही नहीं वीरेंद्र सहवाग ने ही इस विश्वकप का छक्का लगाया। सहवाग की वह बल्लेबाज रहे जिन्होंने इस विश्वकप का पहला शतक लगाया। हालांकि इसके बाद विराट कोहली ने भी शतक लगाया। इस मायने में आगे रहे कि उन्होंने विश्वकप के अपने पहले ही मैच में शतक लगा दिया। जो अपने आप में अनोखी बात है।
इस मैच में एक खास मंजर उस समय देखने को मिला जब सहवाग आंशिक रूप से घायल हो गए और गंभीर उनके रनर के रूप में मैदान पर आए। उस समय बांग्लादेश के मीरपुर के मैदान पर दिल्ली के तीन खिलाड़ी दिखाई दिए। इस दौरान तीनों हिन्दी वाली हिन्दी में बात करते भी सुने गए। ऐसा मौका कम ही आता है जब एक ही शहर के तीन खिलाड़ी मैदान पर दिखें।
सहवाग ने विश्वकप शुरू होने से पहले ही यह बता दिया था कि वे पूरे ५० ओवर मैदान पर टिकना चाहते हैं और इस बार उन्होंने इसके लिए प्रयास भी खूब किए। यह बात दीगर रही कि वे ४८वें ओवर में ही आउट हो गए। लेकिन इससे यह बात साफ हो गई है कि सहवाग अपने कहे पर अमल कर रहे हैं और यह विश्वकप उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है। उनकी चाहत है कि इस विश्वकप में वे अपने गुरु सचिन को तोहफा दें। जब सचिन रन आउट हुए तभी से लगा कि उन्होंने सचिन की जिम्मेदार अपने ऊपर ओढ़ ली है। पता ही नहीं चला कि सचिन आउट हो गए हैं। कई विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि अगर सहवाग पूरे पचास ओवर मैदान पर टिकेंगे तो अपना स्वाभाविक खेल नहीं खेल पाएंगे सहवाग ने इस पारी से दिखा दिया कि ऐसा नहीं है। जब तक वे क्रीज पर रहेंगे रन आते रहेंगे और तेजी से आते रहेंगे। अब मुझे लगाता है ऐसे लोगों शान्त हो जाना चाहिए।
अब बात जीत और हार की। एक बात गौर करें तो पाएंगे कि बांग्लादेश भले हार गया हो लेकिन उन्होंने यह दर्शा दिया है कि आगे जिन टीमों से उनका मुकाबला होगा वे सचेत हो जाएं। अगर कोई बांग्लादेश को हल्के में ले रहा है तो वह किसी मुगालते में न रहे। हालांकि इस बीच एक और बात सामने आई कि भारत को यहां गेंदबाजी में सुधार की जरूरत है।

शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

लो! शुरू हो गया खेल





चार साल के इंतजार के बाद आखिर फिर से विश्वकप शुरू होने वाला है। उद्घाटन कार्यक्रम हो चुका है। अब बारी असली खेल की है, यानी अब होगा बल्ले और गेंद का आमना-सामना। उद्घाटन कार्यक्रम इतना रंगारंग रहा कि मेरी भी दो महीने से अधिक की नींद टूटी और ब्लॉग लेखन फिर से शुरू हो गया। इतने दिनों की चुप्पी तोडऩे का शायद इससे अच्छा मौका हो भी नहीं सकता था।
सबसे पहले तो उन लोगों से माफी मांगना चाहता हूं, जो उस दौरान भी ब्लॉग पर आते रहे जिस समय मैंने कुछ नहीं लिखा। कभी-कभी तो ऐसा भी हुआ कि मैं खुद अपने ब्लॉग पर नहीं आ सका लेकिन लोग आए। हालांकि ऐसे लोग बहुत कम हैं जो मेेरे ब्लॉग पर नियमित या फिर अक्सर आते हैं फिर भी उन सीमित लोगो से ही मैं माफी चाहता हूं और अब यह आशान्वित कराना चाहता हूं कि अब विश्वकप क्रिकेट ही हर खबर इस ब्लॉग के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करूंगा।
अब बात क्रिकेट की। विश्वकप क्रिकेट की। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में शानदार कार्यक्रम हुआ। भारतीय उपमहाद्वीप में इससे पहले भी विश्वकप हुए लेकिन बांग्लादेश हर बार इससे महरूम रहा। इस बार उसे विश्वकप की मेजबानी का मौका मिला। इससे बड़ी बात और कोई नहीं हो सकती। भले बांग्लादेश में क्रिकेट का सबसे बड़ा महाकुंभ अब शुरू होने जा रहा हो लेकिन बांग्लादेश की टीम ने क्रिकेट में अपनी अलग पहचान बनाई है। बांग्लादेश की वह टीम थी, जिससे हार के कारण पिछले साल भारतीय टीम को पहले ही राउंड में टूर्नांमेंट से बाहर होना पड़ा। यही नहीं समय समय पर बांग्लादेश ने कई ऐसे मैच जीते जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। शायद इस बार भी बांग्लादेश कोई ऐसे मैच जीते, जिसके बारे में अभी सिर्फ कयास ही लगाए जा रहे हैं।
पहला मैच भारत और बांग्लादेश के बीच खेला जाएगा। भारत की कोशिश होगी की वह अपना विजयी अभियान यही से शुरू करे वहीं बांग्लादेश पिछली बार की सफलताओं को फिर से दोहराना चाहेगा। अभ्यास मैचों में टीमों ने अपना जलवा दिखाया। भारत ने अपने दोनों मैच जीते और दिखाया कि वह विजेता बनने की प्रबल दावेदार है। हालांकि आस्ट्रलिया अपने दोनों मैच हार गया लेकिन उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। आस्ट्रेलिया शुरू अपने माइंड गेम के लिए हमेशा से जाना जाता रहा है, हो न हो यह उसी का एक हिस्सा हो। और सबसे बड़ी बात हमें यह नहीं भूलन चाहिए कि आस्टे्रलिया अभी विश्वविजेता है और विश्व की नम्बर एक टीम भी।
भारत को जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा है, इसमें कोई बड़ी बात नहीं। 1983 में जब भारत ने विश्वकप जीता था तब से लेकर अब तक वह प्रबल दावेदार रहा है और इस बार भी है। यह बात अलग है कि वह इस कारनामें को फिर कभी दोहरा नहीं पाया। लेकिन क्या पता इस बार वह हो जाए जो 1983 के बाद नहीं हो सका। पाकिस्तान की बात करें तो उसे भी कप का दावेदार माना जा रहा है, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट हो रहा है लेकिन पाकिस्तान इससे इस बार महरूम हैं इसका असर उस पर दिख रहा है। पाकिस्तान के पक्ष में जो एक बात जा रही है वह यह है कि शाहिद आफरीदी इस टीम के कप्तान हैं। शुएब अख्तर वापसी कर चुके हैं। आफरीदी एक आक्रामक खिलाड़ी तो हैं ही इस बार उन्हें साबित करना होगा कि वह आक्रामक कप्तान भी हैैं। अगर शुरू के दो और इधर तीन विश्वकपों की बात छोड़ दी जाए तो कप उसी टीम ने जीता है जिसके बारे में बहुत कम चर्चा की जा रही थी। तो हो न हो इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिले। इंग्लैंड क्रिकेट का जनक है लेकिन क्रिकेट की सबसे बड़ी प्रतियोगिता का वह कभी विजेता नहीं बन पाया। इस बात का मलााल हर इंग्लैंडवासी को हमेशा रहा है। इस बार इंग्लिश टीम की कोशिश होगी कि वह खिताब पर पहली बार कब्जा कर ले।
खैर यह तो सब कयासों की बात है। खेल शुरू होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है और धीरे-धीरे सारी स्थिति साफ होती जाएगी। मैं एक बार फिर आपको बता दूं कि क्रिकेट विश्वकप की अधिकांश खबरें आपके पास तक पहुंचाने की कोशिश इस ब्लॉग के माध्यम से मैं करूंगा और प्रयास करूंगा कि वह खबरें आप तक पहुंचे जो किसी टीवी चैनल, अखबार या वेबसाइट पर नहीं होती। अगर आप मेरा मार्गदर्शन करेंगे तो अच्छा रहेगा। आप क्या चाहते हैं बताएंगे तो मजा आएगा।
फिलवक्त के लिए इतना ही बाकी अगली पोस्ट में। लो! शुरू हो गया खेल

रविवार, नवंबर 28, 2010

बस! बहुत हो गया क्रिकेट क्रिकेट

राष्ट्रमंडल खेलों के बाद अब एशियाड भी समाप्त हो गया। भारत को इस बार छठा स्थान प्राप्त हुआ। इस बार भी कई ऐसे खिलाडिय़ों ने भारत को गौरवांवित कराया, जिन्हें देश तो क्या उनके मोहल्ले के लोग ही नहीं जानते थे। अब साबित हो गया है कि राष्ट्रमंडल खेलों में मिली सफलता कोई तुक्का नहीं थी और न ही यह इसलिए मिली कि खिलाड़ी अपनी जमीन पर खेल रहे थे। कुल मिलाकर उन्होंने कड़ी मेहनत की और अच्छा प्रदर्शन किया जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें सफलता मिली।

राष्टमंडल खेलों की समाप्ति पर कई विशेषज्ञ इस बात पर चिंता जाहिर कर रहे थे कि क्या इतनी जल्दी हमारे खिलाड़ी फिर से अपने आप को तैयार करके वैसा ही प्रदर्शन दोहरा पाएंगे जैसा उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में किया। खिलाडिय़ों ने हाल के दिनों में अपने आप को मिले दो मौकों पर साबित कर दिया है और आगे भी अगर मौका मिलेगा तो वे किसी से पीछे नहीं रहेंगे और साबित कर देंगे। अब सरकार की बारी है कि वह इन नये सितारों को दिश दे जिससे यह और ऊंचाईयों को छू सकें।

मुझे लगता है अब क्रिकेट क्रिकेट का शोर बंद होना चाहिए। क्रिकेट के अलावा और भी खेल हैं। खास बात यह है कि ये खेल क्रिकेट जितना समय भी नहीं लेते और खिलाड़ी जीतकर भी दिखाते हैं। अब क्रिकेट के लिए पूरा दिन बर्बाद करने से कोई लाभ नहीं। हमें चीन की ओर देखना चाहिए, जो दो सौ स्वर्ण जीतने के करीब था। वह क्रिकेट नहीं खेलता। हम क्रिकेट में विश्व विजेता रहे लेकिन अन्य खेलों में कुछ नहीं कर पाए। अब जबकि नई पीढ़ी क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में रुचि ले रही है तो हमें उनका उत्साहवद्र्धन करना चाहिए। अगले कुछ समय में जनसंख्या के मामले में हम चीन को पीछे छोड़ देंगे। क्या यही एक क्षेत्र है जिसमें हम चीन को पछाड़ सकते हैं। हमारे युवा खिलाडिय़ों ने साबित कर दिया है कि बिना किसी खास टे्रनिंग के भी वे पदक जीत सकते हैं अगर उन्हें थोड़ा सा संबल मिल जाए तो वे और भी कमाल कर सकते हैं। हालांकि, हम लोग दिल्ली और दोहा को पीछे छोड़कर खुश हैं पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी तो यह आगाज है अब भारत सबकी निगाहों में आ गया है और अब असल परीक्षा शुरू होगी। शिखर पर पहुंचना आसान है लेकिन उसे कायम रखना मुश्किल होता है। अब यही मुश्किल काम हमें करना होगा।

मीडिया को भी इसमें अहम रोल अदा करना है। राष्ट्रमंडल खेल चूंकि दिल्ली में ही हो रहे थे, सो पदक जीतते ही मीडिया उन्हें अपने स्टूडियो में बुला रहा था। एक बारगी तो ऐसा लगा कि हर चैनल में होड़ सी है कि कौन सा चैनल पहले विजेताओं से बात करे। अब जबकि एशियन गेम्स के चैम्पियन आएंगे तो उनका स्वागत कैसे होता है। कौन चैनल विजेता के घर तक की स्थिति का जायजा लेता है। यह देखना होगा।

अक्सर क्रिकेट के अलावा किसी खेल में जीत के बाद कुछ देर तो हम उसे याद रखते हैं और फिर देखने लगते हैं क्रिकेट। अब इसमें बदलाव आना चाहिए। 1983 का विश्वकप जीतने के बाद देश में क्रिकेट क्रांति आई थी। हर बच्चा क्रिकेटर बनना चाहता था। उसी का परिणाम है कि आज क्रिकेट में हम नम्बर वन हैं। अब जबकि जिमनास्टिक में भी देश का नाम रोशन हो चुका है तो बच्चों और युवाओं के साथ-साथ उनके अभिभावकों को भी सोचना चाहिए कि उनका बच्चा क्रिकेट में 13 खिलाड़ी बन कर रहे या रेस में सबसे आगे आए। अब उन क्रिकेटरों से दूरी जरूरी है जो आराम करने के लिए समय तब मांगते हैं जब न्यूजीलैंड जैसी टीम हमारे घर में ही खेल रही है। उन्हें तब आराम की दरकार नहीं होती जब आईपीएल चल रहा होता है। आईपीएल में आराम न करने की वजह सब जानते हैं। अगर कोई क्रिकेटर वाकई देश के लिए खेलता है तो फिर आईपीएल से आराम ले ना कि किसी एक दिवसीय या टेस्ट शृंखला में। यह बदलाव का दौर है और मुझे यकीन है कि बदलाव खेल में भी आएगा...

गुरुवार, अगस्त 19, 2010

हंगाम है क्यों बरपा...



वीरेंद्र सहवाग। एक विस्फोटक बल्लेबाज। दुनिय भर के गेंदबाज उनके नाम से कांप जाते हैं। बहुत से लोग उनमें सचिन का अक्स देखते हैं। अब तक भारत के लिए 225 एक दिनी मैच खेल चुके हैं। सात हजार से अधिक रन बना चुके हैं। उन्होंने 12 शतक और 36 अद्र्धशतक लगाए हैं। टेस्ट क्रिकेट में तो उनका रिकॉड और भी अच्छा है। माना जाता है कि जब सहवाग बल्लेबाजी करते हैं तो भारतीय टीम के लिए खेलते हैं। उन्हें शतक और अद्र्धशतक की चिंता नहीं रहती। जब वह अपनी रौ में हों तो तभी आउट होते हैं जब वे खुद कोई गलती करें। शतक और अद्र्धशतक क्या दोहरे शतक के नजदीक होने पर भी वे दबाव में नहीं आते और तब भी छक्का लगा सकते हैं। ऐसा यूं ही नहीं कहा जाता। कई बार वे ऐसा करके दिखा भी चुके हैं।
लेकिन, यह क्या। सारी बातें धरी की धरी रह गईं। सहवाग शतक नहीं बना पाए तो यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया। क्यों भई? क्या सहवाग जैसा बल्लेबाज शतक के लिए इतना परेशान हो सकता है? मेरा व्यक्तिगत मानना है कि सहवाग जब चाहते हैं शतक लगा सकते हैं। दिक्कत ये है कि वे शतक की परवाह नहीं करते। एक दिनी और ट्वेंटी-20 क्रिकेट में बहुत कम देखने को मिलता है कि उन्हेंने जितने रन बनाए हो उससे ज्यादा गेंद खेली हों। लेकिन अब मेरी राय कुछ हद तक बदलने सी लगी है।
सचिन तेंदुलकर निर्विवाद रूप से देश के ही नहीं वरन् दुनिया के महान बल्लेबाज हैं। लेकिन उन पर अक्सर यह आरोप लगता रहता है कि वह टीम के लिए नहीं, रिकॉर्ड के लिए खेलते हैं। यह बात अलग है कि सचिन अब रिकॉर्ड के मोहताज नहीं बल्कि रिकॉर्ड उनके मोहताज हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि देसी या विदेशी किसी ने भी कभी भी सहवाग पर मजाक में ही सही यह आरोप लगाया हो।
मजे की बात तो यह है कि मैच के बाद सहवाग ने कहा कि श्रीलंकाई गेंदबाज ने हार से डर से उन्हें नो बॉल डाल दी। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इतने बड़े और विस्फोटक बल्लेबाज से इस तरह के बयान की उम्मीद कैसे की जा सकती है। क्या रंदीव के नो बाल डालने से श्रीलंका की हार टल गई। क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है कि लेकिन उस समय मैच की जो स्थिति थी, श्रीलंका के जीतने की संभावना कहीं से भी नहीं थी। फिर हार के डर से रंदीव नो बॉल कैसे फेंक सकते हैं।
सहवाग अभी लम्बे समय तक क्रिकेट खेलेंगे और शतक ही नहीं दोहरा शतक तक बनाने के अनेक मौके उनके पास आएंगे। उन्हें उस ओर ध्यान देना चाहिए। और अच्छा प्रदर्शन कर खुद के रिकॉर्ड की फिक्र किए बगैर भारत को जिताने पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि देश के लिए खेलने का मौका हर किसी को नहीं मिलता। उन्हें मौका मिला है तो अपने रिकॉड के लिए इतनी तुच्छ बात नहीं करनी चाहिए।
अब एक और महत्वपूर्ण बात, जो इस पूरे लेख को अपूर्ण करती है। मेरे यह सब लिखने का मतलब यह कतई नहीं निकला जाना चाहिए कि श्रीलंका ने जो किया वह ठीक किया। क्रिकेट को शायद इसलिए इतनी प्रसिद्धि मिली कि उसे भद्र जनों का खेल कहा जाता है। और श्रीलंका ने जो हरकत की वह निश्चित रूप से भद्र जनों वाली नहीं है। खेल को खेल की भावना से खेला जाना चाहिए। और यह बात श्रीलंका को ही नहीं भारत को भी ध्यान में रखना चाहिए। मेरा कहना और मानना सिर्फ इतना है कि पूरे मामले को इतना तूल नहीं दिया जाना चाहिए।
पूरे मामले में रंदीव को सजा मिल चुकी है उन्हें एक मैच के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। दिलशान का भी इसमें हाथ पाया गया इसलिए उन पर भी बैन लगाया गया है। संगकारा को भी चेतावनी दी गई है। यह सही है कि इन सब के बाद भी सहवाग की सेंचुरी वापस नहीं आ सकती पर सहवाग अगर अच्छा खेलेंगे तो फिर से शतक लगा सकते हैं।
अंत में बस इतना ही कहूंगा खेल का खेल ही रहने दो कोई नाम न दो....

शनिवार, अगस्त 07, 2010

सीरीज सार : भारत बनाम श्रीलंका




भारत ने श्रीलंका के साथ खेली जा रही तीन टेस्ट मैचों की सीरीज ड्रा कराने में कामयाबी हासिल कर ली है। बड़ी बात यह कि इस जीत के साथ ही भारत की नम्बर एक की पदवी भी बरकरार रही। अब सीरीज समाप्त हो गई है लिहाजा जरूरी है कि इस दौरान क्या क्या हुआ इस पर विचार किया जाए।
पहली बात तो यह हुई कि धौनी की किस्मत एक बार फिर उनके साथ रही। धौनी ने अब तक अपनी कप्तानी में कोई भी सीरीज नहीं गंवाई है। इस बार भी यह रिकॉर्ड कायम रहा। मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि धौनी किस्मत के धनी हैं, इस बार भी ऐसा ही कुछ हुआ। दूसरी बड़ी बात टेस्ट क्रिकेट से मुरलीधरन जैसे दिग्गज का जाना रहा। उन्होंने दूसरे टेस्ट के बाद संन्यास ले लिया। इतने बड़े और खुशमिजाज स्पिनर की ऐसी की खूबसूरत विदाई होनी थी जैसी की हुई है। श्रीलंकाई टीम पर उनका जाना कितना असर करेगा यह बाद में पता चलेगा। फिलहाल क्रिकेट के चाहने वालों को उनकी कमी खलती रहेगी।
अब बात भारतीय बल्लेबाजों के प्रदर्शन की। इसमें मैं सचिन का प्रदर्शन शामिल नहीं करूंगा, क्योंकि वह निर्विवाद रूप से महान बल्लेबाज हैं और उन पर मैं कोई टिप्पणी करके खतरा मोल लेना नहीं चाहता। बात सुरेश रैना से करते हैं। उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया। उन्होंने पहले की टेस्ट में शतक लगाया और इसके साथ ही वे मोहम्मद अजहरुद्दीन, सौरभ गांगुली और वीरेंद्र सहवाग जैसे दिग्गजों के क्लब में शामिल हो गए। वे बाएं हाथ के बल्लेबाज हैं। उनमें कहीं न कहीं सौरभ गांगुली की झलक मिलती है। सौरभ जैसा जुझारूपन उनमें है कि नहीं यह वक्त और जरूरत के मुताबिक ही पता चलेगा, लेकिन फिलवक्त उन्होंने उज्ज्वल भविष्य की आशा तो जगा ही दी है। अब बात वीवीएस लक्ष्मण की। एकदिनी क्रिकेट में भले वे असफल करार दे दिए गए हों पर टेस्ट क्रिकट में उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि उनका कोई जवाब नहीं। अक्सर लोग सचिन और उनके प्रदर्शन की बात करते हैं पर लक्ष्मण को बिसरा दिया जाता है। लक्ष्मण की उम्र 37 के आसपास है और उनकी कलाइयों का इस्तेमाल अब भी देखते ही बनता है। तीसरे टेस्ट के चौथे दिन भारत को जीत के लिए 257 रन का लक्ष्य मिला। भारत ने दिन का खेल खत्म होने तक 53 रन पर तीन अहम विकेट गवां दिए तो लगा कि भारत यह मैच बचा पाएगा कि नहीं, लेकिन ऐसे समय में अक्सर संकटमोचन बन कर आने वाले लक्ष्मण ने फिर अपनी अहम भूमिका निभाई और भारत को जीत के दरवाजे तक पहुंचाया। लक्ष्मण के साथ दिक्कत यह है कि वे अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी लाइम लाइट में नहीं आ पाते। शायद उन्हें इसका हुनर भी नहीं मालूम। वह अब तक सचिन, सौरभ और यहां तक की धौनी आदि की तरह युवाओं के लिए आइडियल नहीं बन पाए। जबकि यह भी सही है कि लक्ष्मण की बैटिंग स्टाइल से युवाओं को बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। टीम के भीतर जितना मान सम्मान लक्ष्मण को मिलता है उतना बाहर नहीं मिला पाता। खैर, यह युवाओं का मामला है वे किसे माने और किसे नहीं।
अब बात राहुल द्रविण की। दीवार के उपनाम से पहचाने जाने वाले इस बल्लेबाज ने इस बार निराश किया। मुझे पता है कुछ ही दिन में उनको लेकर तरह-तरह की अटकलें लगनी शुरू हो जाएंगी। कहा जाएगा कि दीवार ढह गई है, दीवार टूटने लगी है। पूरी सीरीज की बात करें तो राहुल तीन टेस्ट मैचों की छह पारियों में मिलाकर भी शतक नहीं लगा पाए। वे 19 की मामूली सी औसत से कुल 95 रन ही बना सके। इससे पहले दक्षिण अफ्रीका के दौरे में भी राहुल कुछ खास नहीं कर पाए। पहले राहुल को आउट करने के लिए गेंदबाजों में शर्त लगती थी लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। अब कुछ रन बनाने के बाद उन्हें भी साधारण तरीके से आउट कर दिया जाता है। ऐसे समय में जबकि बहुत से युवा अच्छा प्रदर्शन कर टीम में शामिल होने की दावेदारी पेश कर रहे हैं बहुत संभव है कि टेस्ट क्रिकेट से उनकी जल्द विदाई कर दी जाए। हालांकि मैं खुद नहीं चाहता कि ऐसा हो। भारत को अभी उनकी जरूरत है। राहुल की सौरभ गांगुली की तरह भले जुझारूपन की मिसाल नहीं दी जाती हो पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि वे भी बहुत जुझारू हैं और आने वाले दिनों में कोई शानदार पारी खेलकर सबका मुंह बंद कर दें तो कोई बड़ी बात नहीं। याद करिए वह दौर जब भारत के पास कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं था जो अच्छी कीपिंग के साथ-साथ टीम के लिए रन भी जोड़ सके। ऐसे में राहुल ने यह भूमिका बखूबी निभाई। राहुल टीम में बाहर जाते हैं या वे अच्छा प्रदर्शन कर फिर टीम का अहम हिस्सा बन जाएंगे यह समय पर ही पता चलेगा।
भारत की बात यहीं तक अब बात श्रीलंका की। श्रीलंका में सिर्फ एक ही खिलाड़ी बात करूंगा और वह है सूरज रांदिव। वह ऑफ स्पिन गेंदबाजी करते हैं और युवा हैं। दिग्गज मुरली के बाद श्रीलंका को एक ऐसे स्पिन की जरूरत है, जिससे विरोधी टीम के बल्लेबाज खौफ खाएं। हालांकि अजंता मेंडिस अच्छी गेंदबाजी कर रहे हैं पर बल्लेबाजों में उनका खौफ नहीं दिखता। रांदिव ने अभी दो ही टेस्ट खेले हैं और दूसरे टेस्ट में ही उन्होंने पांच विकेट झटक लिए। खास बात यह कि इसमें सचिन तेंदुलकर का विकेट भी शामिल है। श्रीलंका के लिए जहां यह शुभ संकेत हो सकता है वहीं विरोधी टीमों के लिए खतरे की घंटी। संभव है कि अपने नाम की तरह सूरज सबसे बड़ा सितारा बन जाएं।
भारत को अब श्रीलंका में ही 10 से त्रिकोणीय सीरीज खेलनी है। इसमें तीसरी टीम न्यूजीलैंड की होगी। बहुत से खिलाड़ी भारत वापस लौट आएंगे वहीं कुछ को टीम का हिस्सा बनने श्रीलंका जाना है। तो अब टेस्ट के पांच के दिन के खेल से मुक्ति और अब लीजिए एकदिनी क्रिकेट का मजा।

ये पोस्ट यहां भी प्रकाशित हुई।

सीरीज सार : भारत बनाम श्रीलंका

भारत -श्रीलंका सीरिज़, क्या खोया -क्या पाया -पंकज मिश्र

गुरुवार, जून 24, 2010

किस्मत के धोनी



आखिरकार 15 साल बाद फिर वह दिन आ ही गया जब भारत क्रिकेट के मामले में एक बार फिर एशिया का सिरमौर बन गया। क्रिकेट प्रेमी तो इस जीत से खुश हैं ही पर सबसे ज्यादा खुशी कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को होगी। धोनी इस बार बाल-बाल बच गए। एशिया कप फाइनल में हारने का मतलब धोनी की कप्तानी से विदायी भी हो सकती थी। जीत के बाद अब कुछ समय के लिए तो उन पर अंगुली नहीं ही उठेगी। यह भी दीगर है कि इस जीत में धोनी का कुछ खास योगदान नहीं रहा। उन्होंने फाइनल में 50 गेंद में 38 रन बनाए, जिसे केवल ठीक ठाक ही कहा जा सकता है, अगर बात एक दिनी मैच की हो तो।

मैं बार-बार और हर बार यही कहता रहा हूं कि धोनी किस्सत के धनी हैं और इस बार भी यही साबित हुआ। धोनी इस बात से तो खुश होंगे ही कि उन्होंने अपनी कप्तानी में 15 साल का सूखा समाप्त किया साथ ही उनकी खुशी का एक कारण और होगा वह हैं सचिन तेंदुलकर। यह टूर्नामेंट उन्होंने सचिन की गैर मौजूदगी में जीता है। एक समय था जब भारतीय क्रिकेट के बारे मेें कहा जाने लगा था कि सचिन के बगैर टीम नहीं जीतती। धोनी जबसे कप्तान बने हैं उनकी कोशिश रही है कि इस टैग से बचा जाए।

अब जरा यह समझने की कोशिश करते हैं कि धोनी की कप्तानी पर खतरा आखिर था क्यों। दरअसल उनकी कप्तानी काफी समय से खतरे में थी, पर वेस्टइंडीज में खेले गए टी-ट्वेंटी विश्व कप से जल्दी विदायी ने आग में घी का काम किया। जिन कारणों से धोनी को कप्तान बनाया गया था वही काफी समय से धोनी में देखने को नहीं मिल रहे थे। उनकी सबसे बड़ी समस्या यही थी कि जो रणनीति वे बनाते थे उसे मैदान में क्रियान्वित नहीं कर पा रहे थे और जब रणनीति मैदान में नहीं चलेगी तो उसका फायदा क्या ? अपनी बल्लेबाजी की तरह कप्तानी में भी जो आक्रामकता धोनी में दिखती थी वह अब न तो उनकी बल्लेबाजी में देखने को मिल रही है और न ही मैदान पर कप्तानी करते समय। कैप्टन कूल कहे जाने वाले धोनी अक्सर मैदान पर गर्म होते हुए भी दिखे हैं। इसका कारण कई वरिष्ठ खिलाडिय़ों का टीम में होना माना जा सकता है। यह बात सही है कि वरिष्ठों की मौजूदगी में कप्तानी करना किसी के लिए भी आसान नहीं होता और धोनी भी इससे दो चार हो रहे हैं। काबलियत इसी में है कि वरिष्ठों को पूरा सम्मान देकर भी उन्हें अच्छा खेल खेलने के प्रोत्साहित किया जाए।
२३ जून को फाइनल के रिहर्सल के तौर पर खेले गए मैच में जब पूरी टीम 209 रन बनाकर आउट हो गई तो लगा कि शायद इस बार भी कप हाथ से जाता रहेगा, लेकिन तारीफ करनी होगी दिनेश कार्तिक की जिन्होंने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन करते हुए 66 रन बनाए। हालांकि, उन्होंने इतने रन बनाने के लिए 126 गेंदें खेलीं। गेंदबाजी में नेहरा ने कमाल का प्रदर्शन किया और नौ ही ओवर में चार विकेट ले लिए। धोनी की कप्तानी में भारत ने अभी तक किसी टूर्नामेंट में 7 बार फाइनल मुकाबला खेला और उसमें से यह भारत की चौथी जीत है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि इस जीत के साथ ही धोनी एक नई शुरुआत करेंगे। जो क्षमताएं उनमें हैं उसका इस्तेमाल जरूरत पडऩे पर करेंगे, जिससे फिर उनकी कप्तानी पर सवाल न उठें।

सोमवार, जून 07, 2010

ये कैसी यंगिस्तान

भारतीय क्रिकेट टीम। सही नाम तो यही है। मोहम्मद अजहरुद्दीन के समय तक देश की क्रिकेट टीम को इसी नाम से पुकारा जाता था। कमान सौरभ गांगुली के हाथों में आई तो इसे 'टीम इंडियाÓ का नाम दे दिया गया। कहा गया कि इस टीम में एकता है। हर खिलाड़ी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी निष्ठा और लगन से कर रहा है।

वो एक जमाना था। समय बदला तो बाबू मोशाय गांगुली हाशिए पर चले गए और झारखंडी लाल महेंद्र सिंह धोनी को टीम की कमान सौंपी गई। जबकि युवराज सिंह इस पद के प्रबल दावेदार थे। खैर, जब सचिन को छोड़कर सभी वरिष्ठ खिलाडि़यों की विदाई हो गई तो टीम को यंगिस्तान कहा जाने लगा। यानी सभी खिलाड़ी युवा हैं, जोश से भरपूर। इसी यंगिस्तान की पहली परीक्षा गत दिनों हुई। श्रीलंका और जिम्बाब्वे जैसी अपेक्षाकृत कमजोर समझी जाने वाली टीम के साथ भारत ने त्रिकोणीय सिरीज में हिस्सा लिया। मजे की बात यह रही कि पहली ही परीक्षा में टीम की पोल खुल गई। टीम ने कुल चार मैच खेले। उनमें एक जीता और तीन हारे। खास बात यह रही कि तीन में से टीम ने दो मैच जिम्बाब्वे से हारे और सिरीज से बाहर हो गई। इससे पहले करीब साढ़े तीन साल पहले कुआलालंपुर में तीन देशों की सिरीज हुई थी, टीम उसमें फाइलन तक नहीं पहुंच पाई थी। इस सिरीज में दूसरी टीमें ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज थीं। लेकिन, गौर करें तो पता चल जाएगा कि उस हार में और इस हार में कितना फर्क है। ऑस्टे्रलिया और वेस्टइंडीज किसी भी टीम को हरा सकती हैं। उस समय टीम भी इतनी युवा नहीं थी। युवाओं और अनुभव का अच्छा तालमेल उस टीम में था। लेकिन, इस बात तो यंगिस्तान उससे हार गई जो कमजोर मानी जाती है। हालांकि, मैं मानता हूं कि क्रिकेट में कोई भी टीम बड़ी या छोटी नहीं होती वही टीम जीतती है जो उस दिन अच्छा प्रदर्शन करती है। तो क्या माना जाए कि भारत ने जिम्बाब्वे के खिलाफ लगातार दो मैचों में घटिया प्रदर्शन किया। उसी टीम ने जिसे भविष्य की टीम माना जा रहा है और यंगिस्तान के नाम से पुकारा जा रहा है। इस सिरीज से यह पता लग गया है कि इस टीम के खिलाड़ी कितने पानी में हैं।


खैर, अब बात उस टीम की जो एशिया कप के लिए चुनी गई है। टूर्नामेंट १५ जून से होना है। कुछ ही देर पहले इसके लिए टीम का चयन किया गया। इसमें युवराज सिंह को टीम में शमिल नहीं किया गया है। कारण है लगातार लचर प्रदर्शन, जो आईपीएल से ही शुरू हो गया था और अब तक जारी है। वे भी यंगिस्तान के सदस्य माने जाते हैं। अब बात उन अन्य खिलाडि़यों की जो यंगिस्तान के सदस्य हैं पर उन्हें इस सिरीज के लिए टीम में शामिल नहीं किया गया। युसुफ पठान, जो सिर्फ आईपीएल में ही चलते हैं। बाकी जब उन्हें भारत की तरफ से खेलना हो तो पता नहीं उनका दमखम कहां चला जाता है। कभी-कभी तो लगता है कि युसुफ के बल्ले से शॉट पैसे देखकर ही निकलते हैं। जितने ज्यादा पैसे उतना ही जोरदार शॉट। नहीं तो वे बल्ला लिए खड़े रहेंगे और गेंद उनकी गिल्लियां बिखेर देगी। दिनेश कार्तिक, जो आईपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स के सदस्य हैं और अच्छे बल्लेबाज माने जाते हैं। उनके साथ एक समस्या धोनी की भी है। धोनी भी विकेट कीपर हैं और कार्तिक भी। एेसा बहुत कम होता है कि टीम में दो विकेट कीपर शामिल किए जाएं और धोनी को हटाना फिलहाल किसी के वश की बात नहीं दिखती। लेकिन, इसके बाद भी इतने समय तक एक बल्लेबाज की हैसियत से टीम में बने रहना उनके लिए बड़ी बात है। वे एक दो रन चुराने में माहिर माने जाते हैं। वैसे ही जैसे मोहम्मद कैफ माने जाते हैं। लेकिन, लगता है अब टीम को एक-एक, दो-दो बनाने वाले नहीं बल्कि एेसे लोग चाहिए जो चौका-छक्का लगाएं। भले वे टीम को जिता न पाएं। एक और नाम है जो एशिया कप की टीम लिस्ट में नहीं है वह है अमित मिश्रा का। एक एेसा भी समय था जब अमित को अनिल कुंबले की जगह भरने वाला बताया गया था। अब हालात यह हैं कि उन्हें उस टीम में भी जगह नहीं मिल पा रही है जो किसी बड़े टूर्नामेंट में खेलने जा रही है। अंतिम एकादश की तो बात ही छोड़ दीजिए।


और अब बात सचिन की। सचिन श्रीलंका में एशिया कप में खेलने नहीं जा रहे हैं। उन्होंने चयन समिति से खुद को टीम में शामिल न करने का आग्रह किया था। बताया जा रहा है कि वे कुछ समय अपने बच्चों के साथ बिताना चाहते हैं। यह सही बात है, अतिव्यस्त क्रिकेट कार्यक्रम की वजह से खिलाड़ी अपने परिवार के साथ समय नहीं गुजार पाते। जब तक पूरी टीम श्रीलंका में एशिया की सबसे बेहतर टीम होने की लड़ाई लड़ेगी सचिन परिवार के साथ रहेंगे। बहुत संभव है कि मसूरी भी जाएं। वे अक्सर छुट्टियां बितानें मसूरी में अपने मित्र नारंग के यहां जाते हैं। लेकिन, अब दूसरी बात। क्या सचिन वास्तव में परिवार के साथ समय गुजारना चाहते हैं इसलिए श्रीलंका नहीं जा रहे। यह बात ठीक हो सकती है। पर दूसरा कारण इससे बड़ा है। दरअसल सचिन २०१२ का विश्वकप खेलना चाहते हैं, यह बात वह कई बार कह भी चुके हैं और उससे पहले कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहते। मसलन कल को अगर उनका प्रदर्शन ठीक न हो तो तत्काल उन्हें टीम से बाहर कर देने की मांग उठने लगेगी। हो सकता है उन्हें टीम से निकाल दिया जाए। या फिर किसी मैच में खेलते हुए उन्हें चोट भी आ सकती है। जिससे उनके सामने मुश्किल आ सकती है। सचिन एेसा कुछ नहीं होने देना चाहते, जिससे वे विश्वकप खेलने से वंचित रह जाएं। वैसे सचिन की समझदारी की भी दाद देनी होगी।

जी, तो बात हो रही थी यंगिस्तान की। यंगिस्तान कितना मजबूत है और आने वाले दिनों में भारतीय क्रिकेट का भविष्य कितना उज्ज्वल है इसका अंदाजा पिछले दिनों हुए टूर्नामेंट के आधार पर लगाया जा सकता है। और हां किसी को शक हो तो एशिया कप भी देख लीजिएगा। खासकर उन खिलाडि़यों के प्रदर्शन पर नजर रखिएगा जो यंगिस्तान के सदस्य कहे जाते हैं।

देखिए और इंतजार कीजिए।

गुरुवार, अप्रैल 29, 2010

खेल क्रिकेट का



क्रिकेट का एक और संग्राम शुरू होने वाला है। मैं यहां महासंग्राम इसलिए नहीं लिख रहा क्योंकि अक्सर अखबार के पेजों के ऊपर जो लोगो लगाए जाते हैं, उनमें क्रिकेट का महासंग्राम ही लिखा होता है। चुनाव हों तो भी महासंग्राम और क्रिकेट हो तो भी महासंग्राम एेसा लगता है जैसे संग्राम तो कोई शब्द रह ही नहीं गया है जो है सो महासंग्राम ही है। जैसे कार्रवाई कोई शब्द नहीं रह गया जब तक उसमें सख्त और कड़ी न जुड़े बात बनती ही नहीं।
खैर, पूरा देश एक बार फिर क्रिकेट के खुमार में डुबने वाला है। विश्व इसलिए नहीं लिखा क्योंकि कुछ सीमित देश ही इसमें शिरकत करते हैं। अगर बात फुटबाल की होती तो शायद विश्व शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता था।
अब बात मुद्दे की बात। इस ब्लॉग पर मुद्दत के बाद। आईपीएल जिस खुशनुमा माहौल में शुरू हुआ उतने ही तनाव भरे माहौल में इसका समापन हुआ। अब ट्वेंटी-ट्वेंटी जितनी मुश्किल दौर में शुरू हो रहा है उम्मीद की जानी चाहिए कि इसके विपरीत यह खुशनुमा माहौल में समाप्त हो। टूर्नामेंट अभी शुरू भी नहीं हुआ कि लोगों ने इसके विजेता को लेकर भविष्यवाणी करनी शुरू कर दी है। कोई भारत को विजेता बना रहा है तो कोई पाकिस्तान को। जितने लोग उतने विजेता। ये वे लोग हैं जो जानते हैं कि क्रिकेट में भविष्यवाणी करना खतरे से खाली नहीं होता लेकिन आदत से मजबूर जो हैं। एक मैच की भविष्यवाणी भी खतरनाक होती है तो फिर प्रतियोगिता शुरू होने से पहले उसके विजेता के बारे में कयास कैसे लगाए जा सकते हैं। समझना मुश्किल है। शायद भविष्यवाणी करने वाले अपनी विद्वता भी दिखाना चाहते हैं। सबकी अपनी अपनी दुकान अपना अपना काम। दुकान भी तो चलानी है न भाई। सब जानते हैं कि क्रिकेट में वही टीम जीतती है मैच के दिन अच्छा खेलती है। तो मेरा मानना है कि जो टीम लगातार अच्छा खेलेगी वही विजेता बनेगी। वो कोई भी हो सकता है।
खेल बस शुरू ही होने वाला है। इसलिए मैं भी ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा। हालांकि समय समय पर यहां अपनी बात जरूर रखता रहूंगा। आपसे गुजारिश है कि बात अच्छी लगे तो भी और खराब लगे तो भी अपनी टिप्पणी अवश्य करें। बाकी आपकी मर्जी।

मंगलवार, मार्च 30, 2010

यूसुफ़ की ऐसी विदाई


सोमवार को खेल से जुडी दो बडी खबरें आती हैं। खेल में दिलचस्पी होने और अखबार में काम करने के कारण तुरंत उन पर ध्यान गया। टीवी के लिए दोनों ब्रेकिंग न्यूज। एक को तो खूब दिखाया गया पर दूसरी उतनी चर्चा नहीं पा सकी। मंगलवार के अखबारों में एक खबर प्रथम पेज पर जगह पाती है तो दूसरी अंदर के पन्नों पर। प्रथम पेज की खबर वही जो टीवी के लिए ब्रेकिंग न्यूज।
एक तो शुएब सानिया की शादी की, जो कि पूरी तरह पुष्ट नहीं हो सकी और दूसरी पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर युसुफ के संन्यास की। सानिया शुएब की खबर ने खूब सुर्खी पाई पर युसुफ की खबर दब कर रह गई। प्रिंट मीडिया की बात करें तो उन अखबारों में तो थोडी गलीमत रही जहां खेल के दो पेज निर्धारित हैं पर जहां सिर्फ एक पेज है वहां तो इसे कहीं कोने में तो कही ब्रीफ में जगह मिली।
सनिया शुएब की खबर बडी थी। इसे खूब छापा गया। एजेंसी से खबर आने के बाद कई अखबारों ने तो अपने रिपोर्टर से कह कर इस खबर पर काम भी कराया। इस बात का पता मंगलबार को तमाम अखबार पढने से चलता है। सानिया शुएब की बात फिर कभी फिलहाल बात युसफ की।
हर खिलाडी को एक न एक दिन खेल को अलविदा कहना ही पडता है। सो युसुफ को भी कहना पडा। पर सवाल यह है कि युसुफ ने संन्यास लिया या फिर उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूर किया गया। सि्थतियों की पडताल की जाए तो साफ पता चल जाएगा कि उन्हें मजबूरन यह फैसला लेना पडा। जिस खिलाडी ने टेस्ट क्रिकेट में 53 की औसत से और एक दिनी क्रिकेट में 42 से अधिक के औसत से रन बनाए हो उसका यूं खेल छोड देना थोडा अखर गया।
पाकिस्तान क्रिकेट के लिए युसुफ ने जो किया क्या उस आधार पर उन्हें इस तरह संन्यास की घोषणा करनी चाहिए थी। जवाब होगा शायद नहीं। तो फिर युसुफ ने ऐसा क्यों किया। युसुफ ने संन्यास की घोषणा के लिए बाकायदा संवाददाता सम्मेलन बुलाया। पर अचरज इस बात का कि उन्होंने इस दौरान वही कहा जो वह कहना चाहते थे। वह नहीं कहा जो लोग सुनना और जानना चाहते थे। उन्होंने इस दौरान साफ कह दिया कि वे किसी सवाल का जवाब नहीं देंगे। क्यों क्योंकि अगर वे पत्रकारों के सवालों के जवाब देते तो उनका दर्द उभर कर सामने आ जाता और फिर बिना बजह बात का बतंगड बन जाता।
याद आते हैं एडम गिलक्रिस्ट बात 2008 की है इसलिए संभवत दिमाग पर ज्याद जोर डालने की जरूरत नहीं। भारत और कंगारुओं के बीच अंतिम टेस्ट मैच खेला जा रहा था। उन्होंने पहली पारी में भारतीय सि्पनर अनिल कुंबले का कैच लपका। इसके साथ ही वे विकेट के पीछे कैच लेने वाले सबसे सफल विकेटकीपर बन गए। इसके साथ ही उन्होंने क्रिकेट से अलविदा कह दिया। उनके देश के प्रधानमंत्री केविन रूड ने गिली से अपने फैसले पर फिर विचार करने को कहा पर गिली से इससे साफ तौर पर इनकार कर दिया। वो समां आज भी याद आता है जब कंगारू खिलाडियों के साथ साथ भारतीय खिलाडियों के साथ हजारों दर्शकों के बीच गिली को मैदान से विदाई दी गई।
क्या युसुफ इस तरह की शानदार विदाई के हकदार नहीं थे। चाहे भारत हो या पाकिस्तान हमारे साथ यही समस्या है। पहले तो किसी न किसी कारण से खिलाडी को बाहर कर दिया जाता है फिर मजबूरन उसे अलविदा कहना ही पडता है। कपिल, वेंगसरकर, श्रीकांत, शास्त्री, सौरभ और इंजमाम जैसे कितने ही खिलाडी हैं जो शायद इस शानदार विदाई के हकदार थे पर उन्हें कैसे जाना पडा सब जानते हैं। इंजमाम को तो एक बंद कमरे में संवाददाता सम्मेलन बुलाकर इस बात की घोषण करनी पडी कि अब वह क्रिकेट नहीं खेलेंगे। वहीं वां बन्धु, लेंगर, डेनियल मार्टिन, मैक्ग्रा, वार्न को उनके देश के लोगों और क्रिकेट बोर्ड ने कैसी विदाई दी सबने अपनी आंखों से टीवी में देखा।
युसुफ ने सोचा भी नहीं होगा कि उन्हें इस तरह विदा होना पडेगा। दरअसल कोई खिलाडी नहीं चाहता कि उसे संवाददाता सम्मेलन कर इस बात की घोषणा करनी पडे कि अब वह नहीं खेलेगा। जहां वह अब तक रहा। जहां के प्रदर्शन की बजह से लोग उसे प्यार करते हैं यानी खेल का मैदान। वह वहीं इस बात की घोषणा करना चाहता है। युसुफ के दिल की टीस इस बात से जानी जा सकती है कि जाते जाते वह कह गए कि मैनें हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की। मैं पाक बोर्ड को परेशान नहीं देखना चाहता इसलिए मैंने संन्यास का फैसला लिया है। युसुफ ने यह भी कहा कि पाक बोर्ड ने उन्हें अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया। मैं कुछ बताना चाहता था।
युसुफ के लिए क्रिकेट और अपने देश पाकिस्तान से बढकर कुछ नहीं था। शायद यही कारण था कि जब टीम में धर्म विवाद ने जन्म लिया तो उन्होंने यहूदी धर्म छोडकर इस्लाम कबूल करने में तनिक भी देरी नहीं की। किसी को हो न हो पर युसुफ का यूं चले जाना मुझे बहुत अखर गया।

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