
भारत में लोकतंत्र है, कहने को दुनिया सबसे बड़ा लोकतंत्र। यहां सरकार को जनता चुनती है। आम और खास लोग मिलकर यह तय करते हैं कि उन पर कौन राज करे। जिसे जनता चुनती है वही राज करता है। चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष हो इसके लिए चुनाव आयोग न जाने क्या-क्या प्रयास करता है। चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद उसके हाथ पूरी तरह खुल जाते हैं। सब कुछ तत्काल और निष्पक्ष साफ सुथरा। प्रयास यही कि सब कुछ पाक साफ रहे। कहीं कोई शक की गुंजाइश न हो और जल्दी भी हो जाए इसी बात को ध्यान में रखते हुए चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (इवीएम) का आगमन हुआ। लेकिन, अब पता चल रहा है कि वही इवीएम देश के लोकतंत्र में छेद कर रही है।
नब्बे के दशक में बैलेट पेपर से मतदान होता था। एक कागज पर क्षेत्र के प्रत्याशियों के चुनाव चिह्न बने होते थे। जिस प्रत्याशी को आप चुनना चाहते हैं उसके आगे मोहर लगा दीजिए फिर एक खास तरीके से उसे फोल्ड कर वहीं रखे एक डिब्बे में डाल दीजिए। इस प्रकार मैनें भी कई बार मतदान किया है। प्रक्रिया थोड़ी लम्बी है। खैर, इसके बाद जब वोटों की गिनती का काम होता था तो कई दिन तक रहस्य बना रहता था कि कौन सा प्रत्याशी जीत रहा है। यह बात मतदान प्रतिशत पर निर्भर करती थी कि मत गिनने में कितना समय लगेगा। जितना अधिक मतदान उतना ही ज्यादा समय। यानी रहस्य उतना ही गहरा। प्रक्रिया लम्बी, लेकिन कहीं भी शक की गुंजाइश नहीं। सब कुछ शुद्ध पानी की तरह साफ-साफ। समय बदला। लोग बदले तो तकनीक भी बदल गई। समय कम लगे इसलिए आ गई इलेक्टॉनिक वोटिंग मशीन। वोट डालने में भी कम समय। बस बटन दबाओ और काम खत्म। गिनने में भी कम समय। जल्द ही पता पड़ जाता है कि कौन जीत रहा है, सब कुछ जल्दी-जल्दी। पहले लगता था कि यह भी पाक साफ है। २००९ में हुए लोकसभा चुनावों में हारी हुई पार्टियों ने आरोप लगाए कि इवीएम से छेड़छाड़ की जा सकती है, इसकी जांच होनी चाहिए। यानी आप वोट किसी और को डालें और चला किसी और को जाए। इसकी सेटिंग की जा सकती है। तब लगा कि शायद हार की टीस मिटाने के लिए यह सब किया जा रहा है। यानी खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली बात हो रही है। लेकिन अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इस बात पर मोहर लगा दी है कि भारत में जो इलेक्टॉनिक वोटिंग मशीनें प्रयोग में लाई जा रही हैं उनमें छेड़छाड़ की जा सकती है। मिशिगन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जे. एलेक्स और एक छात्र ने दावा किया है कि उन्होंने छेड़छाड़ में सफलता पाई है। प्रो. का कहना है कि उन्होंने होम मेड डिवाइस से इसके परिणाम बदल दिए।
तो क्या यह मान लिया जाए कि भारतीय लोकतंत्र में छेद किया जा रहा है। जोर शोर से शुरू की गई पेपर रहित प्रणाली फेल हो चुकी है। जनता को बेवकूफ बनाया जा रहा है। यानी आप वोट डालें किसी और को और चला किसी और को जाए। तो फिर काहे की जनता जनार्दन आयलैंड, नीदरलैंड और जर्मनी सहित कई देशों ने इन्हीं खामियों के चलते इवीएम का इस्तेमाल बंद कर दिया है। वे निरे बेवकूफ तो नहीं जो यूं तुरत-फुरत में कोई इतना बड़ा फैसला कर लेंगे। तो क्या अब भारत को भी एेसा ही करना चाहिए। खैर, यह तो देश के नीति-नियंता ही तय करेंगे।
खास बात यह है कि इससे पहले हैदराबाद की नेटइंडिया ने भी इसी तरह की बात कही थी। तब चूंकि मामला देसी था इसलिए इतनी तवज्जो इसे नहीं दी गई। हालांकि विपक्षी पार्टियों ने तब भी शोर किया था, लेकिन अमेरिका के वैज्ञानिक जब यही बात कह रहे हैं तब भी सत्ताधारी दल कुछ बोलने को तैयार नहीं। इसका मतलब क्या समझा जाए। सरकार को पिछले लोकसभा चुनावों में मिली अपनी जीत पर शक है या वह मामले को यूं ही टालना चाहती है। जो भी हो अगर अमेरिकी वैज्ञानिकों का निष्कर्ष सही है तो देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए कुछ न कुछ करना ही होगा। नहीं तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को बिखरने से कोई बचा नहीं पाएगा।