
मोहनदास करमचंद गांधी। यानी महात्मा गांधी। उनको लेकर हर व्यक्ति की अपनी- अपनी राय हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक लिहाज से बहुदा लोगों की राय को ही हम मानते हैं। अंगुली हर किसी पर उठती है। राम, कृष्ण, मोहम्मद साहब, गुरुनानक और जीसस पर भी उठी तो गांधी तो हाड़-मांस के एक इंसान भर थे। उनका कहना था कि कोई भी राष्ट्र्र, राष्ट्र भाषा के बगैर गूंगा है। आज हिंदी दिवस है और हिन्दी हमारी राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं। यानी आजाद भारत की कोई भी भाषा ही नहीं है। बगैर भाषा के ही हम अब तक गुजर कर रहे हैं।
कभी-कभी तो बात कमाल की लगती है। जो देश तकनीकी लिहाज से समृद्ध राष्ट्रों की श्रेणी में आ गया हो, जो देश राष्ट्रमंडल जैसे खेलों आयोजन कर रहा हो। जिस देश का लोहा अमेरिका के राष्ट्रपति तक मानते हों, जो देश अपनी सभ्यता और संस्कृति पर नाज करता हो, उसकी कोई भाषा ही नहीं है। और मजे की बात तो यह भी कि इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास भी नहीं किए जा रहे, सिर्फ खानापूर्ति और कुछ नहीं।
दरअसल, हिंदी की राह में रोड़े तो तभी डाल दिए गए थे, जब इसे राजभाषा का दर्ज दिया गया था। संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार हिन्दी को राजभाषा का स्थान दिया गया। लेकिन इसके साथ ही राजभाषा अधिनियम 1963 (संशोधित अधिनियम 1967) के अनुसार संघ की राजभाषा के रूप में अंग्रेजी को हमारे ऊपर अनिश्चितकाल के लिए थोप दिया गया। शायद संसद को भी उस समय पता नहीं था कि यह क्या अधिनियम है और इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। इसमें कहा गया था कि जब तक देश के सभी राज्यों की विधानसभाएं अंग्रेजी छोड़कर हिन्दी अपनाने का प्रस्ताव पारित नहीं कर देतीं तब तक अंग्रेजी का ही प्रयोग यूं ही होता रहेगा। एक बात और जो यहां महत्वपूर्ण है। अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार संघ की राजभाषा हिन्दी को 15 वर्ष बाद वही मान-सम्मान मिलना था, जो हमारे राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय ध्वज को प्राप्त है, लेकिन यह विडम्बना ही कही जाएगी कि 25 जनवरी 1964 में 15 वर्ष की अवधि पूरी करने से पहले ही राजभाषा अधिनियम 1963 के जरिए हिन्दी के पर इस तरह काट दिए गए कि वह कहीं की न रहे। सवाल यह भी उठाया जा सकता है कि यह क्यों हुआ? दरअसल यह सब दबाव और आपसी कुचक्रों के कारण ही हुआ। हालांकि यह सही है कि कई लोगों ने इसका विरोध किया पर वे सफल नहीं हो सके। इस प्रकार हिन्दी को जो सम्मान मिलना चाहिए था, उस कहानी का वहीं दुखद अंत हो गया।
गौर करें तो पाएंगे कि शायद अंग्रेज हमसे ज्याद दूरदृष्टा थे। यही कारण था कि वे जब समझ गए कि भारत पर राज करना अब आसान नहीं है, तो उन्होंने यहां से निकलने में ही भलाई समझी। लेकिन जाते जाते वे अपनी आदत और दूरदृष्टि से ऐसा कर गए कि भारत कभी चैन से न बैठ पाए। इसीलिए पाकिस्तान के रूप में भारत का एक महत्वपूर्ण अंग अलग हो गया। आज सब जानते हैं कि अपने उसी हिस्से के कारण भारत को नित नई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पाकिस्तान का तो जैसे एक सूत्रीय लक्ष्य है कि भारत के बढ़ते कदमों को रोकना। उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ही वह खुद कहां है और क्या करेगा। भारत की बढ़त को रोका जाए उनके हुकमरानों की यही चाहत रहती है। यह बंटवारा यूं ही नहीं हुआ। इसके पीछे सोची समझी रणनीति और चाल थी जो शायद आज हमारी समझ में आ रही है। यह भी दीगर है कि बहुतों को अभी भी यह समझ नहीं आ रही है। अगर ऐसा न होता तो हिन्दी की हालत आज यह नहीं होती जो है। कहा गया है कि अगर देश के सभी राज्यों की विधानसभा इस बात पर मोहर लगा दें कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए तो कौन है जो इसे रोक सकता है।
भारत अनेकताओं में एकता वाला देश है। यह बात कहने और सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है पर धरातल पर सोचें तो यही अनेकता कभी-कभी देश की दुश्मन भी बन जाती है। ब्रिटिश शासक शायद जानते थे कि देश के सभी राज्यों की विधानसभा हिन्दी को राष्ट्रभाषा की बात पर सहमत नहीं होंगी, इसीलिए वे ऐसा अनुच्छेद बना गए और हम हैं कि उसी लकीर के फकीर बने हुए हैं। कभी हम मराठी बन जाते हैं तो कभी पंजाबी। कभी बंगाली बन जाते हैं तो कभी बिहारी। इसीलिए एकजुटता के साथ हिन्दी को मान-सम्मान दिलाने का प्रयास नहीं करते।
14 सितम्बर आने पर हमें हिन्दी की याद आती है। अखबारों में लेख छप जाते हैं और ब्लॉग पर पोस्ट लिख दी जाती है। हिन्दी पखवाड़ा आयाजित किया जाता है और फिर साल भर के लिए हिन्दी को भुला दिया जाता है। हम भी अगले वर्ष फिर हिन्दी की बात करेंगे...