शनिवार, अक्टूबर 02, 2010

वाह इंडिया, शाबाश मीडिया




इसे इत्तेफाक ही कहें कि जिस मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने पूरे जीवन हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया उनकी जयंती से दो दिन पूर्व ही एक ऐसे मामले का निर्णय आया जो लम्बे समय से लटका था। खास बात यह भी की मुद्दा तब ही गरमाया जब गांधी को सिधारे कुछ ही साल बीते थे।

सुखद बात यह रही कि आजादी के इतने वर्षों बाद पहली बार लगा कि भारत गांधी, कबीर और बुद्ध का देश है। अगर 30 सितंबर को कहीं पत्ता भी खड़कता तो यह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता और दुनिया भर में भारत की जो फजीहत होती वह अलग से। पूरे देश ने एक बार फिर साबित किया कि वह अब किसी नेता और धार्मिक रंग में रंगने वाले नहीं हैं, अब वह अपनी बुद्धि का भी इस्तेमाल करेंगे। ऐसा नहीं है कि अब देश में कट्टरवादियों की कमी हो गई है। वे अब भी हैं और रहेंगे भी, लेकिन उनकी संख्या अब बहुत कम रह गई है और आम जनता अब उनके बहकावे में नहीं आने वाली। कट्टरवादी हिन्दुओं में भी हैं और मुसलमानों में भी। सच कहा जाए तो गांधी की मौत के बाद इस बार पहली बार लगा कि हमने सच माएने में उन्हें श्रद्धांजलि दी है। गांधी ने भी शायद ऐसे ही भारत का सपना देखा था, जो अब साकार होता दिख रहा है।


अपने जन्म से ही तमाम अवसरों पर कई तरह की आलोचनाओं का सामना कर रहे मीडिया ने भी इस बार एक नई इबारत लिख दी। अगर देश में कुछ नहीं हुआ तो इसके पीछे लोगों की समझदारी तो थी ही, लेकिन इसमें मीडिया की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। फैसला जब 24 सितम्बर को आना था तब भी मीडिया ने पूरा संयम बरता और जब पता लगा कि फैसला टल गया है तब भी पूरी ईमानदारी से काम जारी रखा। यह एक ऐसा मुद्दा था, जिस पर देश के अरबों लोगों की ही नहीं, बल्कि विदेशियों की भी निगाहें थीं। वे भी जानना चाह रहे थे कि भारत में 1992 की अपेक्षा कुछ परिवर्तन और परिवक्वता आई है कि नहीं। ऐसे में कोई भी चैनल टीआरपी में आगे जा सकती थी, लेकिन किसी चैनल ने ऐसा नहीं किया। सबने यही कहा कि टीआरपी आती रहेगी, अगर देश का अमन-चैन गया तो वह वापस नहीं आएगा। चैनलों पर हिन्दू-मुस्लिम एकता का अद्भुत सामन्जस्य भी देखने को मिला। लगभग हर छोटे-बड़े चैनल पर दो एंकर बिठाए गए और उनमें एक हिन्दू और एक मुसलमान रहा। फैसला आने के बाद किसी एंकर के चेहरे पर खुशी या दुख का भाव देखने को नहीं मिला। यह स्थिति फैसला आने के दिन ही नहीं उसके दो दिन बाद तक जारी रही। दो दिन बाद तक किसी ऐसे चेहरे को टीवी पर नहीं दिखाया गया जो अतिवादी हो या फिर कुछ उल्टा-सीधा कह जाए। अगर वह आया भी तो अमन और शांति की अपील करता हुआ ही दिखा।

अब बात पिं्रट मीडिया यानी अखबारों की। किसी भी अखबार ने अपने संपादकीय में या फिर अपने किसी लेख में ऐसा प्रदर्शित नहीं किया वह किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष के लगाव रखता है। 1992 में कई अखबारों में यह आरोप लगा था कि वे किसी पार्टी विशेष के अखबार हैं, इस बार ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। फैसले के अगले दिन मुख्य हेडिंग में भी किसी अखबार ने ऐसी हेडिंग नहीं दी जिससे लगे कि किसी की जीत और किसी की हार हुई है। हेडिंग में वही कहा गया जो एक लाइन मेें कुछ शब्दों के इस्तेमाल से लिखा जा सकता है।

सच कहूं तो मुझे खुद को बहुत दिन बाद गौरवान्वित महसूस करने का मौका मिला है। मैं आज शान से कह सकता हूं कि मैं भारत में रहता हूं और एक मीडियाकर्मी हूं। शुक्रिया इंडिया...

गुरुवार, सितंबर 30, 2010

अब फिर बदलेगा परिदृश्य

अयोध्या विवाद पर न्यायालय का फैसला आ गया है। पहली नजर में फैसला हिन्दुओं के पक्ष में जाता दिख रहा है, हालांकि यह भी सही है कि फैसला बहुत ज्यादा बड़ा है और उसे पढऩे, समझने और उसके मायने निकालने में समय लगेगा।

यह बात पहले से ही जाहिर थी कि मामला यही खत्म नहीं होगा और जो भी पक्ष यहां मुंह की खाएगा वह उच्च अदालत की शरण में जरूर जाएगा। होने भी यही जा रहा है, जल्द से जल्द वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। फैसला सही है या गलत यह दूसरा मुद्दा हो सकता है, लेकिन अहम सवाल जो अब उभर कर सामने आ रहा है वह यह है कि क्या अब हमारे समाज में बदला हुआ परिदृश्य नजर आएगा। 30 सितम्बर2010 से पहले और 30 सितम्बर 2010 के बाद के माहौल और स्थिति में कुछ परिवर्तन आएगा क्या ? या सब कुछ पहले की ही तरह चलता रहेगा। पहली नजर में तो यही लगता है कि स्थितियों में निश्चित रूप से परिवर्तन ही नहीं बल्कि भारी परिवर्तन आने जा रहा है। यह बात अलग है कि यह परिवर्तन कब से आएगा। कुछ दिन बाद, कुछ महीने बाद या फिर कुछ साल बाद।

जिस तरह से 6 दिसम्बर1992 इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है, उससे बड़ी तारीख 30 सितम्बर2010 है। इस तारीख को60 साल बाद ऐसा फैसला सुनाया गया जिस पर करोड़ों नहीं बल्कि अरबों नजरें थीं। यह बात अलग है कि 6 दिसम्बर एक काला अध्याय था और 30 सितम्बर एक सफेद सच।6 दिसम्बर को मैं काला अध्याय इसलिए नहीं कह रहा कि उस दिन मस्जिद तोड़ी गई थी बल्कि इसलिए कह रहा हूं जो भी काम उस दिन किया गया वह गैर-कानूनी रूप से किया गया था और 30 सितम्बर को जो फैसला आया वह न्याय पालिका का फैसला है और यह बात सच है कि न्याय पालिका किसी धर्म, किसी मान्यता और किसी भावना को नहीं समझती उसे तो बस तर्क और सबूत चाहिए।

खैर, यह अलग मुद्दा हो सकता है। बात हो रही थी आने वाले समय के परिदृश्य में परिवर्तन की। जिस तरह 6 दिसम्बर की घटना के बाद देश की राजनीति और सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया उसी तरह अब भी आएगा। अगर मेरे कहे को अन्यथा न लें तो मैं यह भी कहना चाहूंगा कि देश इस समय जिस सबसे बड़ी समस्याओं में से एक से लड़ रहा है वह और बढ़ेगी और उसे रोकना अब और भी मुश्किल हो जाएगा। बात हो रही है आतंक की। जिस तरह से 6 दिसम्बर1992 की घटना के बाद देश में आतंकी घटनाओं में एकदम से बाढ़ आ गई थी कहीं न कहीं वही स्थिति फिर आने वाली है। आज अगर हर आतंकी घटना के पीछे किसी मुस्लिम नवयुवक का नाम आता है तो मैं दृढ़ता के साथ कहना चाहता हूूं कि उसके पीछे कहीं न कहीं 6 दिसम्बर 1992 भी है।

दरअसल देश के दुश्मनों को इसी तरह के मौकों की तलाश रहती है। और हम उन्हें जाने अनजाने इस तरह के मौके देते भी रहते हैं। देश विरोधी ताकतों को युवाओं को बरगलाने के लिए इसी तरह की घटनाओं का इंतजार रहता है। अब देश के दुश्मन युवाओं खासकर मुस्लिम युवाओं को इस बात का ज्ञान देंगी कि देखो जिस देश को तुम अपना कहते हो वह तुम्हारा है ही नहीं। वहां की कार्यपालिका और विधायिका तो तुम्हें अपना पहले से ही नहीं मानती थी अब एक ऐसा निर्णय सुनाया गया है जिससे यह साबित होता है कि न्यायपालिका भी ऐसा ही सोचती है।

मुझे आंकड़ों की जानकारी तो नहीं है, लेकिन याददाश्त के आधार पर इतना जरूर कह सकता हूं कि 6 दिसम्बर 1992 के 18 साल पहले कितने आतंकी हमले देश के ऊपर हुए और उसमें कितने देशवासी शहीद हुए और 6 दिसम्बर 1992 के बाद कितने आतंकी हमले हुए और कितने निर्दोष मौत के मुंह में असमय ही समा गए।

यहां कहना चाहता हूं कि जब मैंने पिछले दिनों सावधान आगे खतरा है हेडिंग से लेख लिखा था तो कई साथियों की टिप्पणी आई कि आप एक पत्रकार हैं पत्रकार ही रहिए ज्योतिषी मत बनिए। उनकी राय बिल्कुल सही है। मैं ज्योतिषी बनना भी नहीं चाहता पर जो चीज लगती है उसे यहां लिख देता हूं। यह भी सच है कि मेरी वह बात सच भी साबित हुई और दिल्ली में जामा मस्जिद के पास विदेशियों पर फायरिंग हुई। इतने संवेदनशील समय में भी पुलिस और अन्य विभाग अभी तक यह पता नहीं लगा पाए है कि आखिर वे हमलावर कौन थे? वे अभी भी देश में ही होंगे और भारत की ही रोटी खाकर पल रहे होंगे, लेकिन किसी को पता नहीं कि वे कहां हैं।
अंत में इतना ही और कि मैं न तो फैसला को अच्छा कह रहा हूं और न ही गलत, क्योंकि अदालत ने जो फैसला किया उसके लिए 60 साल का समय लिया और न जाने कितने लोगों की बात सुनी होगी, तब जाकर यह फैसला आया है, ऐसे में एक शब्द में इसका अर्थ निकालना मेरे ख्याल से बेवकूफी ही होगी। मेरा काम आगाह करना था सो कर दिया बाकी आपकी मर्जी.....

शनिवार, सितंबर 25, 2010

ऐसे नहीं रुकेगा आतंक

क्या आपको लगता है कि आतंकवाद खत्म किया जा सकता है? क्या आपको लगता है कि भारत में कभी अमेरिका या ब्रिटेन जैसी स्थिति बन पाएगी, कि कोई आतंकी संगठन वहां वारदात करने से पहले कई बार सोचे? क्या हम और आने वाली पीढ़ी कभी डर के साए से बाहर निकल पाएंगे? सवाल और भी हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय इन सवालों का जवाब हां में दे पाएगा। क्या हम आगे भी इसी तरह जीते रहेंगे जैसे आज जी रहे हैं? या फिर इसमें कोई बदलाव की स्थिति निकट भविष्य में दीखती है। खैर, मुझे तो नहीं दिखती।

भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जो मानते हैं कि भारत में आतंकवाद का कारण पाकिस्तान है और पाकिस्तान चूंकि कश्मीर को पाना चाहता है इसलिए कश्मीर सहित पूरे देश में आतंक का माहौल बनाना चाहता है, ताकि थक-हारकर भारत कश्मीर पर समझौता करने पर तैयार हो जाए। बहुत से लोग मानते हैं कि अगर कश्मीर की समस्या का हल हो जाए तो आतंकवाद पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। पहली बात तो यह है कि कश्मीर की समस्या हल नहीं होगी और अगर मान लीजिए किसी तरह हो भी जाएगी तो क्या आतंक कम हो जाएगा? साहब आतंक तब भी कम नहीं होगा। हर व्यक्ति सजग और सतर्क हो जाए और उसे जरा भी लगे कि फलां व्यक्ति किसी गलत काम में या आतंकी गतिविधि में लिप्त है तो पुलिस को सूचित कर दे तो भी क्या आतंकी घटनाओं को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। तो जनाब मुझे ऐसा नहीं लगता।

एक लाइन में कहूं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जब तक न्यायालय द्वारा आतंककारी घोषित किए जा चुके लोगों को निर्धारित सजा नहीं मिल जाती, तब तक कोई खास उम्मीद रखना निरा बेमानी ही होगी।

पिछले दिनों दिल्ली में जामा मस्जिद के पास हुआ हमला कुछ नए संकेत कर रहा है। अब आतंकी खुद को नष्ट करके हमें खत्म नहीं करना चाहते बल्कि वे चाहते हैं कि वे सुरक्षित रहें और हमें खत्म करें। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आतंकियों के निशाने पर अब भारतीय नहीं बल्कि भारत आने वाले विदेशी हैं ताकि दुनियाभर में भारत की भद्द पिटे।
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किसी आतंकी घटना को अंजाम देकर निकल भागने वालों को पकडऩा कितना मुश्किल काम होता है यह सब जानते हैं। न जाने कितनी मुसीबत और मेहनत के बाद पुलिस और अन्य फोर्सेस उन्हें पकड़ पाते हैं। उसके बाद अदालत में मुकदमा चलता है। चूंकि अदालत सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती है इसलिए यह साबित करना कि यह व्यक्ति आतंकी है बड़ा टेढ़ा काम होता है। कड़ी मशक्कत के बाद अदालत में यह साबित भी हो जाता है कि फलां आदमी आतंकी है तब कहीं जाकर न्यायालय फैसला सुनाती है। खास बात यह भी कि इसमें कुछ दिन या महीनों का समय नहीं बल्कि अक्सर कई साल लग जाते हैं। अदालत से अपराधी घोषित व्यक्ति को सजा मिल जाती है, लेकिन अदालत के निर्णय का क्रियान्वयन नहीं हो पाता। बड़ी दिक्कत यही है।

जब तक अदालत से दोषी करार दिए गए व्यक्ति को सजा नहीं मिलती यह सोचना कि देश से आतंक कम हो जाएगा बिल्कुल दिन में सपने देखने जैसा ही है। सबसे पहले आतंकियों को सजा दी जानी चाहिए, ताकि जो लोग भविष्य में ऐसा कुछ करने के बारे में विचार कर रहे हैं वे ऐसा करने से बचें। बाकी तो ख्याली पुलाव हैं आप भी पकाइए मैं भी पकाऊं...

मंगलवार, सितंबर 14, 2010

राष्ट्र अभी तक गूंगा है!



मोहनदास करमचंद गांधी। यानी महात्मा गांधी। उनको लेकर हर व्यक्ति की अपनी- अपनी राय हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक लिहाज से बहुदा लोगों की राय को ही हम मानते हैं। अंगुली हर किसी पर उठती है। राम, कृष्ण, मोहम्मद साहब, गुरुनानक और जीसस पर भी उठी तो गांधी तो हाड़-मांस के एक इंसान भर थे। उनका कहना था कि कोई भी राष्ट्र्र, राष्ट्र भाषा के बगैर गूंगा है। आज हिंदी दिवस है और हिन्दी हमारी राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं। यानी आजाद भारत की कोई भी भाषा ही नहीं है। बगैर भाषा के ही हम अब तक गुजर कर रहे हैं।

कभी-कभी तो बात कमाल की लगती है। जो देश तकनीकी लिहाज से समृद्ध राष्ट्रों की श्रेणी में आ गया हो, जो देश राष्ट्रमंडल जैसे खेलों आयोजन कर रहा हो। जिस देश का लोहा अमेरिका के राष्ट्रपति तक मानते हों, जो देश अपनी सभ्यता और संस्कृति पर नाज करता हो, उसकी कोई भाषा ही नहीं है। और मजे की बात तो यह भी कि इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास भी नहीं किए जा रहे, सिर्फ खानापूर्ति और कुछ नहीं।
दरअसल, हिंदी की राह में रोड़े तो तभी डाल दिए गए थे, जब इसे राजभाषा का दर्ज दिया गया था। संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार हिन्दी को राजभाषा का स्थान दिया गया। लेकिन इसके साथ ही राजभाषा अधिनियम 1963 (संशोधित अधिनियम 1967) के अनुसार संघ की राजभाषा के रूप में अंग्रेजी को हमारे ऊपर अनिश्चितकाल के लिए थोप दिया गया। शायद संसद को भी उस समय पता नहीं था कि यह क्या अधिनियम है और इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। इसमें कहा गया था कि जब तक देश के सभी राज्यों की विधानसभाएं अंग्रेजी छोड़कर हिन्दी अपनाने का प्रस्ताव पारित नहीं कर देतीं तब तक अंग्रेजी का ही प्रयोग यूं ही होता रहेगा। एक बात और जो यहां महत्वपूर्ण है। अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार संघ की राजभाषा हिन्दी को 15 वर्ष बाद वही मान-सम्मान मिलना था, जो हमारे राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय ध्वज को प्राप्त है, लेकिन यह विडम्बना ही कही जाएगी कि 25 जनवरी 1964 में 15 वर्ष की अवधि पूरी करने से पहले ही राजभाषा अधिनियम 1963 के जरिए हिन्दी के पर इस तरह काट दिए गए कि वह कहीं की न रहे। सवाल यह भी उठाया जा सकता है कि यह क्यों हुआ? दरअसल यह सब दबाव और आपसी कुचक्रों के कारण ही हुआ। हालांकि यह सही है कि कई लोगों ने इसका विरोध किया पर वे सफल नहीं हो सके। इस प्रकार हिन्दी को जो सम्मान मिलना चाहिए था, उस कहानी का वहीं दुखद अंत हो गया।

गौर करें तो पाएंगे कि शायद अंग्रेज हमसे ज्याद दूरदृष्टा थे। यही कारण था कि वे जब समझ गए कि भारत पर राज करना अब आसान नहीं है, तो उन्होंने यहां से निकलने में ही भलाई समझी। लेकिन जाते जाते वे अपनी आदत और दूरदृष्टि से ऐसा कर गए कि भारत कभी चैन से न बैठ पाए। इसीलिए पाकिस्तान के रूप में भारत का एक महत्वपूर्ण अंग अलग हो गया। आज सब जानते हैं कि अपने उसी हिस्से के कारण भारत को नित नई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पाकिस्तान का तो जैसे एक सूत्रीय लक्ष्य है कि भारत के बढ़ते कदमों को रोकना। उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ही वह खुद कहां है और क्या करेगा। भारत की बढ़त को रोका जाए उनके हुकमरानों की यही चाहत रहती है। यह बंटवारा यूं ही नहीं हुआ। इसके पीछे सोची समझी रणनीति और चाल थी जो शायद आज हमारी समझ में आ रही है। यह भी दीगर है कि बहुतों को अभी भी यह समझ नहीं आ रही है। अगर ऐसा न होता तो हिन्दी की हालत आज यह नहीं होती जो है। कहा गया है कि अगर देश के सभी राज्यों की विधानसभा इस बात पर मोहर लगा दें कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए तो कौन है जो इसे रोक सकता है।
भारत अनेकताओं में एकता वाला देश है। यह बात कहने और सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है पर धरातल पर सोचें तो यही अनेकता कभी-कभी देश की दुश्मन भी बन जाती है। ब्रिटिश शासक शायद जानते थे कि देश के सभी राज्यों की विधानसभा हिन्दी को राष्ट्रभाषा की बात पर सहमत नहीं होंगी, इसीलिए वे ऐसा अनुच्छेद बना गए और हम हैं कि उसी लकीर के फकीर बने हुए हैं। कभी हम मराठी बन जाते हैं तो कभी पंजाबी। कभी बंगाली बन जाते हैं तो कभी बिहारी। इसीलिए एकजुटता के साथ हिन्दी को मान-सम्मान दिलाने का प्रयास नहीं करते।

14 सितम्बर आने पर हमें हिन्दी की याद आती है। अखबारों में लेख छप जाते हैं और ब्लॉग पर पोस्ट लिख दी जाती है। हिन्दी पखवाड़ा आयाजित किया जाता है और फिर साल भर के लिए हिन्दी को भुला दिया जाता है। हम भी अगले वर्ष फिर हिन्दी की बात करेंगे...

रविवार, अगस्त 22, 2010

सावधान ! आगे खतरा है

सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि मैं जो कुछ भी यहां लिखने जा रहा हूं मैं चाहता हूं कि वह गलत निकले। क्योंकि अगर मेरी कही हुई बात गलत निकली तो ही ठीक है। लेकिन फिर भी आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं।
15 अगस्त शांति से निपट गया है। जम्मू-कश्मीर की घटना छोड़ दें तो बाकी सभी जगह सब ठीक ठाक रहा। अगस्त का महीना समाप्त होते ही ऐसा कुछ होने वाला हैै कि कुछ भी हो सकता है। सबसे पहले इस बात की संभावना है कि अयोध्या विवाद का फैसला सितम्बर में आ जाए। फैसला आएगा तो यह तय कि कुछ न कुछ जरूर होगा। अगर फैसला मुसलमानों के पक्ष में जाएगा तो हिन्दूवादी संगठन चुप नहीं बैठेंगे और कुछ न कुछ जरूर करेंगे, इसके लिए अंदरखाते योजना बननी भी शुरू हो गई है। फैसला आते ही कुछ न कुछ होगा। अगर फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया तो मुसलमान भी चुप बैठेंगे यह मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी। हालांकि यह सही है कि मुस्लिम संगठनों ने अभी कुछ आक्रामक तेवर नहीं दिखाए हैं लेकिन फैसला आने के बाद क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। चुंकि यह धार्मिक मुद्दा है लोगों की भावनाओं का मुद्दा है, इसलिए यह कुछ सीमित स्थानों पर ही सीमित रहेगा यह भी नहीं कहा जा सकता। अगर जरा सी भी आग लगी तो पूरे देश में फैलेगी और न जाने कितनों को जला कर राख कर देगी। शायद इसीलिए यूपी की मुख्यमंत्री ने दूरदृष्टि का परिचय देते हुए पुलिस अधिकारियों की छुट्टी रद्द कर दी है। ताकि अगर हालात खराब हों तो स्थिति पर तत्काल नियंत्रण पाया जा सके।
मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो, लेकिन बहुत हद तक आशंका है कि कुछ न कुछ होगा जरूर।
दूसरी स्थित बनेगी अक्टूबर में। इस माह में कॉमनवेल्थ गेम्स यानी राष्ट्रमंडल खेल होंगे। हमारे देश के नेताओं को जो कुछ भी करना है वे कर चुके हैं और अंदरखाते कर भी रहे होंगे जिनका खुलासा शायद बाद में हो। लेकिन बाहर के लोगों का क्या कहिएगा। जी, हां मैं बात कर रहा हूं भाड़े के आतंककारियों की। क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान और तालिबान यह चाहेंगे कि भारत में राष्ट्रमंडल खेल शांति से हो पाएं? मुझे तो नहीं लगता। वैसे भी भारत में पिछले बहुत दिन से कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ है। पाकिस्तान के हालात खराब चल रहे हैं। बाढ़ से पूरा देश त्रस्त हैं। लोग भूखों मर रहे हैं। सेना राष्ट्रपति जरदारी हो हटाने के लिए पूरे प्रयास कर रही है। कुछ दिनों में ही वहां कुछ बड़ा परिवर्तन दिखे तो अचरज नहीं होना चाहिए। बहुत संभव है कि भारत पर कुछ दिन से इसलिए हमला न हुआ हो कि राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। ऐसे मौके पर कुछ किया जाए तो कहने ही क्या। तय है कि निश्चित रूप से बड़ी संख्या में विदेशी भी मारे जाएंगे और भारत की भद्द पिटेगी वह अलग से। वैसे भी आतंककारी अब चाहते हैं कि भारतीयों के साथ साथ विदेशी भी मारे जाएं, इसीलिए होटल ताज पर हमला किया गया था। दिल्ली सुरक्षा इंतजामात को लेकर वैसे भी संतुष्ट नहीं है। भले कोई बड़ी वारदात न हो लेकिन आतंककारी माहौल बिगाडऩे का प्रयास नहीं करेंगे यह मानने वाली बात नहीं है।
तीसरी बात, पेंटागन से खबर आई है कि चीन ने भारत की सीमा पर परमाणु मिसाइल तैनात कर दी है। हालांकि चीन ने इसका खंडन किया और बकवास करार दिया है लेकिन फिर भी चौकन्ना तो रहना ही होगा। यह सही है कि चीन ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा, जिससे उसे कोई परेशानी हो, लेकिन वह भारत पर अतिरिक्त दबाव बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। वह सीमा तक अपने सड़क मार्ग को दुरुस्त कर रहा है। यह सही है कि हाल-फिलहाल इस मामले में कोई संकट नहीं आने वाला लेकिन भविष्य किसने देखा है? चीन जिस स्तर की तैयारियां कर रहा है वह निश्चित रूप से चौंकाने वाली और सतर्क करने वाली है। अगर चीन के इरादे नेक हैं तब तो कोई बात नहीं लेकिन अगर जरा भी शंका हुई तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। पूरा देश राष्ट्रमंडल खेल की तैयारियों में लगा रहे और चीन सिर पर आकर बैठ जाए तो क्या कहिएगा।
खतरे और भी हैं, जो बिना बताए आ सकते हैं। सतर्क सबसे रहने की जरूरत है। मैं एक बार फिर कह दूं कि मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो। मंदिर-मस्जिद मामले का कोई ऐसा हल निकले जो दोनों पक्ष मान लें और देश में सौहार्द का माहौल बना रहे। राष्ट्रमंडल खेलों में अभी तक जो हुआ सो हुआ अब सब सही हो जाए। आतंककारी अपने झंझावातों में फंसे रहे और इधर न आ पाएं। आएं भी तो उनका कोई मंसूबा पूरा न होने दिया जाए, उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया जाए। चीन अपने देश में जो कुछ भी कर रहा है वह अपने विकास के लिए कर रहा हो, उसका इरादा भारत को नुकसान पहुंचाने का न हो। चाहता तो यही हूं, लेकिन कौन जाने कब क्या हो जाए।
जाने क्या होगा रामा रे...

गुरुवार, अगस्त 19, 2010

हंगाम है क्यों बरपा...



वीरेंद्र सहवाग। एक विस्फोटक बल्लेबाज। दुनिय भर के गेंदबाज उनके नाम से कांप जाते हैं। बहुत से लोग उनमें सचिन का अक्स देखते हैं। अब तक भारत के लिए 225 एक दिनी मैच खेल चुके हैं। सात हजार से अधिक रन बना चुके हैं। उन्होंने 12 शतक और 36 अद्र्धशतक लगाए हैं। टेस्ट क्रिकेट में तो उनका रिकॉड और भी अच्छा है। माना जाता है कि जब सहवाग बल्लेबाजी करते हैं तो भारतीय टीम के लिए खेलते हैं। उन्हें शतक और अद्र्धशतक की चिंता नहीं रहती। जब वह अपनी रौ में हों तो तभी आउट होते हैं जब वे खुद कोई गलती करें। शतक और अद्र्धशतक क्या दोहरे शतक के नजदीक होने पर भी वे दबाव में नहीं आते और तब भी छक्का लगा सकते हैं। ऐसा यूं ही नहीं कहा जाता। कई बार वे ऐसा करके दिखा भी चुके हैं।
लेकिन, यह क्या। सारी बातें धरी की धरी रह गईं। सहवाग शतक नहीं बना पाए तो यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया। क्यों भई? क्या सहवाग जैसा बल्लेबाज शतक के लिए इतना परेशान हो सकता है? मेरा व्यक्तिगत मानना है कि सहवाग जब चाहते हैं शतक लगा सकते हैं। दिक्कत ये है कि वे शतक की परवाह नहीं करते। एक दिनी और ट्वेंटी-20 क्रिकेट में बहुत कम देखने को मिलता है कि उन्हेंने जितने रन बनाए हो उससे ज्यादा गेंद खेली हों। लेकिन अब मेरी राय कुछ हद तक बदलने सी लगी है।
सचिन तेंदुलकर निर्विवाद रूप से देश के ही नहीं वरन् दुनिया के महान बल्लेबाज हैं। लेकिन उन पर अक्सर यह आरोप लगता रहता है कि वह टीम के लिए नहीं, रिकॉर्ड के लिए खेलते हैं। यह बात अलग है कि सचिन अब रिकॉर्ड के मोहताज नहीं बल्कि रिकॉर्ड उनके मोहताज हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि देसी या विदेशी किसी ने भी कभी भी सहवाग पर मजाक में ही सही यह आरोप लगाया हो।
मजे की बात तो यह है कि मैच के बाद सहवाग ने कहा कि श्रीलंकाई गेंदबाज ने हार से डर से उन्हें नो बॉल डाल दी। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इतने बड़े और विस्फोटक बल्लेबाज से इस तरह के बयान की उम्मीद कैसे की जा सकती है। क्या रंदीव के नो बाल डालने से श्रीलंका की हार टल गई। क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है कि लेकिन उस समय मैच की जो स्थिति थी, श्रीलंका के जीतने की संभावना कहीं से भी नहीं थी। फिर हार के डर से रंदीव नो बॉल कैसे फेंक सकते हैं।
सहवाग अभी लम्बे समय तक क्रिकेट खेलेंगे और शतक ही नहीं दोहरा शतक तक बनाने के अनेक मौके उनके पास आएंगे। उन्हें उस ओर ध्यान देना चाहिए। और अच्छा प्रदर्शन कर खुद के रिकॉर्ड की फिक्र किए बगैर भारत को जिताने पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि देश के लिए खेलने का मौका हर किसी को नहीं मिलता। उन्हें मौका मिला है तो अपने रिकॉड के लिए इतनी तुच्छ बात नहीं करनी चाहिए।
अब एक और महत्वपूर्ण बात, जो इस पूरे लेख को अपूर्ण करती है। मेरे यह सब लिखने का मतलब यह कतई नहीं निकला जाना चाहिए कि श्रीलंका ने जो किया वह ठीक किया। क्रिकेट को शायद इसलिए इतनी प्रसिद्धि मिली कि उसे भद्र जनों का खेल कहा जाता है। और श्रीलंका ने जो हरकत की वह निश्चित रूप से भद्र जनों वाली नहीं है। खेल को खेल की भावना से खेला जाना चाहिए। और यह बात श्रीलंका को ही नहीं भारत को भी ध्यान में रखना चाहिए। मेरा कहना और मानना सिर्फ इतना है कि पूरे मामले को इतना तूल नहीं दिया जाना चाहिए।
पूरे मामले में रंदीव को सजा मिल चुकी है उन्हें एक मैच के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। दिलशान का भी इसमें हाथ पाया गया इसलिए उन पर भी बैन लगाया गया है। संगकारा को भी चेतावनी दी गई है। यह सही है कि इन सब के बाद भी सहवाग की सेंचुरी वापस नहीं आ सकती पर सहवाग अगर अच्छा खेलेंगे तो फिर से शतक लगा सकते हैं।
अंत में बस इतना ही कहूंगा खेल का खेल ही रहने दो कोई नाम न दो....

शनिवार, अगस्त 07, 2010

सीरीज सार : भारत बनाम श्रीलंका




भारत ने श्रीलंका के साथ खेली जा रही तीन टेस्ट मैचों की सीरीज ड्रा कराने में कामयाबी हासिल कर ली है। बड़ी बात यह कि इस जीत के साथ ही भारत की नम्बर एक की पदवी भी बरकरार रही। अब सीरीज समाप्त हो गई है लिहाजा जरूरी है कि इस दौरान क्या क्या हुआ इस पर विचार किया जाए।
पहली बात तो यह हुई कि धौनी की किस्मत एक बार फिर उनके साथ रही। धौनी ने अब तक अपनी कप्तानी में कोई भी सीरीज नहीं गंवाई है। इस बार भी यह रिकॉर्ड कायम रहा। मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि धौनी किस्मत के धनी हैं, इस बार भी ऐसा ही कुछ हुआ। दूसरी बड़ी बात टेस्ट क्रिकेट से मुरलीधरन जैसे दिग्गज का जाना रहा। उन्होंने दूसरे टेस्ट के बाद संन्यास ले लिया। इतने बड़े और खुशमिजाज स्पिनर की ऐसी की खूबसूरत विदाई होनी थी जैसी की हुई है। श्रीलंकाई टीम पर उनका जाना कितना असर करेगा यह बाद में पता चलेगा। फिलहाल क्रिकेट के चाहने वालों को उनकी कमी खलती रहेगी।
अब बात भारतीय बल्लेबाजों के प्रदर्शन की। इसमें मैं सचिन का प्रदर्शन शामिल नहीं करूंगा, क्योंकि वह निर्विवाद रूप से महान बल्लेबाज हैं और उन पर मैं कोई टिप्पणी करके खतरा मोल लेना नहीं चाहता। बात सुरेश रैना से करते हैं। उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया। उन्होंने पहले की टेस्ट में शतक लगाया और इसके साथ ही वे मोहम्मद अजहरुद्दीन, सौरभ गांगुली और वीरेंद्र सहवाग जैसे दिग्गजों के क्लब में शामिल हो गए। वे बाएं हाथ के बल्लेबाज हैं। उनमें कहीं न कहीं सौरभ गांगुली की झलक मिलती है। सौरभ जैसा जुझारूपन उनमें है कि नहीं यह वक्त और जरूरत के मुताबिक ही पता चलेगा, लेकिन फिलवक्त उन्होंने उज्ज्वल भविष्य की आशा तो जगा ही दी है। अब बात वीवीएस लक्ष्मण की। एकदिनी क्रिकेट में भले वे असफल करार दे दिए गए हों पर टेस्ट क्रिकट में उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि उनका कोई जवाब नहीं। अक्सर लोग सचिन और उनके प्रदर्शन की बात करते हैं पर लक्ष्मण को बिसरा दिया जाता है। लक्ष्मण की उम्र 37 के आसपास है और उनकी कलाइयों का इस्तेमाल अब भी देखते ही बनता है। तीसरे टेस्ट के चौथे दिन भारत को जीत के लिए 257 रन का लक्ष्य मिला। भारत ने दिन का खेल खत्म होने तक 53 रन पर तीन अहम विकेट गवां दिए तो लगा कि भारत यह मैच बचा पाएगा कि नहीं, लेकिन ऐसे समय में अक्सर संकटमोचन बन कर आने वाले लक्ष्मण ने फिर अपनी अहम भूमिका निभाई और भारत को जीत के दरवाजे तक पहुंचाया। लक्ष्मण के साथ दिक्कत यह है कि वे अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी लाइम लाइट में नहीं आ पाते। शायद उन्हें इसका हुनर भी नहीं मालूम। वह अब तक सचिन, सौरभ और यहां तक की धौनी आदि की तरह युवाओं के लिए आइडियल नहीं बन पाए। जबकि यह भी सही है कि लक्ष्मण की बैटिंग स्टाइल से युवाओं को बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। टीम के भीतर जितना मान सम्मान लक्ष्मण को मिलता है उतना बाहर नहीं मिला पाता। खैर, यह युवाओं का मामला है वे किसे माने और किसे नहीं।
अब बात राहुल द्रविण की। दीवार के उपनाम से पहचाने जाने वाले इस बल्लेबाज ने इस बार निराश किया। मुझे पता है कुछ ही दिन में उनको लेकर तरह-तरह की अटकलें लगनी शुरू हो जाएंगी। कहा जाएगा कि दीवार ढह गई है, दीवार टूटने लगी है। पूरी सीरीज की बात करें तो राहुल तीन टेस्ट मैचों की छह पारियों में मिलाकर भी शतक नहीं लगा पाए। वे 19 की मामूली सी औसत से कुल 95 रन ही बना सके। इससे पहले दक्षिण अफ्रीका के दौरे में भी राहुल कुछ खास नहीं कर पाए। पहले राहुल को आउट करने के लिए गेंदबाजों में शर्त लगती थी लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। अब कुछ रन बनाने के बाद उन्हें भी साधारण तरीके से आउट कर दिया जाता है। ऐसे समय में जबकि बहुत से युवा अच्छा प्रदर्शन कर टीम में शामिल होने की दावेदारी पेश कर रहे हैं बहुत संभव है कि टेस्ट क्रिकेट से उनकी जल्द विदाई कर दी जाए। हालांकि मैं खुद नहीं चाहता कि ऐसा हो। भारत को अभी उनकी जरूरत है। राहुल की सौरभ गांगुली की तरह भले जुझारूपन की मिसाल नहीं दी जाती हो पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि वे भी बहुत जुझारू हैं और आने वाले दिनों में कोई शानदार पारी खेलकर सबका मुंह बंद कर दें तो कोई बड़ी बात नहीं। याद करिए वह दौर जब भारत के पास कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं था जो अच्छी कीपिंग के साथ-साथ टीम के लिए रन भी जोड़ सके। ऐसे में राहुल ने यह भूमिका बखूबी निभाई। राहुल टीम में बाहर जाते हैं या वे अच्छा प्रदर्शन कर फिर टीम का अहम हिस्सा बन जाएंगे यह समय पर ही पता चलेगा।
भारत की बात यहीं तक अब बात श्रीलंका की। श्रीलंका में सिर्फ एक ही खिलाड़ी बात करूंगा और वह है सूरज रांदिव। वह ऑफ स्पिन गेंदबाजी करते हैं और युवा हैं। दिग्गज मुरली के बाद श्रीलंका को एक ऐसे स्पिन की जरूरत है, जिससे विरोधी टीम के बल्लेबाज खौफ खाएं। हालांकि अजंता मेंडिस अच्छी गेंदबाजी कर रहे हैं पर बल्लेबाजों में उनका खौफ नहीं दिखता। रांदिव ने अभी दो ही टेस्ट खेले हैं और दूसरे टेस्ट में ही उन्होंने पांच विकेट झटक लिए। खास बात यह कि इसमें सचिन तेंदुलकर का विकेट भी शामिल है। श्रीलंका के लिए जहां यह शुभ संकेत हो सकता है वहीं विरोधी टीमों के लिए खतरे की घंटी। संभव है कि अपने नाम की तरह सूरज सबसे बड़ा सितारा बन जाएं।
भारत को अब श्रीलंका में ही 10 से त्रिकोणीय सीरीज खेलनी है। इसमें तीसरी टीम न्यूजीलैंड की होगी। बहुत से खिलाड़ी भारत वापस लौट आएंगे वहीं कुछ को टीम का हिस्सा बनने श्रीलंका जाना है। तो अब टेस्ट के पांच के दिन के खेल से मुक्ति और अब लीजिए एकदिनी क्रिकेट का मजा।

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सीरीज सार : भारत बनाम श्रीलंका

भारत -श्रीलंका सीरिज़, क्या खोया -क्या पाया -पंकज मिश्र

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