रविवार, मार्च 14, 2010

बचाएं ताल तलैया और पोखर को


दुर्गेश कुमार मिश्रा

आफिस में बैठे खबरों की एडिंग कर रहा था उसी क्रम में अंबाला के किसी गांव की खबर हमारे सामने एडिट के लिए आयी, जिसमे लिखा था महिलाएं पीने के पानी के लिए दूसरे गांव जाती हैं, कारण गांव में लगा सरकारी नलकूप एक साल से खाराब पडा है। समझ में नहीं आता कि लोगों को हो क्या गया है। लगते।लगते तो लगा होगा और बनते.बनते ही तो बनेगा। इसमें घबराने की बात नहीं है। गांव वासियों थोडा धीरज धारो, सरकारी काम है, हो जाएगा। इससे अच्छे थे हमारे दादा, पडदादा के दिन। जब गांव में न नलकूप थे और न ही बिजली। उनका इन सब चीजों से कोइ सरोकार भी नहीं था। होता भी कैसे। उनके जमाने में तो ताल तलैया और कुआं जो हुआ करते थे। जहां गांव की औरतें पानी भरने जाती थीं ओ भी एक दो नहीं पूरे झूंड की झूड। उन्हें तो थकान भी नहीं आती थी। बल्कि उसी में वे अपना मनोरंजन भी कर लेती थीं। उस समय पनघट पर जातीं पनिहारिनों के पाजेब से उठती छन.छन की आवाज फिजा में एक अलग तरह की संगीत पैदा करती थी। यदी इस झूंड में साल दो साल की दुल्हन शामिल हो तो क्या कहना। औरतें एक दूसरे से चुटकी लेती मजाक करती पानी से भरा एक घडा सिर पर तो दूसरा बगल में दबाए खिलखिलाती हुइ अपने घर को आतीं थीं। इसके अलावा और भी उनके जिम्मे बहुत सारे काम होते थे। ना किसी से कोइ शिकवा ना शिकायत। और एक ये आज का समाज है। ना गांव में कुएं दिख रहे हैं और ना ही ताल तलैया और पोखर। और ना तो पनिहारिनों का वह झूडं जो भाटके हुए बटोही को रास्ता बता सके। आखिर क्यों हम पुराने संसाधानों से मुंह मोड रहे हैं। एक न एक दिन हमें दुबारा उन्हीं संसाधनों की तरफ मुंह करना होगा, जिनसे हम आज मुंह मोड रहे हैं। ठीक उसी तरह जैसे हलवायी की दुकान पर इंतजार करता है किसी ग्रांहक का कि कोइ उसे भी खरिदे, लेकिन रोज आ रही तरह. तरह की मिठाइयो की भीड में दुबका बैठा रहता है। परंतु जब कोई खास मौका आता है तो खोत शरू हो जाती है उसी लड्डू की जो हलवाई की दुकान पर अपने को उपेक्षित महसूस करता है। तो आइए, हम बचाएं ताल, तलैया, पोखर और कुओं के अस्तीत्व को। ताकि, पानी के लिए हमें भटकना न पडे।
लेखक पत्रकार हैं और इस समय हिन्दी दैनिक आज समाज अम्बाला में कार्यरत हैं।

बुधवार, मार्च 10, 2010

सूरत तो बदलनी ही चाहिए

आखिर वही हुआ, जिसकी सबको उम्मीद थी। जो सभी चाहते थे और सबसे बडी बात जो होना चाहिए था। मिल ही गया महिलाओं को आरक्षण। हालांकि अभी तो पहला और नन्हा सा कदम है। रास्ता लम्बा है। लेकिन हर सफर की शुरूआत पहले ही कदम से होती है। उम्मीद है कदम कदम यह अधिनियम भी अपनी मंजिल पा ही लेगा। संभव है इससे महिलाओं की हालत में सुधार आए। उनका जीवन खुशहाल बन जाए।
आरक्षण के विरोधियों ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोडी। उनका बस चलता तो ये दिन नहीं आता। हालांकि इसको गलत कहना भी अपने आप में गलत ही होगा। विरोधी आरक्षण के इस प्रारूप में परिवर्तन की मांग कर रहे थे जो कहीं से भी गलत नहीं था। उनकी अपनी सोच थी।
बहरहाल अधिनियम ने पहली बाधा पार कर ली है। अब सवाल यह है कि क्या इससे सि्थति में कोई परिवर्तन आएगा। महिला दिवस पर कई राष्टीय अखबारों ने कई ताकतवर महिलाओं के बारे में छापा। अच्छा है। आजादी के बाद महिलओं की सि्थति में काफी बदलाव आया है इसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन यह सिक्के का सिर्फ एक ही पहलू है। भले ही महिला सशकि्तकरण जमकर हुआ हो लेकिन हालात उस तरह नहीं बदले जैसे बदलने चाहिए थे। महिला उत्पीडन रोकने के लिए दहेज निषेध कानून बनाया गया लेकिन उसका कितना सही उपयोग हो रहा है और कितना गलत सब जानते हैं। जो इसका सही उपयोग करते हैं वह भी और जो गलत उपयोग करते हैं वह भी। सबको शिक्षा का अधिकार लाया गया लेकिन यह जानकर हैरत होती है कि इस सब के बाद भी 39 फीसदी महिलाएं प्राथमिक स्कूलों का मुंह तक नहीं देख पातीं। माता पिता उन्हें स्कूल नहीं भेजते। क्यों क्योंकि अगर वे स्कूल जाएंगी तो घर का काम कौन करेगा। महिलाओं को अभी भी भोजन तब करतीं हैं जब घर के पुरूष भर पेट भोजन कर लेते है। अब कैसे सुधरेगा महिलओं का स्वास्थ्य और कैसे मिलेगी उन्हें शिक्षा।
गांवों में अभी भी जहां कहीं भी महिला प्रधान हैं वहां काम कौन करता है वह भी सब जानते हैं। यही नहीं जब राबडी देवी बिहार की मुख्यमंत्री थीं तो असली मुख्यमंत्री कौन था। आरक्षण मिले अच्छी बात है लेकिन सही मायने में। तभी आरक्षण के मायने हैं नहीं तो कौन जाने क्या होगा।

रविवार, मार्च 07, 2010

एक कदम आगे तो तीन कदम पीछे

अगर कोई व्यकि्त एक कदम आगे चले और उसके तुरत बाद तीन कदम पीछे तो वह कहां तक पहुंच पाएगा। यह कोई मुशि्कल सवाल नहीं। हालांकि कहावत एक कदम आगे दो कदम पीछे की है। लेकिन अफसोस कि उसमें संशोधन करना पड रहा है।
कोई अगर अपने लक्ष्य की ओर बढ रहा हो तो वह एक कदम आगे बढे और दो कदम पीछे। साफ है कि वह लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता। लेकिन अगर एक कदम आगे बढे और तीन कदम पीछे चले तो वह लक्ष्य तक तो नहीं ही पहुंचेगा साथ ही लक्ष्य से दूर और होता जाएगा। यही हाल भारतीय हाकी का है। यह तो सब जानते हैं कि वह लक्ष्य की ओर नहीं बढ रही पर सचाई यह है कि वह लक्ष्य दूर होती जा रही है। अब वही आभा वही चमक वही शान कब लौटेगी। कौन जाने।
विश्व कप हाकी के पहले मैच में पाकिस्तान के खिलाफ जैसा प्रदर्शन टीम ने किया अगले ही मैच में वही जज्बा और जुनून न जाने कहां काफूर हो गया। जो टीम एक मैच में सभी को चक दे कहने के लिए मजबूर करती है वही अगले मैच में बिखर कर रह जाती है।
इस विश्वकप की खास बात यह रही कि इस बार इसकी घर वापसी हुई थी। इसलिए यह एक मौका था जिसका लाभ उठाया जा सकता था। लगभग छह दशक तक जिस टीम ने अपना परचम लहराए रखा वह अब न जाने कहां खो गई है। शायद यह भारत में ही हो सकता है। हाकी तो हाकी कभी कभी ऐसा ही होता आया है।
एक समय ऐसा भी था जब जगह जगह बच्चे हाकी लिए फिरते थे। धीरे धीरे इसकी जगह गेंद और बल्ले ने ले ली। अब कोई भी बच्चा मेजर ध्यानचंद नहीं बनना चाहता। अब वह गावस्कर, कपिल और सचिन बनने के ख्वाब देखता है। जब टीम ने पहले मैच में पाकिस्तान को हराया तो टीम के सभी सदस्यों को एक एक लाख रुपये देने की घोषणा की। लेकिन अगले ही मैच में भारत उसी तरह खेलते हुए दिखा जैसे खेल पहले मैच में पाकिस्तान खेल रही थी।
बार बार कहा जाता है कि हाकी में पैसा नहीं है। जब टीम अच्छा खेल दिखाती है तो पैसे मिलते हैं। पैसे मिलते हैं तो प्रायोजक मिलते हैं। प्रायोजकों से और भी पैसे मिलते हैं और जब खिलाडियों को खूब पैसे मिलते हैं तो उनका मनोबल बढता है वे अच्छा खेल दिखाने के लिए और प्रयास करते हैं। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। सभी एक दूसरे के पूरक हैं। अब जब टीम जीतेगी ही नहीं तो भला उस पर कौन पैसा लगाएगा। अक्सर लोग कहते हैं कि क्रिकेट में बहुत पैसा है। सवाल यह है कि क्यों पैसा है। इसलिए क्योंकि टीम जीतती है। अगर टीम जीतना बंद कर दे तो उसका भी कोई नामलेवा नहीं रहेगा। याद करिये पिछला विश्वकप। टीम पहल ही राउंड में हार गई थी तो कैसे सारे प्रायोजकों ने उनसे अपना हाथ खींच लिया था। टीम ने फिर जीतना शुरू किया तो फिर उन्हें हाथों हाथ लिया गया। फिर पैसे की बरसात हो गई।
विषय से न भटकते हुए बात फिर हाकी की। कहने के लिए कहा जा सकता है कि पहले मैच में शिवेंद्र ने बेहतरीन प्रदर्शन किया जिसके परिणामस्वरूप टीम को जीत मिली। अच्छी बात है। शिवेंद्र टीम के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। वे सौ से अधिक मैच खेल चुके हैं लेकिन 11 खिलाडियों के खेल में एक खिलाडी पर इतनी निर्भरता। एक अहम सवाल। कभी भारतीय क्रिकेट भी कुछ इसी तरह सचिन पर निर्भर थी लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। सचिन होते हैं तब तो टीम अच्छा खेलती ही है। नहीं होते तो भी कोई खास प्रभाव नहीं पडता। कहना न होगा कि कभी कभी सचिन की जगह जिसे मौका दिया जाता है वह उनसे अच्छा खेल दिखा जाता है।
कुल मिलाकर कहने का मतलब यही है कि हाकी टीम के दिन तभी बहुरेंगे जब सारे खिलाडी खेल दिखाएंगे। वरना . . .

रविवार, फ़रवरी 28, 2010

उदभावना के पाठकों के लिए खास

उदभावना के सभी पाठकों को मेरी ओर से होली की हार्दिक शुभकामनाएं। आप भी यहां टिप्पणी कर मुझे बधाई दे सकते हैं। इस बार की होली मैं चंडीगढ में मना रहा हूं। पिछले साल जलंधर में था। होली पर एक आलेख लिखने का मन है लेकिन समय के अभाव के कारण फिलहाल ऐसा नहीं कर पा रहा हूं। दरअसल हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ में कुछ विवाद के कारण काम कुछ ज्यादा है इसलिए व्यस्ता है। लिखना सचिन तेंदुलकर पर भी है लेकिन बात वही। व्यस्तता। जब सचिन पर लिखने का मन हुआ तो रेल और आम बजट की वजह से ऐसा नहीं कर सका।पर इतना जरूर कहूंगा कि जल्द ही ऐसा करूंगा।एक बार फिर होली की बधाई।

शनिवार, फ़रवरी 13, 2010

ढाई आखर प्रेम के

क्या आप क्लाडियस को जानते हैं। शायद नहीं। क्लाडियस रोम के राजा थे। उनका मानना था कि ताकत और परिश्रम के लिए ब्रहमचर्य अति आवश्यक है। उनकी सेना के लडाके कुंआरे थे। लेकिन एक शख्स ने उनसे लोहा लेने की ठानी। वे थे संत वेलेंटाइन। उन्होंने सेना के कई लडाकों की गुपचुप तरीके से शादी करा दी। एक न एक दिन तो भेद खुलना ही था। खुला और उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया।
सवाल यह है कि लोग किसे जानते और मानते हैं। क्लाडिसय को या वेलेंटाइन को। जाहिर तौर पर वेलेंटाइन को। क्यों। शायद इसलिए कि उन्होंने प्रेम और सत्य को जीने की कोशिश की। तो क्या प्रेम और सत्य के अनुयायियों का यही हश्र होता है। लेकिन एक तथ्य और सत्य है कि ऐसे ही लोग इतिहास लिखते हैं। इतिहास ऐसे ही लोगों को अपने में समां जाने की अनुमित देता है। पोप ने पांचवी शताब्दी में उनकी जयंती माननी शुरू की और यह समूची दुनिया की धडकन बन गई।
अब दूसरी बात। कहा जाता है कि लैला खूबसूरत नहीं थी। लेकिन सब जानते हैं कि मजनू ने प्रेम के प्रतिमान स्थापित किये। देह तो उसका जरिया भर बनी। एक सप्ताह पहले ही वेलेंटाइन डे को लेकर उथल पुथल शुरू हो जाती है। अधकचरे किशोरों से लेकर प्रौढ तक को नाईयों के आधुनिक रूप ब्यूटी पार्लरों में भारी भीड देखी जा रही है। सभी अपने चेहरे पर तरह तरह के लेप और रसायन लपेटे हैं। किस लिए। इसलिए ताकि खूबसूरत दिखें। तो क्या खूबसूरती और प्रेम में कोई संबंध है। खूबसूरती प्रेम है या प्रेम खूबसूरत है। क्या कम खूबसूरत को प्रेम का अधिकार नहीं। प्रेम खूबसूरतों की बपौती है।
एक और बात। शुरू से सुनता आ रहा हूं कि प्रेम न बाडी ऊपजै, प्रेम ने हाट बिकाय। लेकिन अब प्रेम पर बाजार हावी होता जा रहा है। प्रेम को प्रदर्शित करने वाली हर वस्तु बाजार में उपलब्ध है। अब सवाल यह है कि क्या प्यार अपनी निजता खोता जा रहा है। जो भाव दिल में उपजने चाहिए उसके लिए किसी बाजारू चीज का सहारा। जो चीज निज नहीं है तो वह सार्वजनिक है और मोहब्बत सार्वजनिक कैसे। बाजार में फूल से लेकर चाकलेट वाले और न जाने किस किस ने प्रेम को प्रदर्शित करने का ठेका ले लिया है। इसके लिए ढेर सारे आफर भी हैं। आओ और प्रेम ले जाओ।
दरअसल प्रेम भारत में ही नहीं समूचे संसार में हमेशा से ही एक अति वैयक्तिक विषय माना जाता रहा है। शायद यही कारण है कि प्रेम की जन्म और मत्यु की तरह अब तक कोई सर्वमान्य व्याख्या नहीं हो सकी। जीवन में ये तीन शब्द हमेशा नये अर्थ और अंदाज में हमारे सामने आते ही रहते हैं। जिसने भी इनसे खिलवाड करने की कोशिश की यकीनी तौर पर सजा भुगतनी पडी। इसके विपरीत जिसने भी इसकी पवित्रता को बनाए रखा उसे इतिहास ने पन्नों में दर्ज होने की अनुमित दी।
कबीर भी कहते हैं कि पोथी पढ पढ जग भया पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम के पढै सो पंडित होय। रविववार को वेलेंटाइन डे है। यानी छुटटी का दिन। यही उम्मीद और आशा है कि कोई अनहोनी नहीं घटेगी और प्यार को प्यार ही रहने दिया जाएगा। कोई इसे कोई नाम देने की कोशिश नहीं करेगा।

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

...ताकि न बने दूसरा अमर सिंह






सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि मैं राजनीति पर नहीं लिखता। इसके कई कारण हैं पर यहां कुछ एक का जिक्र कर दूं ताकि स्पष्ट हो जाए। पहली बात तो ये कि मैं जहां का निवासी हूं यानी उत्तर प्रदेश का वहां का एक बच्चा भी राजनीति और कि्रकेट पर राय दे सकता है। यहां राजनीति और कि्रकेट पर सबका अपना अपना दर्शन होता है। दूसरी बात ये कि देश में इस समय अगर किसी विषय के सबसे ज्यादा विश्लेशक हैं तो राजनीति और कि्रकेट के। मैं खुद को इन सब के सामने अपने आप को बहुत कमतर समझता हूं लिहाजा इस पर कुछ न लिखूं वहीं ठीक होगा।
अमर सिंह पर मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मैं उन्हें राजनेता नहीं नौटंकीबाज मानता हूं। वे नौटंकीबाजों के साथ गलबहियां करते हुए दिखते भी ज्यादा है। अमर सिंह ने नौटंकीबाज के अलावा अगर अमर सिंह कुछ हैं तो व्यापारी हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि किससे नजदीकी होने पर भविष्य में क्या लाभ होगा उसी के मुताबिक योजना बनाते हैं। खास बात जब अमिताभ का मुंम्बई का बंगला प्रतीक्षा नीलाम होने की कगार पर था तब अमर सिंह ने अमिताभ से दोस्ती का हाथ बढाया। अमिताभ मरता क्या न करता वाली हालत में थे। दोस्ती स्वीकार कर ली। अब जीवन भर उनकी डुगडुगी बजाते रहेंगे। कल को हो सकता है अभिषेक या एश्वर्या राय कहीं से चुनाव लडते दिखें। पहले तो वे किसी दल में महासचिव भी थे अब तो ऐसा नहीं रहा तो भला मैं अमर सिंह पर लिखकर राजनीति पर कहां लिख रहा हूं।
खैर अब विषय पर। जैसी कि हेडिंग है कि ताकि फिर कोई अमर सिंह न बने। मेरे कहने का मतलब इतना ही है कि जब आप किसी दल में हो और ठीक ठाक पोजीशन हो तो कभी भी अपनी हद पार नहीं करनी चाहिए। अमर ने सपा के कई दिग्गज नेताओं पर निशाना साधा और उन्हें नेपथ्य में डाल दिया। अमर ने बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खान और राजबब्बर सरीखे नेताओं पर जमकर प्रहार किये और सफल भी रहे। लेकिन इस बीच अमर भूल गए कि अब वे किस पर निशाना साध रहे हैं दरअसल विदवानों के विदवान अमर ने एक गलती कर दी और वह यह कि उन्होंने इस बात गलत निशाना साध लिया। उनका निशाना बने राम गोपाल यादव। यादव से ही जाहिर है वह मुलायम सिंह के रिश्तेदार होंगे। जी हैं भी। यह बात नेताजी मुलायम सिंह यादव को रास नहीं आई और उसी का परिणाम आज सबके सामने है। अमर सपा में दूसरे नम्बर पर पहुंच गए थे। हकीकत में तो कभी कभी वे नम्बर एक भी दिखते थे। दल के मालिक भले मुलायम हों पर अमर जो चाहते थे करवा लेते थे। लेकिन जरा सी भूल उन्हें भारी पड रही है। अमर सिंह को पता होना चाहिए कि बाप का उत्तराधिकारी बेटा ही बनता है। किसी भी क्षेत्रीय दल को देख लीजिए उसका मुखिया या तो संस्थापक होगा या फिर संस्थापक का बेटा।
बहुत छोटी पोस्ट में कहने का मतलब यही है कि अगर आप किसी दल में ठीक ठाक पोजीशन में हैं तो चुपचाप अपना काम करते रहें। कभी भी दल का मालिक बनने की कोशिश न करें। नहीं तो दूसरा अमर सिंह बनते देर नहीं लगेगी। इसीलिए कहता हूं ताकि न बने दूसरा अमर सिंह।

मंगलवार, फ़रवरी 02, 2010

यह रहमान का सर्वश्रेष्ठ है क्या


बात उन दिनों की है जब मैं कक्षा आठ में पढता था। एक गाना आया था मुक्काला, मुकाबला ओ लैला...ण क्या था इन गाने में नहीं जानता। सच कहूं तो तब तक संगीत क्या होता है इस बारे में भी कुछ नहीं जानता था। पता तो ये भी नहीं था कि इसका संगीत किसने दिया है, पर गाने को सुनकर झूम उठता था।
उन दिनों घर में डेक थी। कुछ कैसेट थे। पुरानी फिल्मों के। नया कैसेट उस समय पचीस से तीस रुपये तक आता था। घर से पैसे मिलते नहीं थे। सो हमसे है मुकाबला का नया कैसेट ले पाना कठिन था। उन दिनों कैसेट में डबिंग का खूब चलन था। किसी पुराने कैसेट में नये गाने डब करा लीजिए और जी भर के सुनिये। जिन गानों को खतम कराना है उनका चुनाव भी कठिन ही होता था। लेकिन फिर भी अब मुकाबला सुनना है तो किसी गाने को तो कुरबानी देनी ही पडेगी। एक गाने का चयन किया और उसकी जगह मुकाबला डब करावा लिया। दुकान वाले ने मुकाबला तो डब किया ही साथ ही उर्वशी उर्वशी करने एक और गाना भर दिया। घर लेकर आया तो दोनों गाने सुने। अब यह तय कर पाना दुश्कर हो गया कि जो गाना मैनें अपने मन से डब कराया है वह ज्यादा अच्छा है या फिर जो दुकान वाले ने खुद कर दिया वह। दोनों गाने इतने सुने की कैसेट की रील खराब हो गई पर उन गानों को सुनकर दिल नहीं भरा। लगातार वही गाने गुनगुनाने पर कई बार घर में डांट भी खानी पडी पर उसकी परवाह किसे थी। गाना अच्छा है तो गुनगुनाओ बस।
एक और वाकया। लखनऊ में था। इंटर की कोचिंग के लिए चारबाग के पानदरीबा में जाया करता था। उन दिनों सत्र समाप्त होने पर स्लेम बुक भरवाने का बडा चलन था। कई की स्लेम बुक मैने भरी तो मुझे भी लगा कि मैं भी बिछड रहे साथियों की कोई निशानी अपने पास रख लूं। तो साहब मैनें भी स्लेम बुक भरवानी शुरू कर दी। उसमें एक कालम होता था आपका पसंदीदा गाना। यकीन मानिये जितने लोगों ने उसे भरा उसमें करीब अस्सी फीसदी ने उस कालम में इश्क बिना क्या जीना यारों, इश्क बिना क्या मरना भरा था। उस समय तक संगीत के बारे में कुछ कुछ जानकारी होने लगी थी और ये जानता था कि इस गाने को संगीत से किसने संवारा है। मैंने भी ताल फिल्म का कैसेट लेकर सुनना शुरू किया तो फिर एक समस्या। यह तय करना कठिन हो गया कि कौन सा गाना ज्यादा अच्छा है। इश्क बिना, नहीं सामने, कहीं आग लगे, ताल से ताल या फिर कोई और।
लखनऊ में ही था और दोस्तों को एआर रहमान के प्रति मेरी दीवानगी का अहसास हो चुका था। एक दिन बातों की बातों में एक दोस्त ने पूछ लिया कि अब तक रहमान ने जितनी फिल्मों में संगीत दिया है उनमें से सबसे अच्छा संगीत कौन सी फिल्म का है। अब मेरे जेहन में उन समय तक कि कई फिल्मों के गाने कौंधने लगे। रोजा, बाम्बे, रंगीला, हिन्दुस्तानी, तक्षक, वन टू का फोर, जुबैदा, साथिया, दिलसे, दौड, कभी न कभी, जीन्स, डोली सजा के रखना, पुकार, नायक, मीनाक्षी और भी न जाने कौन कौन सी। उस समय बात को टाल गया। कुछ दिन बाद फिर वही सवाल उठाया गया तो मैं कोई जवाब नहीं दे सका। जवाब इसलिए नहीं दे सका क्योंकि मेरे लिए यह तय कर पाना मुशिकल ही नहीं बलि्क असंभव सा है कि रहमान का कौन सा गाना ज्यादा अच्छा है और कौन सा कम।
रहमान को जब पिछले साल जय हो के लिए आस्कर मिला तो इस बात की खुशी तो हुई की रहमान को आस्कर मिला है पर इससे ज्यादा खुशी इस बात की हुई कि रहमान मेरी पसंद है। आपकी पसंद पर जब सर्वश्रेष्ठ का ठप्पा लग जाता है तो शायद ऐसा ही होता है। कल जब रहमान को उसी गीत जय हो के लिए ग्रेमी अवार्ड मिला तो एक बार फिर यह सोचने पर विवश हुआ कि क्या जय हो रहमान की सर्वश्रेष्ठ रचना है। अब तक रहमान ने जो रचा क्या वह इस लायक नहीं था कि उन्हें इतना सम्मान मिल पाता।
रोजा जानेमन, भारत हमको जान से प्यारा, रंगीला ले, तन्हा तन्हा यहां पर जीना, लटका दिखा दिया हमने, मुकाबला, मोरासाका मोराईया, ताल से ताल,छैंया छैंया, मोहे रंग दे बसंती, कभी न कभी तो आएगा वो, खोया खोया रहता है, कहता है मेरा खुदा, के सरा सरा,भनाभन दौड, राधा कैसे न जले, ओ युवा युवा, तेरे बिन, अजीमो शान शहांशाह, जाने तू या जाने न, कैसे मुझे तुम मिल गए, मसक्कली मटक्कली आदि इत्यादि में कौन ज्याद अच्छा है कौन कम तय कर पाना मेरे लिए अब भी असंभव है और हमेशा रहेगा। दरअसल मैं चाहता भी हूं कि यह असंभव रहे। जब लोग कहते है कि वाह रे रहमान और वार रे उनके चाहने वाले तो जो पुलक रोमांच होता है उसका बयान कर पाना संभव नहीं।

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