शनिवार, मार्च 27, 2010

मेरी प्यारी साइकिल


पिछले दिनों एक खबर आई। यूं तो खबरें आती ही रहती हैं लेकिन उस खबर का जिक्र इसलिए कि मुझे वह कुछ सुखद लगी। हालांकि यह एक दुखद विषय है कि खबर को उतनी तवज्जो नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी। शायद यही कारण है कि उसे खबर को विस्तार देने के लिए मुझे यह लेख लिखना पडा।
खबर थी कि दो सांसदों ने सांसद में साइकिल से आने की अनुमित मांगी है। उनका कहना था कि हम यह तो कहते रहते हैं कि ग्लोबल बार्मिंग हमें जीने नहीं देगी। कुछ करो। इसके लिए नेतागण भाषण तो बहुत देते हैं पर करते हुए नहीं। lवे लोग अपनी ओर से कुछ प्रयास करना चाहते हैं। प्रस्ताव वास्तब में स्वागतयोग्य है। अब यह तो समय ही बताएगा कि उनको इसकी अनुमति मिलती है या नहीं।
दरअसल, पहले सांसद में अन्य स्टैंडों की तरह साइकिल स्टैंड भी था। पर जब सांसद पर हमला हुआ इसके बाद यह कह कर साइकिल स्टैंड हटा दिया गया कि इससे सुरक्षा में कहीं न कहीं छेद होता है। क्योंकि साइकिल की उस तरह कोई खास पहचान नहीं की जा सकती जैसे अन्य वाहनों की की जाती है। बजाए इसके कि साइकिल की कोई खास पहचान बनाई जाए सरकार ने साइकिल के प्रवेश पर ही रोक लगाना बेहतर समझा। मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता लेकिन यह तो समझ समझ की बात है।
खैर अब बात साइकिल की और इसकी लोकप्रियता की। भारत में एक बालक को साइकिल चलाने में कितना आनंद आता है और वह साइकिल चलाने के लिए क्या कुछ नहीं करता बताने की जरूरत नहीं। अब भी जब मां बाप कहते हैं कि इतने परसेंट नम्बर लाने हैं तो बच्चा छूटते ही अच्छे अंक लाने पर साइकिल की ही मांग करता है। हालांकि यह भी सच है कि फैशन परस्ती ने साइकिल को दोयम दरजे का बना दिया है। कम से कम भारत में तो ऐसा ही है। अन्य जगहों की मुझे खास जानकारी नहीं। अपनी जानकारी की बात करूं तो पेरिस की राजधानी फ्रांस को फैशन का गढ माना जाता है। वहां की सरकार ने 2007 में एक योजना शुरू की थी। इसके तहत साइकिलों के करीब 750 केंद्र खोले गए थे। इनकी खास बात यह है कि यहां पर क्रेडिट कार्ड से भी साइकिल किराए पर ली जा सकती है। सभी साइकिल केंद्र इंटरनेट के माध्यम से जुडे हैं ताकि एक केंद्र से यह पता लगाया जा सके कि अन्य केंद्र पर साइकिल की उपलब्धता क्या है। अब बात किराए की। यह केवल नाम मात्र का ही रखा गया है। अगर आपको आधा घंटे के लिए साइकिल चाहिए तो यह मुफ्त होगी। इसके बाद दूसरे आधे धंटे के लिए किराया एक यूरो है। तीसरे आधे घंटे के लिए अगर आपको साइकिल चाहिए तो उसके लिए आपको तीन यूरो खर्चने होंगे। किराया समय के हिसाब से यूं ही बढता जाएगा। दरअसल किराया इसलिए रखा गया है ताकि बिना काम के कोई साइकिल को अपने पास न रखे।
पेरिस में शुरू की गई इस योजना से पशि्चम के नए विचारों की झलक मिलती है। कारों और अन्य वाहनों के कारण प्रदूषणा और जाम की समस्या बढती जा रही है। इससे अन्य दिक्कतों के साथ साथ जीवन की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। इस बात का अहसास पशि्चम को हो गया है। और हमें शायद कहने और बताने की जरूरत नहीं। तेल, बिजली और अन्य ईंधन के प्रयोग से वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढता जा रहा है। इससे धरती गरम हो रही है। इससे हम कहां होगें सोच कर एक भयाभय भविष्य सामने दिखता है।
खैर यह तो हुई विदेश की बात। बात हो रही थी सांसद में साइकिल लाने की। एक समय था जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और अन्य वरिष्ठ नेता साइिल से ही सांसद आते थे। दो सांसदों की इस पहल से हो सकता है कुछ अन्य के मन में भी कुछ परिवर्तन आए। हालांकि एक सुखद पहलू यह है कि लोकसभा अध्यक्ष ने अपनी ओर से हरसंभव प्रयास करने की बात कही है जो कुछ विश्वास बंधाती है।

1 टिप्पणी:

Rajey Sha ने कहा…

वाकई। साईकि‍ल, इंसानी ताकत से चलने वाला अदभुत यंत्र है।

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