रविवार, अक्टूबर 17, 2010

भारत और इंडिया के फर्क को समझिए


एक महिला ने दूसरी से कहा, तुम्हें पता है भारत और इंडिया में लड़ाई हो गई है? दूसरी ने कहा, इससे हमें क्या, हम तो हिन्दुस्तान में रहते हैं ना।
यह एक चुटकुला है, लेकिन कहीं न कहीं यह सच्चाई भी बयां करता है। इस पर जरा सोच कर देखिए। क्या भारत और इंडिया अलग-अलग हैं? क्या इन दोनों में अक्सर लड़ाई होती रहती है? दोनों के जवाब हां में ही हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स या फिर राष्ट्रमंडल खेलों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि हम वाकई ऐसी जगह रहते हैं, जहां दो देश बसते हैं। गौर कीजिएगा तो साफ पता चल ही जाएगा।

हाल ही में हमारे यहां विश्वस्तरीय खेल हुए। खेल मात्र दस दिन हुए, लेकिन इसकी तैयारियां सालों से हो रही थी। होनी भी चाहिए आखिर देश की प्रतिष्ठा का सवाल है। भाजपानीत राजग के शासनकाल में इन खेलों की मेजबानी की अनुमति मिली तो कांग्रेसनीत संप्रग शासनकाल में ये खेल सम्पन्न हुए। यानी दो धुर विरोधी दलों ने खेल के लिए एक मंच पर आकर बिना राजनीति के एक दूसरे का सहयोग किया। खेल का मामला ऐसा होता है कि जहां अक्सर कहा जाता है कि इसे राजनीति से अलग रखा जाए, लेकिन रखा नहीं जाता। राजनीति में अक्सर खेल होता रहता है और खेल में राजनीति। खैर यह बहस और चर्चा का दूसर विषय हो सकता है।

खेलों के दौरान देश के दो चेहरे देखने को मिले। एक चेहरा वह जिसने कॉमनवेल्थ गेम्स कराए और दूसरा वह जो राष्ट्रमंडल खेलों में भागीदारी कर रहे थे। जिन लोगों ने कॉमनवेल्थ गेम्स कराए उसने देश के कॉमन लोगों की वेल्थ पर जमकर डाका डाला। अनुमानित खर्च कितना था और कितना खर्च किया गया यह सभी को पता है, जो खर्च ज्यादा किया गया वह खर्च करने वालों ने अपनी जेब से नहीं किया, बल्कि आम आदमी की जेब से ही किया है। तैयारियां वर्षों से हो रही थीं, लेकिन खेल के ऐन वक्त तक काम जारी रहा। काम में विलम्ब इसलिए किया गया ताकि अंतिम समय पर अनाप-शनाप पैसा खर्च किया जाए और इसे देश की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाए। इस पर कोई बोलेगा नहीं। जो बोलेगा वह राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया जाएगा।

खेलों के दौरान दूसरा चेहरा उन लोगों का देखने को मिला, जो राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रहे थे। उन्होंने राष्ट्र के लिए कितने पद जीते और देश को किस मुकाम तक पहुंचाया। यह जगजाहिर है। जहां कॉमनवेल्थ के आयोजक वेल्थ बनाते रहे, वहीं राष्ट्रमंडल के प्रतिभागी राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाते रहे। यानी एक तो हिन्दी के खेल हुए दूसरे अंग्रेजी का खेल। पदक जीतने वालों में ज्यादातर खिलाड़ी भारत के थे बजाए इंडिया के।

एक खेल खत्म तो दूसर शुरू हो गया है। अब खेल हो रहा है खेलों के आयोजन की प्रशंसा पाने का। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक विजेताओं से मिल रहे हैं। क्या ये लोग कभी उन अखाड़ों में गए हैं, जहां से ये पदक विजेता निकले हैं। राहुल गांधी को लगता है कि दलित के घर जाकर उसकी खटिया पर बैठकर चार बातें कर लेने और उसकी रोटी खा लेने से ही उन्होंने असली भारत को देख लिया। क्या इन लोगों को उन लोगों की पीठ नहीं थपथपानी चाहिए जो मात्र कुछ अंतर से ही पदक जीतने से रह गए। उनमें नया जोश नई स्फूर्ति कौन भरेगा। क्या जीतने वालों को ही टीवी पर दिखने का हक है? उन लोगों के बारे में कौन सोचेगा जो हार गए। मीडिया भी उन्हीं के गुण गा रही है, जो जीते हैं। हारे हुए लोगों को फिर से नए सिरे से खड़ा करने का जिम्मा कौन उठाएगा? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगले ही महीने एशियाड होने हैं और अगर से विजेता किन्हीं कारणों से फिर से यही कारनामा नहीं दोहरा पाए तो जो कुछ अंतर से हारे हैं उन्हीं पर जीतने का दारोमदार होगा। अगर उन्हें अभी से तैयार नहीं किया गया तो क्या होगा? इंडिया की जयजयकार छोड़कर भारत की भी परवाह कीजिए नहीं तो...

बुधवार, अक्टूबर 06, 2010

थिंक बिफोर यू स्पीक

राहुल गांधी। इस समय कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं और युवा कांग्रेस की देखरेख की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री कहा जाता है, हालांकि उन्होंने कभी नहीं कहा कि वे प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। दरअसल वे कुछ और ही कह रहे हैं। वे कह रहे हैं कि संघ और सिमी एक ही थाली के चट्टे- बट्टे हैं। उन्हें दोनों में कोई फर्क दिखाई नहीं देता। उन्हें चमचागिरि और चापलूसी करने वाले लोग भी कतई पसंद नहीं। वे कहते हैं कि हर मर्ज की सिर्फ एक ही दवा है और वह है राजनीति।

अपने मध्य प्रदेश के दौरे के दौरान राहुल गांधी ने कई बातें कहीं। कुछ ऐसी जो कहनी चाहिए थी और कुछ ऐसी जो मेरे ख्याल से नहीं कहनी चाहिए। राहुल ने कहा कि उन्हें चाटुकार और चमचे पसंद नहीं हैं। मुझे नहीं पता कि ये राहुल के निजी विचार हैं या फिर पारिवारिक। राहुल को भले चाटुकार पसंद न हों पर उनकी मां को चाटुकार और चमचे ही पसंद हैं। अगर नहीं होते तो प्रतिभादेवी सिंह पाटिल आज देश की राष्ट्रपति नहीं होतीं। हो सकता है कि मेरी इस बात की जमकर आलोचना की जाए पर मैं जानना चाहता हूं कि प्रतिभादेवी सिंह पाटिल में ऐसी कौन सी खूबी है जो वह राष्ट्रपति के उम्मीदवार हो गईं। अगर महिला होने की वजह से उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया तो प्रधानमंत्री पद क्यों किसी पुरुष के सुपुर्द कर दिया गया। क्या पार्टी में कोई ऐसी योग्य महिला नहीं जो प्रधानमंत्री बन सके? या फिर ऐसी महिला नहीं जो सोनिया गांधी की बात को आंख पर पट्टी बांध कर मान ले। खुद के प्रधानमंत्री न बन पाने के बाद क्यों उन्होंने कठपुतली मनमोहन सिंह का चयन किया। क्या कांग्रेस में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो अपने दम पर लोकसभा चुनाव जीत सके और प्रधानमंत्री बन सके। दरअसल सोनिया अच्छी तरह जानती हैं कि जो नेता लोकसभा का चुनाव जीत सकता है उसका अपना अच्छा खासा जनाधार होता है। मनमोहन सिंह चूंकि लोकसभा से संसद में प्रवेश नहीं करते सो उनका जनाधार भी नहीं होगा। सोनिया सिर्फ उन्हीं लोगों को पद बख्श रहीं हैं जो उनके कहे पर चलें। वे कहेंं दिन तो दिन और कहें रात तो रात। ऐसे नामों में केवल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि कई नाम हैं। अगले लोकसभा चुनाव में जब राहुल प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे उससे पहले ही मनमोहन सिंह को राष्ट्रपित भवन भेजने की पूरी तैयारी अभी से की जा रही है। राहुल को पहले अपने घर से चमचागिरि खत्म करनी होगी तब वे कार्यकर्ताओं को चमचागिरी न करने का पाठ पढ़ाएं तो ज्यादा अच्छा होगा।

राहुल कहते हैं कि देश की हर समस्या की खात्मा तभी होगा जब युवा राजनीति में आएंगे। यानी हर मर्ज की एक ही दवा। राजनीति और सिर्फ राजनीति। कोई कम अक्ल का व्यक्ति भी यह बता सकता है कि कभी भी हर मर्ज की एक ही दवा नहीं हुआ करती। अगर देश का हर व्यक्ति राजनीति करने लगेगा तो बाकी के काम कौन करेगा, यह भी राहुल को तय करना होगा। केवल राजनीति से देश नहीं चला करता। राजनीति पेट नहीं भरती। वे युवाओं को देश की राजनीति में लाना चाहते हैं। पहले उन्हें अपनी पार्टी में युवाओं को स्थान देना होगा। पहले वे अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से अपनी मां को हटाकर किसी युवा नेता को इसकी जिम्मेदारी सौंपे और फिर किसी युवा को ही प्रधानमंत्री बनने की घोषणा करें। केवल युवा कांग्रेस को बदलकर देश की राजनीति नहीं बदली जा सकती। राहुल को यह बात भी समझनी होगी कि कहने और करने में बहुत फर्क होता है। देशभर में घूमने से, दलित के घर जाकर रोटी खाने से और उसके घर सोने से दलित को अच्छा तो लग सकता है, लेकिन इससे उसके पेट की भूख कम नहीं हो सकती। देश भूख है, कराह रहा है। इसके लिए राहुल के पास क्या दवा है? राजनीति। देश घूमकर उसकी समस्याओं को समझना एक बात है और उसकी समस्याओं का निराकरण करना दूसरी बात।

राहुल कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते। राहुल को चाहिए कि वे पहले अपनी पार्टी के उन नेताओं को यह कहने से मना करें, जो उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं। राहुल को यह पता है कि अगले लोकसभा चुनाव में अगर उनकी पार्टी को बहुमत मिला तो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार वही होंगे सो अभी से ढोल-ताशे क्यों पीटे जाएं। हालांकि भीतर ही भीतर इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। योजना तैयार की जा रही है।

मजे की बात यह रही कि राहुल यहीं तक नहीं रुके। बुधवार को तो उन्होंने गजब ही कर दिया। उन्होंने कह दिया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और सिमी में उन्हें कोई फर्क नजर नहीं आता। सवाल यह है कि क्या राहुल ने कभी निष्पक्ष भाव से दोनों में कोई फर्क देखने की चेष्टा की है। नहीं की होगी, क्योंकि उनकी आंखों पर एक तरह का चश्मा लगा है और उन्हें जो कुछ भी दिखता है। उस चश्मे से ही दिखता है। अगर निष्पक्ष भाव से देखते तो उन्हें पता चल जाता कि संघ और सिमी में क्या फर्क है। सिमी जहां एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन है, वहीं संघ भारत भूमि की आत्मा से जुड़ा हुआ संगठन है। राहुल को अगर देशप्रेमी और देशद्रोही संगठनों में कोई फर्क नजर नहीं आता तो कोई क्या कर सकता है। बस उनकी बुद्धि पर मुस्कराया ही जा सकता है। वे जिस देश की राजनीति में युवाओं को लाने की बात कह रहे हैं क्या वे उस देश को समझ पा रहे हैं। इतने दिनों से देश भ्रमण के बाद भी अगर राहुल ऐसी बातें करते हैं तो लगता है कि लोग उन्हें यूं ही बच्चा नहीं समझते। वे वास्तव में अभी बड़े हो ही नहीं पाए हैं। बिना सोचे समझे बोलना उनकी आदत सी हो गई है। अंगे्रजी में पले बढ़े राहुल ने क्या थिंक बिफोर यू स्पीक की युक्ति नहीं सुनी होगी। सुनी होगी पर शायद उस पर अमल नहीं करना चाहते।

दरअसल राहुल की दिक्कत यही है कि वे अपने आप को बहुत बड़ा और विद्धान समझते हैं, वहीं अन्य लोग उन्हें बच्चा समझते हैं। राहुल को यह तक नहीं पता कि किसी के यहां जाते हैं तो कैसे पेश आते हैं। मध्यप्रदेश आगमन से एक दिन पहले ही यहां की सरकार ने उन्हें प्रदेश का अतिथि घोषित कर दिया था, लेकिन राहुल को शायद अतिथि भाव पसंद नहीं आया। उन्हें तो मायावती जैसे लोग ही पसंद आते हैं, जो उनके आने पर कोई व्यवस्था नहीं करती बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गाली ही देती हैं। राहुल की हर गलती को बच्चा समझकर माफ कर दिया जाता है, लेकिन कब तक? बच्चा जब कोई गलती करता है तो पहले उस पर हंसी आती है और जब बड़ा होकर भी वह ऐसा ही करता है तो सजा दी जाती है। राहुल को चाहिए कि वे ऐसी नौबत न आने दें और कोई भी बात बोलने से पहले सोचें।

शनिवार, अक्टूबर 02, 2010

वाह इंडिया, शाबाश मीडिया




इसे इत्तेफाक ही कहें कि जिस मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने पूरे जीवन हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया उनकी जयंती से दो दिन पूर्व ही एक ऐसे मामले का निर्णय आया जो लम्बे समय से लटका था। खास बात यह भी की मुद्दा तब ही गरमाया जब गांधी को सिधारे कुछ ही साल बीते थे।

सुखद बात यह रही कि आजादी के इतने वर्षों बाद पहली बार लगा कि भारत गांधी, कबीर और बुद्ध का देश है। अगर 30 सितंबर को कहीं पत्ता भी खड़कता तो यह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता और दुनिया भर में भारत की जो फजीहत होती वह अलग से। पूरे देश ने एक बार फिर साबित किया कि वह अब किसी नेता और धार्मिक रंग में रंगने वाले नहीं हैं, अब वह अपनी बुद्धि का भी इस्तेमाल करेंगे। ऐसा नहीं है कि अब देश में कट्टरवादियों की कमी हो गई है। वे अब भी हैं और रहेंगे भी, लेकिन उनकी संख्या अब बहुत कम रह गई है और आम जनता अब उनके बहकावे में नहीं आने वाली। कट्टरवादी हिन्दुओं में भी हैं और मुसलमानों में भी। सच कहा जाए तो गांधी की मौत के बाद इस बार पहली बार लगा कि हमने सच माएने में उन्हें श्रद्धांजलि दी है। गांधी ने भी शायद ऐसे ही भारत का सपना देखा था, जो अब साकार होता दिख रहा है।


अपने जन्म से ही तमाम अवसरों पर कई तरह की आलोचनाओं का सामना कर रहे मीडिया ने भी इस बार एक नई इबारत लिख दी। अगर देश में कुछ नहीं हुआ तो इसके पीछे लोगों की समझदारी तो थी ही, लेकिन इसमें मीडिया की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। फैसला जब 24 सितम्बर को आना था तब भी मीडिया ने पूरा संयम बरता और जब पता लगा कि फैसला टल गया है तब भी पूरी ईमानदारी से काम जारी रखा। यह एक ऐसा मुद्दा था, जिस पर देश के अरबों लोगों की ही नहीं, बल्कि विदेशियों की भी निगाहें थीं। वे भी जानना चाह रहे थे कि भारत में 1992 की अपेक्षा कुछ परिवर्तन और परिवक्वता आई है कि नहीं। ऐसे में कोई भी चैनल टीआरपी में आगे जा सकती थी, लेकिन किसी चैनल ने ऐसा नहीं किया। सबने यही कहा कि टीआरपी आती रहेगी, अगर देश का अमन-चैन गया तो वह वापस नहीं आएगा। चैनलों पर हिन्दू-मुस्लिम एकता का अद्भुत सामन्जस्य भी देखने को मिला। लगभग हर छोटे-बड़े चैनल पर दो एंकर बिठाए गए और उनमें एक हिन्दू और एक मुसलमान रहा। फैसला आने के बाद किसी एंकर के चेहरे पर खुशी या दुख का भाव देखने को नहीं मिला। यह स्थिति फैसला आने के दिन ही नहीं उसके दो दिन बाद तक जारी रही। दो दिन बाद तक किसी ऐसे चेहरे को टीवी पर नहीं दिखाया गया जो अतिवादी हो या फिर कुछ उल्टा-सीधा कह जाए। अगर वह आया भी तो अमन और शांति की अपील करता हुआ ही दिखा।

अब बात पिं्रट मीडिया यानी अखबारों की। किसी भी अखबार ने अपने संपादकीय में या फिर अपने किसी लेख में ऐसा प्रदर्शित नहीं किया वह किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष के लगाव रखता है। 1992 में कई अखबारों में यह आरोप लगा था कि वे किसी पार्टी विशेष के अखबार हैं, इस बार ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। फैसले के अगले दिन मुख्य हेडिंग में भी किसी अखबार ने ऐसी हेडिंग नहीं दी जिससे लगे कि किसी की जीत और किसी की हार हुई है। हेडिंग में वही कहा गया जो एक लाइन मेें कुछ शब्दों के इस्तेमाल से लिखा जा सकता है।

सच कहूं तो मुझे खुद को बहुत दिन बाद गौरवान्वित महसूस करने का मौका मिला है। मैं आज शान से कह सकता हूं कि मैं भारत में रहता हूं और एक मीडियाकर्मी हूं। शुक्रिया इंडिया...

गुरुवार, सितंबर 30, 2010

अब फिर बदलेगा परिदृश्य

अयोध्या विवाद पर न्यायालय का फैसला आ गया है। पहली नजर में फैसला हिन्दुओं के पक्ष में जाता दिख रहा है, हालांकि यह भी सही है कि फैसला बहुत ज्यादा बड़ा है और उसे पढऩे, समझने और उसके मायने निकालने में समय लगेगा।

यह बात पहले से ही जाहिर थी कि मामला यही खत्म नहीं होगा और जो भी पक्ष यहां मुंह की खाएगा वह उच्च अदालत की शरण में जरूर जाएगा। होने भी यही जा रहा है, जल्द से जल्द वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। फैसला सही है या गलत यह दूसरा मुद्दा हो सकता है, लेकिन अहम सवाल जो अब उभर कर सामने आ रहा है वह यह है कि क्या अब हमारे समाज में बदला हुआ परिदृश्य नजर आएगा। 30 सितम्बर2010 से पहले और 30 सितम्बर 2010 के बाद के माहौल और स्थिति में कुछ परिवर्तन आएगा क्या ? या सब कुछ पहले की ही तरह चलता रहेगा। पहली नजर में तो यही लगता है कि स्थितियों में निश्चित रूप से परिवर्तन ही नहीं बल्कि भारी परिवर्तन आने जा रहा है। यह बात अलग है कि यह परिवर्तन कब से आएगा। कुछ दिन बाद, कुछ महीने बाद या फिर कुछ साल बाद।

जिस तरह से 6 दिसम्बर1992 इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है, उससे बड़ी तारीख 30 सितम्बर2010 है। इस तारीख को60 साल बाद ऐसा फैसला सुनाया गया जिस पर करोड़ों नहीं बल्कि अरबों नजरें थीं। यह बात अलग है कि 6 दिसम्बर एक काला अध्याय था और 30 सितम्बर एक सफेद सच।6 दिसम्बर को मैं काला अध्याय इसलिए नहीं कह रहा कि उस दिन मस्जिद तोड़ी गई थी बल्कि इसलिए कह रहा हूं जो भी काम उस दिन किया गया वह गैर-कानूनी रूप से किया गया था और 30 सितम्बर को जो फैसला आया वह न्याय पालिका का फैसला है और यह बात सच है कि न्याय पालिका किसी धर्म, किसी मान्यता और किसी भावना को नहीं समझती उसे तो बस तर्क और सबूत चाहिए।

खैर, यह अलग मुद्दा हो सकता है। बात हो रही थी आने वाले समय के परिदृश्य में परिवर्तन की। जिस तरह 6 दिसम्बर की घटना के बाद देश की राजनीति और सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया उसी तरह अब भी आएगा। अगर मेरे कहे को अन्यथा न लें तो मैं यह भी कहना चाहूंगा कि देश इस समय जिस सबसे बड़ी समस्याओं में से एक से लड़ रहा है वह और बढ़ेगी और उसे रोकना अब और भी मुश्किल हो जाएगा। बात हो रही है आतंक की। जिस तरह से 6 दिसम्बर1992 की घटना के बाद देश में आतंकी घटनाओं में एकदम से बाढ़ आ गई थी कहीं न कहीं वही स्थिति फिर आने वाली है। आज अगर हर आतंकी घटना के पीछे किसी मुस्लिम नवयुवक का नाम आता है तो मैं दृढ़ता के साथ कहना चाहता हूूं कि उसके पीछे कहीं न कहीं 6 दिसम्बर 1992 भी है।

दरअसल देश के दुश्मनों को इसी तरह के मौकों की तलाश रहती है। और हम उन्हें जाने अनजाने इस तरह के मौके देते भी रहते हैं। देश विरोधी ताकतों को युवाओं को बरगलाने के लिए इसी तरह की घटनाओं का इंतजार रहता है। अब देश के दुश्मन युवाओं खासकर मुस्लिम युवाओं को इस बात का ज्ञान देंगी कि देखो जिस देश को तुम अपना कहते हो वह तुम्हारा है ही नहीं। वहां की कार्यपालिका और विधायिका तो तुम्हें अपना पहले से ही नहीं मानती थी अब एक ऐसा निर्णय सुनाया गया है जिससे यह साबित होता है कि न्यायपालिका भी ऐसा ही सोचती है।

मुझे आंकड़ों की जानकारी तो नहीं है, लेकिन याददाश्त के आधार पर इतना जरूर कह सकता हूं कि 6 दिसम्बर 1992 के 18 साल पहले कितने आतंकी हमले देश के ऊपर हुए और उसमें कितने देशवासी शहीद हुए और 6 दिसम्बर 1992 के बाद कितने आतंकी हमले हुए और कितने निर्दोष मौत के मुंह में असमय ही समा गए।

यहां कहना चाहता हूं कि जब मैंने पिछले दिनों सावधान आगे खतरा है हेडिंग से लेख लिखा था तो कई साथियों की टिप्पणी आई कि आप एक पत्रकार हैं पत्रकार ही रहिए ज्योतिषी मत बनिए। उनकी राय बिल्कुल सही है। मैं ज्योतिषी बनना भी नहीं चाहता पर जो चीज लगती है उसे यहां लिख देता हूं। यह भी सच है कि मेरी वह बात सच भी साबित हुई और दिल्ली में जामा मस्जिद के पास विदेशियों पर फायरिंग हुई। इतने संवेदनशील समय में भी पुलिस और अन्य विभाग अभी तक यह पता नहीं लगा पाए है कि आखिर वे हमलावर कौन थे? वे अभी भी देश में ही होंगे और भारत की ही रोटी खाकर पल रहे होंगे, लेकिन किसी को पता नहीं कि वे कहां हैं।
अंत में इतना ही और कि मैं न तो फैसला को अच्छा कह रहा हूं और न ही गलत, क्योंकि अदालत ने जो फैसला किया उसके लिए 60 साल का समय लिया और न जाने कितने लोगों की बात सुनी होगी, तब जाकर यह फैसला आया है, ऐसे में एक शब्द में इसका अर्थ निकालना मेरे ख्याल से बेवकूफी ही होगी। मेरा काम आगाह करना था सो कर दिया बाकी आपकी मर्जी.....

शनिवार, सितंबर 25, 2010

ऐसे नहीं रुकेगा आतंक

क्या आपको लगता है कि आतंकवाद खत्म किया जा सकता है? क्या आपको लगता है कि भारत में कभी अमेरिका या ब्रिटेन जैसी स्थिति बन पाएगी, कि कोई आतंकी संगठन वहां वारदात करने से पहले कई बार सोचे? क्या हम और आने वाली पीढ़ी कभी डर के साए से बाहर निकल पाएंगे? सवाल और भी हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय इन सवालों का जवाब हां में दे पाएगा। क्या हम आगे भी इसी तरह जीते रहेंगे जैसे आज जी रहे हैं? या फिर इसमें कोई बदलाव की स्थिति निकट भविष्य में दीखती है। खैर, मुझे तो नहीं दिखती।

भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जो मानते हैं कि भारत में आतंकवाद का कारण पाकिस्तान है और पाकिस्तान चूंकि कश्मीर को पाना चाहता है इसलिए कश्मीर सहित पूरे देश में आतंक का माहौल बनाना चाहता है, ताकि थक-हारकर भारत कश्मीर पर समझौता करने पर तैयार हो जाए। बहुत से लोग मानते हैं कि अगर कश्मीर की समस्या का हल हो जाए तो आतंकवाद पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। पहली बात तो यह है कि कश्मीर की समस्या हल नहीं होगी और अगर मान लीजिए किसी तरह हो भी जाएगी तो क्या आतंक कम हो जाएगा? साहब आतंक तब भी कम नहीं होगा। हर व्यक्ति सजग और सतर्क हो जाए और उसे जरा भी लगे कि फलां व्यक्ति किसी गलत काम में या आतंकी गतिविधि में लिप्त है तो पुलिस को सूचित कर दे तो भी क्या आतंकी घटनाओं को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। तो जनाब मुझे ऐसा नहीं लगता।

एक लाइन में कहूं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जब तक न्यायालय द्वारा आतंककारी घोषित किए जा चुके लोगों को निर्धारित सजा नहीं मिल जाती, तब तक कोई खास उम्मीद रखना निरा बेमानी ही होगी।

पिछले दिनों दिल्ली में जामा मस्जिद के पास हुआ हमला कुछ नए संकेत कर रहा है। अब आतंकी खुद को नष्ट करके हमें खत्म नहीं करना चाहते बल्कि वे चाहते हैं कि वे सुरक्षित रहें और हमें खत्म करें। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आतंकियों के निशाने पर अब भारतीय नहीं बल्कि भारत आने वाले विदेशी हैं ताकि दुनियाभर में भारत की भद्द पिटे।
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किसी आतंकी घटना को अंजाम देकर निकल भागने वालों को पकडऩा कितना मुश्किल काम होता है यह सब जानते हैं। न जाने कितनी मुसीबत और मेहनत के बाद पुलिस और अन्य फोर्सेस उन्हें पकड़ पाते हैं। उसके बाद अदालत में मुकदमा चलता है। चूंकि अदालत सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती है इसलिए यह साबित करना कि यह व्यक्ति आतंकी है बड़ा टेढ़ा काम होता है। कड़ी मशक्कत के बाद अदालत में यह साबित भी हो जाता है कि फलां आदमी आतंकी है तब कहीं जाकर न्यायालय फैसला सुनाती है। खास बात यह भी कि इसमें कुछ दिन या महीनों का समय नहीं बल्कि अक्सर कई साल लग जाते हैं। अदालत से अपराधी घोषित व्यक्ति को सजा मिल जाती है, लेकिन अदालत के निर्णय का क्रियान्वयन नहीं हो पाता। बड़ी दिक्कत यही है।

जब तक अदालत से दोषी करार दिए गए व्यक्ति को सजा नहीं मिलती यह सोचना कि देश से आतंक कम हो जाएगा बिल्कुल दिन में सपने देखने जैसा ही है। सबसे पहले आतंकियों को सजा दी जानी चाहिए, ताकि जो लोग भविष्य में ऐसा कुछ करने के बारे में विचार कर रहे हैं वे ऐसा करने से बचें। बाकी तो ख्याली पुलाव हैं आप भी पकाइए मैं भी पकाऊं...

मंगलवार, सितंबर 14, 2010

राष्ट्र अभी तक गूंगा है!



मोहनदास करमचंद गांधी। यानी महात्मा गांधी। उनको लेकर हर व्यक्ति की अपनी- अपनी राय हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक लिहाज से बहुदा लोगों की राय को ही हम मानते हैं। अंगुली हर किसी पर उठती है। राम, कृष्ण, मोहम्मद साहब, गुरुनानक और जीसस पर भी उठी तो गांधी तो हाड़-मांस के एक इंसान भर थे। उनका कहना था कि कोई भी राष्ट्र्र, राष्ट्र भाषा के बगैर गूंगा है। आज हिंदी दिवस है और हिन्दी हमारी राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं। यानी आजाद भारत की कोई भी भाषा ही नहीं है। बगैर भाषा के ही हम अब तक गुजर कर रहे हैं।

कभी-कभी तो बात कमाल की लगती है। जो देश तकनीकी लिहाज से समृद्ध राष्ट्रों की श्रेणी में आ गया हो, जो देश राष्ट्रमंडल जैसे खेलों आयोजन कर रहा हो। जिस देश का लोहा अमेरिका के राष्ट्रपति तक मानते हों, जो देश अपनी सभ्यता और संस्कृति पर नाज करता हो, उसकी कोई भाषा ही नहीं है। और मजे की बात तो यह भी कि इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास भी नहीं किए जा रहे, सिर्फ खानापूर्ति और कुछ नहीं।
दरअसल, हिंदी की राह में रोड़े तो तभी डाल दिए गए थे, जब इसे राजभाषा का दर्ज दिया गया था। संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार हिन्दी को राजभाषा का स्थान दिया गया। लेकिन इसके साथ ही राजभाषा अधिनियम 1963 (संशोधित अधिनियम 1967) के अनुसार संघ की राजभाषा के रूप में अंग्रेजी को हमारे ऊपर अनिश्चितकाल के लिए थोप दिया गया। शायद संसद को भी उस समय पता नहीं था कि यह क्या अधिनियम है और इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। इसमें कहा गया था कि जब तक देश के सभी राज्यों की विधानसभाएं अंग्रेजी छोड़कर हिन्दी अपनाने का प्रस्ताव पारित नहीं कर देतीं तब तक अंग्रेजी का ही प्रयोग यूं ही होता रहेगा। एक बात और जो यहां महत्वपूर्ण है। अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार संघ की राजभाषा हिन्दी को 15 वर्ष बाद वही मान-सम्मान मिलना था, जो हमारे राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय ध्वज को प्राप्त है, लेकिन यह विडम्बना ही कही जाएगी कि 25 जनवरी 1964 में 15 वर्ष की अवधि पूरी करने से पहले ही राजभाषा अधिनियम 1963 के जरिए हिन्दी के पर इस तरह काट दिए गए कि वह कहीं की न रहे। सवाल यह भी उठाया जा सकता है कि यह क्यों हुआ? दरअसल यह सब दबाव और आपसी कुचक्रों के कारण ही हुआ। हालांकि यह सही है कि कई लोगों ने इसका विरोध किया पर वे सफल नहीं हो सके। इस प्रकार हिन्दी को जो सम्मान मिलना चाहिए था, उस कहानी का वहीं दुखद अंत हो गया।

गौर करें तो पाएंगे कि शायद अंग्रेज हमसे ज्याद दूरदृष्टा थे। यही कारण था कि वे जब समझ गए कि भारत पर राज करना अब आसान नहीं है, तो उन्होंने यहां से निकलने में ही भलाई समझी। लेकिन जाते जाते वे अपनी आदत और दूरदृष्टि से ऐसा कर गए कि भारत कभी चैन से न बैठ पाए। इसीलिए पाकिस्तान के रूप में भारत का एक महत्वपूर्ण अंग अलग हो गया। आज सब जानते हैं कि अपने उसी हिस्से के कारण भारत को नित नई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पाकिस्तान का तो जैसे एक सूत्रीय लक्ष्य है कि भारत के बढ़ते कदमों को रोकना। उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ही वह खुद कहां है और क्या करेगा। भारत की बढ़त को रोका जाए उनके हुकमरानों की यही चाहत रहती है। यह बंटवारा यूं ही नहीं हुआ। इसके पीछे सोची समझी रणनीति और चाल थी जो शायद आज हमारी समझ में आ रही है। यह भी दीगर है कि बहुतों को अभी भी यह समझ नहीं आ रही है। अगर ऐसा न होता तो हिन्दी की हालत आज यह नहीं होती जो है। कहा गया है कि अगर देश के सभी राज्यों की विधानसभा इस बात पर मोहर लगा दें कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए तो कौन है जो इसे रोक सकता है।
भारत अनेकताओं में एकता वाला देश है। यह बात कहने और सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है पर धरातल पर सोचें तो यही अनेकता कभी-कभी देश की दुश्मन भी बन जाती है। ब्रिटिश शासक शायद जानते थे कि देश के सभी राज्यों की विधानसभा हिन्दी को राष्ट्रभाषा की बात पर सहमत नहीं होंगी, इसीलिए वे ऐसा अनुच्छेद बना गए और हम हैं कि उसी लकीर के फकीर बने हुए हैं। कभी हम मराठी बन जाते हैं तो कभी पंजाबी। कभी बंगाली बन जाते हैं तो कभी बिहारी। इसीलिए एकजुटता के साथ हिन्दी को मान-सम्मान दिलाने का प्रयास नहीं करते।

14 सितम्बर आने पर हमें हिन्दी की याद आती है। अखबारों में लेख छप जाते हैं और ब्लॉग पर पोस्ट लिख दी जाती है। हिन्दी पखवाड़ा आयाजित किया जाता है और फिर साल भर के लिए हिन्दी को भुला दिया जाता है। हम भी अगले वर्ष फिर हिन्दी की बात करेंगे...

रविवार, अगस्त 22, 2010

सावधान ! आगे खतरा है

सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि मैं जो कुछ भी यहां लिखने जा रहा हूं मैं चाहता हूं कि वह गलत निकले। क्योंकि अगर मेरी कही हुई बात गलत निकली तो ही ठीक है। लेकिन फिर भी आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं।
15 अगस्त शांति से निपट गया है। जम्मू-कश्मीर की घटना छोड़ दें तो बाकी सभी जगह सब ठीक ठाक रहा। अगस्त का महीना समाप्त होते ही ऐसा कुछ होने वाला हैै कि कुछ भी हो सकता है। सबसे पहले इस बात की संभावना है कि अयोध्या विवाद का फैसला सितम्बर में आ जाए। फैसला आएगा तो यह तय कि कुछ न कुछ जरूर होगा। अगर फैसला मुसलमानों के पक्ष में जाएगा तो हिन्दूवादी संगठन चुप नहीं बैठेंगे और कुछ न कुछ जरूर करेंगे, इसके लिए अंदरखाते योजना बननी भी शुरू हो गई है। फैसला आते ही कुछ न कुछ होगा। अगर फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया तो मुसलमान भी चुप बैठेंगे यह मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी। हालांकि यह सही है कि मुस्लिम संगठनों ने अभी कुछ आक्रामक तेवर नहीं दिखाए हैं लेकिन फैसला आने के बाद क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। चुंकि यह धार्मिक मुद्दा है लोगों की भावनाओं का मुद्दा है, इसलिए यह कुछ सीमित स्थानों पर ही सीमित रहेगा यह भी नहीं कहा जा सकता। अगर जरा सी भी आग लगी तो पूरे देश में फैलेगी और न जाने कितनों को जला कर राख कर देगी। शायद इसीलिए यूपी की मुख्यमंत्री ने दूरदृष्टि का परिचय देते हुए पुलिस अधिकारियों की छुट्टी रद्द कर दी है। ताकि अगर हालात खराब हों तो स्थिति पर तत्काल नियंत्रण पाया जा सके।
मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो, लेकिन बहुत हद तक आशंका है कि कुछ न कुछ होगा जरूर।
दूसरी स्थित बनेगी अक्टूबर में। इस माह में कॉमनवेल्थ गेम्स यानी राष्ट्रमंडल खेल होंगे। हमारे देश के नेताओं को जो कुछ भी करना है वे कर चुके हैं और अंदरखाते कर भी रहे होंगे जिनका खुलासा शायद बाद में हो। लेकिन बाहर के लोगों का क्या कहिएगा। जी, हां मैं बात कर रहा हूं भाड़े के आतंककारियों की। क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान और तालिबान यह चाहेंगे कि भारत में राष्ट्रमंडल खेल शांति से हो पाएं? मुझे तो नहीं लगता। वैसे भी भारत में पिछले बहुत दिन से कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ है। पाकिस्तान के हालात खराब चल रहे हैं। बाढ़ से पूरा देश त्रस्त हैं। लोग भूखों मर रहे हैं। सेना राष्ट्रपति जरदारी हो हटाने के लिए पूरे प्रयास कर रही है। कुछ दिनों में ही वहां कुछ बड़ा परिवर्तन दिखे तो अचरज नहीं होना चाहिए। बहुत संभव है कि भारत पर कुछ दिन से इसलिए हमला न हुआ हो कि राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। ऐसे मौके पर कुछ किया जाए तो कहने ही क्या। तय है कि निश्चित रूप से बड़ी संख्या में विदेशी भी मारे जाएंगे और भारत की भद्द पिटेगी वह अलग से। वैसे भी आतंककारी अब चाहते हैं कि भारतीयों के साथ साथ विदेशी भी मारे जाएं, इसीलिए होटल ताज पर हमला किया गया था। दिल्ली सुरक्षा इंतजामात को लेकर वैसे भी संतुष्ट नहीं है। भले कोई बड़ी वारदात न हो लेकिन आतंककारी माहौल बिगाडऩे का प्रयास नहीं करेंगे यह मानने वाली बात नहीं है।
तीसरी बात, पेंटागन से खबर आई है कि चीन ने भारत की सीमा पर परमाणु मिसाइल तैनात कर दी है। हालांकि चीन ने इसका खंडन किया और बकवास करार दिया है लेकिन फिर भी चौकन्ना तो रहना ही होगा। यह सही है कि चीन ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा, जिससे उसे कोई परेशानी हो, लेकिन वह भारत पर अतिरिक्त दबाव बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। वह सीमा तक अपने सड़क मार्ग को दुरुस्त कर रहा है। यह सही है कि हाल-फिलहाल इस मामले में कोई संकट नहीं आने वाला लेकिन भविष्य किसने देखा है? चीन जिस स्तर की तैयारियां कर रहा है वह निश्चित रूप से चौंकाने वाली और सतर्क करने वाली है। अगर चीन के इरादे नेक हैं तब तो कोई बात नहीं लेकिन अगर जरा भी शंका हुई तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। पूरा देश राष्ट्रमंडल खेल की तैयारियों में लगा रहे और चीन सिर पर आकर बैठ जाए तो क्या कहिएगा।
खतरे और भी हैं, जो बिना बताए आ सकते हैं। सतर्क सबसे रहने की जरूरत है। मैं एक बार फिर कह दूं कि मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो। मंदिर-मस्जिद मामले का कोई ऐसा हल निकले जो दोनों पक्ष मान लें और देश में सौहार्द का माहौल बना रहे। राष्ट्रमंडल खेलों में अभी तक जो हुआ सो हुआ अब सब सही हो जाए। आतंककारी अपने झंझावातों में फंसे रहे और इधर न आ पाएं। आएं भी तो उनका कोई मंसूबा पूरा न होने दिया जाए, उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया जाए। चीन अपने देश में जो कुछ भी कर रहा है वह अपने विकास के लिए कर रहा हो, उसका इरादा भारत को नुकसान पहुंचाने का न हो। चाहता तो यही हूं, लेकिन कौन जाने कब क्या हो जाए।
जाने क्या होगा रामा रे...

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