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शनिवार, सितंबर 25, 2010

ऐसे नहीं रुकेगा आतंक

क्या आपको लगता है कि आतंकवाद खत्म किया जा सकता है? क्या आपको लगता है कि भारत में कभी अमेरिका या ब्रिटेन जैसी स्थिति बन पाएगी, कि कोई आतंकी संगठन वहां वारदात करने से पहले कई बार सोचे? क्या हम और आने वाली पीढ़ी कभी डर के साए से बाहर निकल पाएंगे? सवाल और भी हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय इन सवालों का जवाब हां में दे पाएगा। क्या हम आगे भी इसी तरह जीते रहेंगे जैसे आज जी रहे हैं? या फिर इसमें कोई बदलाव की स्थिति निकट भविष्य में दीखती है। खैर, मुझे तो नहीं दिखती।

भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जो मानते हैं कि भारत में आतंकवाद का कारण पाकिस्तान है और पाकिस्तान चूंकि कश्मीर को पाना चाहता है इसलिए कश्मीर सहित पूरे देश में आतंक का माहौल बनाना चाहता है, ताकि थक-हारकर भारत कश्मीर पर समझौता करने पर तैयार हो जाए। बहुत से लोग मानते हैं कि अगर कश्मीर की समस्या का हल हो जाए तो आतंकवाद पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। पहली बात तो यह है कि कश्मीर की समस्या हल नहीं होगी और अगर मान लीजिए किसी तरह हो भी जाएगी तो क्या आतंक कम हो जाएगा? साहब आतंक तब भी कम नहीं होगा। हर व्यक्ति सजग और सतर्क हो जाए और उसे जरा भी लगे कि फलां व्यक्ति किसी गलत काम में या आतंकी गतिविधि में लिप्त है तो पुलिस को सूचित कर दे तो भी क्या आतंकी घटनाओं को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। तो जनाब मुझे ऐसा नहीं लगता।

एक लाइन में कहूं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जब तक न्यायालय द्वारा आतंककारी घोषित किए जा चुके लोगों को निर्धारित सजा नहीं मिल जाती, तब तक कोई खास उम्मीद रखना निरा बेमानी ही होगी।

पिछले दिनों दिल्ली में जामा मस्जिद के पास हुआ हमला कुछ नए संकेत कर रहा है। अब आतंकी खुद को नष्ट करके हमें खत्म नहीं करना चाहते बल्कि वे चाहते हैं कि वे सुरक्षित रहें और हमें खत्म करें। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आतंकियों के निशाने पर अब भारतीय नहीं बल्कि भारत आने वाले विदेशी हैं ताकि दुनियाभर में भारत की भद्द पिटे।
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किसी आतंकी घटना को अंजाम देकर निकल भागने वालों को पकडऩा कितना मुश्किल काम होता है यह सब जानते हैं। न जाने कितनी मुसीबत और मेहनत के बाद पुलिस और अन्य फोर्सेस उन्हें पकड़ पाते हैं। उसके बाद अदालत में मुकदमा चलता है। चूंकि अदालत सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती है इसलिए यह साबित करना कि यह व्यक्ति आतंकी है बड़ा टेढ़ा काम होता है। कड़ी मशक्कत के बाद अदालत में यह साबित भी हो जाता है कि फलां आदमी आतंकी है तब कहीं जाकर न्यायालय फैसला सुनाती है। खास बात यह भी कि इसमें कुछ दिन या महीनों का समय नहीं बल्कि अक्सर कई साल लग जाते हैं। अदालत से अपराधी घोषित व्यक्ति को सजा मिल जाती है, लेकिन अदालत के निर्णय का क्रियान्वयन नहीं हो पाता। बड़ी दिक्कत यही है।

जब तक अदालत से दोषी करार दिए गए व्यक्ति को सजा नहीं मिलती यह सोचना कि देश से आतंक कम हो जाएगा बिल्कुल दिन में सपने देखने जैसा ही है। सबसे पहले आतंकियों को सजा दी जानी चाहिए, ताकि जो लोग भविष्य में ऐसा कुछ करने के बारे में विचार कर रहे हैं वे ऐसा करने से बचें। बाकी तो ख्याली पुलाव हैं आप भी पकाइए मैं भी पकाऊं...

रविवार, अगस्त 22, 2010

सावधान ! आगे खतरा है

सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि मैं जो कुछ भी यहां लिखने जा रहा हूं मैं चाहता हूं कि वह गलत निकले। क्योंकि अगर मेरी कही हुई बात गलत निकली तो ही ठीक है। लेकिन फिर भी आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं।
15 अगस्त शांति से निपट गया है। जम्मू-कश्मीर की घटना छोड़ दें तो बाकी सभी जगह सब ठीक ठाक रहा। अगस्त का महीना समाप्त होते ही ऐसा कुछ होने वाला हैै कि कुछ भी हो सकता है। सबसे पहले इस बात की संभावना है कि अयोध्या विवाद का फैसला सितम्बर में आ जाए। फैसला आएगा तो यह तय कि कुछ न कुछ जरूर होगा। अगर फैसला मुसलमानों के पक्ष में जाएगा तो हिन्दूवादी संगठन चुप नहीं बैठेंगे और कुछ न कुछ जरूर करेंगे, इसके लिए अंदरखाते योजना बननी भी शुरू हो गई है। फैसला आते ही कुछ न कुछ होगा। अगर फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया तो मुसलमान भी चुप बैठेंगे यह मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी। हालांकि यह सही है कि मुस्लिम संगठनों ने अभी कुछ आक्रामक तेवर नहीं दिखाए हैं लेकिन फैसला आने के बाद क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। चुंकि यह धार्मिक मुद्दा है लोगों की भावनाओं का मुद्दा है, इसलिए यह कुछ सीमित स्थानों पर ही सीमित रहेगा यह भी नहीं कहा जा सकता। अगर जरा सी भी आग लगी तो पूरे देश में फैलेगी और न जाने कितनों को जला कर राख कर देगी। शायद इसीलिए यूपी की मुख्यमंत्री ने दूरदृष्टि का परिचय देते हुए पुलिस अधिकारियों की छुट्टी रद्द कर दी है। ताकि अगर हालात खराब हों तो स्थिति पर तत्काल नियंत्रण पाया जा सके।
मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो, लेकिन बहुत हद तक आशंका है कि कुछ न कुछ होगा जरूर।
दूसरी स्थित बनेगी अक्टूबर में। इस माह में कॉमनवेल्थ गेम्स यानी राष्ट्रमंडल खेल होंगे। हमारे देश के नेताओं को जो कुछ भी करना है वे कर चुके हैं और अंदरखाते कर भी रहे होंगे जिनका खुलासा शायद बाद में हो। लेकिन बाहर के लोगों का क्या कहिएगा। जी, हां मैं बात कर रहा हूं भाड़े के आतंककारियों की। क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान और तालिबान यह चाहेंगे कि भारत में राष्ट्रमंडल खेल शांति से हो पाएं? मुझे तो नहीं लगता। वैसे भी भारत में पिछले बहुत दिन से कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ है। पाकिस्तान के हालात खराब चल रहे हैं। बाढ़ से पूरा देश त्रस्त हैं। लोग भूखों मर रहे हैं। सेना राष्ट्रपति जरदारी हो हटाने के लिए पूरे प्रयास कर रही है। कुछ दिनों में ही वहां कुछ बड़ा परिवर्तन दिखे तो अचरज नहीं होना चाहिए। बहुत संभव है कि भारत पर कुछ दिन से इसलिए हमला न हुआ हो कि राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। ऐसे मौके पर कुछ किया जाए तो कहने ही क्या। तय है कि निश्चित रूप से बड़ी संख्या में विदेशी भी मारे जाएंगे और भारत की भद्द पिटेगी वह अलग से। वैसे भी आतंककारी अब चाहते हैं कि भारतीयों के साथ साथ विदेशी भी मारे जाएं, इसीलिए होटल ताज पर हमला किया गया था। दिल्ली सुरक्षा इंतजामात को लेकर वैसे भी संतुष्ट नहीं है। भले कोई बड़ी वारदात न हो लेकिन आतंककारी माहौल बिगाडऩे का प्रयास नहीं करेंगे यह मानने वाली बात नहीं है।
तीसरी बात, पेंटागन से खबर आई है कि चीन ने भारत की सीमा पर परमाणु मिसाइल तैनात कर दी है। हालांकि चीन ने इसका खंडन किया और बकवास करार दिया है लेकिन फिर भी चौकन्ना तो रहना ही होगा। यह सही है कि चीन ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा, जिससे उसे कोई परेशानी हो, लेकिन वह भारत पर अतिरिक्त दबाव बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। वह सीमा तक अपने सड़क मार्ग को दुरुस्त कर रहा है। यह सही है कि हाल-फिलहाल इस मामले में कोई संकट नहीं आने वाला लेकिन भविष्य किसने देखा है? चीन जिस स्तर की तैयारियां कर रहा है वह निश्चित रूप से चौंकाने वाली और सतर्क करने वाली है। अगर चीन के इरादे नेक हैं तब तो कोई बात नहीं लेकिन अगर जरा भी शंका हुई तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। पूरा देश राष्ट्रमंडल खेल की तैयारियों में लगा रहे और चीन सिर पर आकर बैठ जाए तो क्या कहिएगा।
खतरे और भी हैं, जो बिना बताए आ सकते हैं। सतर्क सबसे रहने की जरूरत है। मैं एक बार फिर कह दूं कि मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो। मंदिर-मस्जिद मामले का कोई ऐसा हल निकले जो दोनों पक्ष मान लें और देश में सौहार्द का माहौल बना रहे। राष्ट्रमंडल खेलों में अभी तक जो हुआ सो हुआ अब सब सही हो जाए। आतंककारी अपने झंझावातों में फंसे रहे और इधर न आ पाएं। आएं भी तो उनका कोई मंसूबा पूरा न होने दिया जाए, उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया जाए। चीन अपने देश में जो कुछ भी कर रहा है वह अपने विकास के लिए कर रहा हो, उसका इरादा भारत को नुकसान पहुंचाने का न हो। चाहता तो यही हूं, लेकिन कौन जाने कब क्या हो जाए।
जाने क्या होगा रामा रे...

गुरुवार, जुलाई 15, 2010

एसएमएसमीनिया


टीचर : एक साथ जवाब दो।
यूपी की मुख्यमंत्री कौन हैं?
कुतुबमीनार कहां है?
शताब्दी की रफ्तार?
मुर्गी क्या देती है ?


एक महिला फायर स्टेशन फोन करती है। फोन संता उठाता है।
महिला : मेरे घर में आग लग गई है।
संता : पानी डालो
महिला : डाला, पर अभी नहीं बुझी।
संता : तो मैं आकर क्या करुंगा, पानी ही तो डालूंगा।

मेरी जुदाई का गम न करना,
दूर रहूं तब भी प्यार कम न करना।
अगर मिले जिन्दगी के किसी मोड़ पर,
तो प्लीज बंदरों की तरह उछलकूद मत करना।


एक लड़की और एक लड़का एक दूसरे को किस कर रहे थे। अचानक लड़की के पिता आ जाते हैं।
डैडी : क्या कर रहे हो?
लड़की : इस साले ने मेरी लिपगार्ड ले ली थी, वही वापस ले रही हूं।

बीवी : मैं जब गाना गाती हूं तो तुम बाहर क्यों चले जाते हो?
पति : ताकि कोई ये न समझे की मैं तुम्हारा गला दबा रहा हूं।



जी, ये कुछ एसएमएस हैं। चाहें तो चुटकुले भी कह सकते हैं। ये बानगी भर है। ऐसे ना जाने कितने चुटकुलेनुमा एसएमएस मेरे पास आते हैं। इनके आने का भी कोई समय निर्धारित नहीं है। 24 घंटे में कभी भी, मेहमान की तरह।
कहां से आ रहे हैं ये एसएमएस? और कौन कर रहा है ये एसएमएस? तो साहब जवाब है कि कर तो मेरे मित्र और जानने वाले ही रहे हैं। क्या मेरे मित्र और जानने वाले इतने रहीस हैं कि एक दिन में 50-50 मैसेज कर दे। और एक ही दिन क्यों महीनों से, बल्कि कुछ तो सालों से। नहीं साहब न तो मेरे मित्र इतने रहीस हैं और न ही इतने बेवकूफ। वे जिस कंपनी का मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हैं उसने एक स्कीम निकाली है। बहुत ही कम पैसे का पैक ले लो और महीने भर तक असीमित एसएमएस करो। एक बार पैसा दे ही दिया है तो क्यों नहीं करें एसएमएस। लेकिन उसमें करें क्या? सबसे ऊपर जो कुछ एसएमएस लिखे हैं वही आ रहे हैं।
क्या है इन एसएमएस में ? ये बताने की जरूरत नहीं। एसएमएस में या तो संता बंता के नाम पर किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाया जाता है या फिर फूहड़ शायरी रची जाती है। ये नहीं हुआ तो समाज और परिवार का तानाबाना ही बिगाडऩे की कोशिश की जा रही होती है। हमें पता भी नहीं चल पाता कि कब हम इसके शिकार हो गए और हो जाते हैं। कई बार तो ऐसा होता है कि मिलने वाले एसएमएस जब एक दो दिन नहीं आते तो हम फोन करके पूछते हैं कि क्या हुआ। नाराज हो क्या, मैसेज नहीं आ रहे हैं।
जिस तरह फोन का अधिक इस्तेमाल करने से कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है उसी तरह क्या अधिक मैसेज पढऩे और भेजने से भी कोई बीमारी हो सकती है? पता नहीं पर शोधकर्ताओं के लिए यह शोध का विषय हो सकता है। मुझे लगता है कि अधिकतम लोग इस मैसेजमीनिया के शिकार हो गए हैं। कोई भेजता होगा तो कोई पढ़ता होगा। जो इसमें से कुछ नहीं करता वह निश्चित रूप से भाग्यशाली है, किस्मतवाला है।
मजे की बात यह है कि मोबाइल कंपनियां वही स्कीम पहले कम दाम पर शुरू करती हैं और जैसे ही उन्हें लगता है कि लोग अब इस मोहपाश में फंस गए वैसे ही शुरू हो जाता है दाम बढ़ाने का खेल। पहले अगर पचास रुपए में तीन सौ एसएमएस मिलते थे तो अब सौ रुपए में डेढ सौ मैसेज ही मिलेंगे। अब हमारी तो आदत पड़ चुकी है तो चाहे दो सौ रुपए का मिले हमें तो लेना ही है।
एसएमएस में कहीं प्रेमी प्रेमिका के बीच के अंतरंग बातों को बताया जाता है तो कहीं किसी नेता या अभिनेता पर टिप्पणी की जाती है। उन्हें पढ़कर हम खुश होते हैं।

तो साहब, मेरा यही निवेदन है कि अभी सावधान हो जाइए। अगर आप के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है तो छोड़ दीजिए और अगर नहीं हो रहा है तो अच्छी बात है। कहीं इस चक्कर में पड़ मत जाइएगा।

एक बात और। हो सकता है आप मेरी बात से सहमत न हों। और इसे इसे अच्छा मानते हों। तब बहुत अच्छा है। निवेदन है कि अपनी बात इस मंच पर रखें ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी बात को जान सकें और इस बहस को आगे बढ़ाने में सहयोग करें।

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