कहने के लिए कोई कह सकता है कि मैं शशि थरूर के पीछे पड गया हूं। पर हर समझदार यह जानता है कि मैं कहां और थरूर साहब कहां। इस बार मैं इसलिए लिख रहा हूं कि आज थरूर साहब ने कहा है कि मीडिया को समाचार संकलन में अधिक सजग और प्रासंगिक होना चाहिए। उनका आरोप है कि उनकी बात को गलत तरीके से पेश किया गया है।
मेरी समझ में नहीं आता कि अक्सर लोग मीडिया पर यह आरोप क्यों लगाते हैं कि उनकी बात को तोड मरोड कर पेश किया गया। उन्होंने वास्तव में वह कहा ही नहीं जो अखबार में छपा या फिर टीवी पर दिखाया गया। मैं सभी से निवेदन करना चाहता हूं कि वे जब भी मीडिया से बात करें तो अपनी बात को पूरी तरह स्पष्ट कर दें ताकि मीडिया उसके गलत निहिताथर् न निकाल सके।
कहने को थरूर साहब ने यह कह भले दिया हो कि उनकी बात का गलत मतलब निकाला गया है जबकि हकीकत यह है कि थरूर साहब को दो पैसे का भी शऊर नहीं है। दरअसल थरूर साहब ने यह इस बात का समर्थन तो कर दिया लेकिन बाद में उन्हें याद आया कि जिस व्यकित की उन्होंने आलोचना की है वह है कौन। थरूर के लिए राहत की बात यह रही कि उन्होंने इस बार मुंह से बोला था टिवटर पर लिखा नहीं था। यही एक बात उनके पक्ष में गई नहीं तो इस बार थरूर साहब की छुट्टी तय थी। थरूर यह कह कर बच गए कि जो बताया जा रहा है वह उन्होंने कहा ही नहीं।
हालांकि मैं इस बात से सहमत हूं कि थरूर साहब ने जो कहा वह गलत नहीं था। भले ही उन्होंने अब कह दिया हो कि उनका ऐसा मानना नहीं है। लेकिन मुझे थरूर की इस बात पर हंसी आ रही है कि बोलते बोलते वह यह भी भूल गए कि वे किस बात पर टिप्पणी कर रहे हैं और किसकी आलोचना कर रहे हैं। मैं मानता हूं कि इस समय संप्रग सरकार का जो मंत्रिमंडल है उनमें से थरूर साहब कुछ विदवानों में से एक हैं पर उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि कब, कहां और कैसे बोला जाए। उम्मीद है कि थरूर साहब आगे से सोच कर ही नहीं बरन समझ कर भी बोलेंगे।
रविवार, जनवरी 10, 2010
क्या होगा ऐसे प्रतिबंध से
वैसे, कहा जाता है कि जब कोई मामला न्यायालय में विचाराधीन हो तो उस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। लेकिन कम से कम ब्लाग पर तो लिख ही सकता हूं। सो लिख दे रहा हूं। हो सकता है कि यह अदालत की अवमानना हो। अगर हो तो मुझे माफ कर दें।दरअसल, मैं जो बात कहना चाहता हूं वह यह है कि पता चला है कि जम्मू कश्मीर में प्री पेड मोबाइल पर प्रतिबंध जारी रहेगा। ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि संभावना जताई जा रही है कि अगर प्रतिबंध हटा दिया जाता है तो आतंकी उसका गलत फायदा उठा सकते हैं। मेरा सवाल यह है कि अभी दो दिन पहले ही आतंकवादियों ने श्रीनगर में हमला कर दिया और उनको मार गिराने में हमें करीब 22 घंटे का समय लग गया। पता चला है कि आतंकी पाकिस्तान में अपने आकाओं से बात कर रहे थे। मेरी परेशानी यह है कि आतंकियों को जो करना था किया फिर हमारी सुरक्षा व्यवस्था से क्या हासिल। जिन्हें जो करना है करते हैं। परेशान आम आदमी ही होता है।
केन्द्र सरकार का इरादा। सीमा पर से सेना हटाने का भी है। मुंबई में जब आतंकी घुस आए तो उन्हें मार गिराने में हमें चार दिन का समय लग गया। श्रीनगर में दो आतंकी हमला करते हैं तो उनसे हम 22 घंटे तक मुकाबला करते रहते हैं। इस दौरान हमारे भी सैनिक मारे जाते हैं। हम बडे खुश हो जाते हैं कि हमने आतंकियों को मार दिया, पर इस दौरान जो सैनिक हताहत हुए उसका क्या। कुछ नहीं। हालांकि मेरे इस ब्लाग लिखने से कुछ खास होगा नहीं। न तो मेरी आवाज भारत सरकार तक पहुंचेगी और न हीं वहां तक जहां से इस बारे में कुछ निणय लिये जाते हैं। लेकिन फिर भी अपनी बात रखने और आवाज बुलंद करने का एक मंच है वहां कम से कम अपनी परेशानी तो रख ही सकता हूं।
केन्द्र सरकार का इरादा। सीमा पर से सेना हटाने का भी है। मुंबई में जब आतंकी घुस आए तो उन्हें मार गिराने में हमें चार दिन का समय लग गया। श्रीनगर में दो आतंकी हमला करते हैं तो उनसे हम 22 घंटे तक मुकाबला करते रहते हैं। इस दौरान हमारे भी सैनिक मारे जाते हैं। हम बडे खुश हो जाते हैं कि हमने आतंकियों को मार दिया, पर इस दौरान जो सैनिक हताहत हुए उसका क्या। कुछ नहीं। हालांकि मेरे इस ब्लाग लिखने से कुछ खास होगा नहीं। न तो मेरी आवाज भारत सरकार तक पहुंचेगी और न हीं वहां तक जहां से इस बारे में कुछ निणय लिये जाते हैं। लेकिन फिर भी अपनी बात रखने और आवाज बुलंद करने का एक मंच है वहां कम से कम अपनी परेशानी तो रख ही सकता हूं।
शनिवार, जनवरी 02, 2010
वह दर्द तुम्हारा है
तुम्हारे सिवा भी
दर्द बहुत थे
कुछ मिट गए,
कुछ बीत गए
कुछ रीत गए
बाकी सब
रह रहकर चुभते है
पर
एक वो जो न बीता न रीता
और न ही भूला
और चुभाना तो दूर
जिस कमबखत ने छुआ तक नहीं मुझे
बस एक आदत सा
साथ साथ चलता है
राग राग में बसा रहता है
पर आज भी कुआर है
वह दर्द तुहारा है
दर्द बहुत थे
कुछ मिट गए,
कुछ बीत गए
कुछ रीत गए
बाकी सब
रह रहकर चुभते है
पर
एक वो जो न बीता न रीता
और न ही भूला
और चुभाना तो दूर
जिस कमबखत ने छुआ तक नहीं मुझे
बस एक आदत सा
साथ साथ चलता है
राग राग में बसा रहता है
पर आज भी कुआर है
वह दर्द तुहारा है
गुरुवार, अक्टूबर 29, 2009
रविवार, अक्टूबर 04, 2009
खबर
पता चला है कि डीएलए आगरा से शशांक शेखर बाजपेयी ने इस्तीफा दे दिया है और नई पारी आइ नेक्स्ट आगरा के साथ शुरू की है।
इसी प्रकार धमेन्द्र सिंह ने नई पारी अमर उजाला, अलीगढ के साथा शुरू की है। वे इससे पहले दैनिक जागरण इलाहाबाद और अलीगढ में काम कर चुके है। वे आगरा अमर उजाला में भी कुछ समय के लिए काम कर चुके हैं।
इसी प्रकार धमेन्द्र सिंह ने नई पारी अमर उजाला, अलीगढ के साथा शुरू की है। वे इससे पहले दैनिक जागरण इलाहाबाद और अलीगढ में काम कर चुके है। वे आगरा अमर उजाला में भी कुछ समय के लिए काम कर चुके हैं।
सोमवार, सितंबर 28, 2009
अलविदा ब्लॉगवाणी
ब्लाग वाणी के बंद होने का समाचार मिला। सुनकर एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन जब खुद जाकर देखा तो विश्वास करना ही पडा, न करता तो क्या करता। ब्लागवाणी के जाने का गम तो बहुत है पर क्या करूं। हालांकि बंदी का जो कारण बताया गया वो समझ से परे था। ब्लाग वाणी के माध्यम से न जाने कितने ही लोगों को अपनी आवाज बुलंद करने का सुअवसर मिला था। उन सबसे एक माध्यम छिन गया है। इसके लिए किया क्या जा सकता है बस दुख ही प्रकट किया जा सकता है और यह प्रणा लिया जा सकता है कि आगे से ब्लाग के किसी अन्य माध्यम को कदापि बंद नहीं होने देंगे।
कुछ लोग कह रहे हैं कि इससे ब्लागरों की सेहत पर बहुत गलत असर पडेगा बात सही है लेकिन यह बात मैं मानने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं कि इसके बाद अन्य ब्लाग भी बंद हो जाएंगे। हालांकि सच कहूं तो अभी भी मन करता है कि कोइ कह दे कि नहीं ब्लाग वाणी बंद नहीं हुआ वह सब बस एक मजाक भर था पर ऐसा हो नहीं सकता।
कुछ लोग कह रहे हैं कि इससे ब्लागरों की सेहत पर बहुत गलत असर पडेगा बात सही है लेकिन यह बात मैं मानने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं कि इसके बाद अन्य ब्लाग भी बंद हो जाएंगे। हालांकि सच कहूं तो अभी भी मन करता है कि कोइ कह दे कि नहीं ब्लाग वाणी बंद नहीं हुआ वह सब बस एक मजाक भर था पर ऐसा हो नहीं सकता।
गुरुवार, सितंबर 24, 2009
थरुर को चाहिए सिनकारा
बात यहीं से शुरु करता हूं। शाशि थरुर साहब का कहना है कि वे काम के बोझ के मारे हैं। सोशल नेटवकिग साइट टिवटर पर थरुर साहब लिखते हैं कि बुधवार को उनका १७ बैठकों और मुलाकातों का बेतुका कायकज़म था। वे यहीं नहीं रुके आगे बोले कि जब आप विदेश से वापस आते हैं तो हमेशा उसकी कीमत अदा करते हैं। इस दोरान थरुर साहब ने आफिस में पडी फाइलों का भी जिक किया। वे करीब एक हफते तक आफिस से गैर हाजिर थे। आप जानते ही होंगे कि शशि थरुर साहब भारत के विदेश राजय मंञी हैं। थरुर साहब काम के बोझ के मारे हैं। लेकिन एक बात गौर करिये वे टिवटर पर लिखना नहीं भूलते। इसके लिए समय निकाल ही लेते हैं। मेरी यह समझ में नहीं आता कि थरुर साहब से लोकसभा चुनाव लडने के लिए किसने कहा था। किसी ने नहीं कहा। चलिए मान लेते हैं लेकिन जीतने के बाद उनसे मंञी बनने के लिए किसने दवाब डाला। किसी ने नहीं तो वे मंञी कयों बन गए। अरे अगर काम करने का मन नहीं था तो मंञी बनने की कया जरुरत थी। अभी भी मन नहीं है तो इसतीफा कयों नहीं दे देते। किसी ने रोका हो तो उसका नाम बताइये। आप देश के विदेश राजय मंञी के पद पर बैठे किसी वयकित से इस तरह के बयान की उममीद कैसे कर सकते हैं। उनके बयान से तो एसा लगता है कि वे काम करके किसी पर अहसान कर रहे हों। अरे साहब रहने दीजिए मत काम कीजिए। िबला वजह परेशान कयों हो रहे हैं। आप टिवटर पर ही अचछा लिखते हैं वहीं लिखये जैसे मैं बलाग पर अचछा लिखता हूं। और हां अगर मंञी पद नहीं छोडना जो नहीं ही छोडना होगा तो आपको चाहिए सिनकारा। है न।
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