गुरुवार, अक्तूबर 29, 2009

हल्के हल्के फैलती है
उदित होते प्रका कि खु'ाबू
स्पष्ट झलकने लगते हैं
नदी, पहाड, जंगल
खूबसूरती और बदसूरती
साथ ही
गीली मिटटी पर अक्षर भी
लेकिन
मेरी आंखों में बस एक ही सपना
कइ सदियों से
कइ जन्मों से
और
इसी रो'ानी की तला'ा है मुझे

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