मंगलवार, जुलाई 20, 2010

मीडिया को गरियाने का मौका कोई नहीं छोड़ता

हालिया रिलीज फिल्म 'लम्हा' में अनुपम खेर का एक डायलॉग है 'अगर एश्वर्या चांद नहीं देख पातीं तो मीडिया में वह भी खबर बन जाती है पर कश्मीर में न जाने कितनी महिलाएं है, जिन्होंने अपने पति को न जाने कितने दिनों से नहीं देखा है।' डायलॉग को लेकर फिल्म के निर्देशक राहुल ढोलकिया और अनुपम खेर बहुत डरे हुए थे कि कहीं अमिताभ बच्चन नाराज न हो जाएं। लेकिन उनकी खुशी का तब कोई ठिकाना नहीं रहा जब अमिताभ ने इस पर ऐतराज नहीं जताया बल्कि कह दिया कि यह सच्चाई है और एश्वर्या को इसमें एक सेलिब्रिटी के रूप में दिखाया गया है। फिल्म के निर्देशक राहुल कहते हैं कि इसमें एश्वर्या का मजाक नहीं उड़ाया गया है बल्कि आजकल की व्यवस्था पर एक प्रहार किया गया है।
जब इस डायलॉग पर अमिताभ की राय मांगी गई तो उन्होंने इसे स्वीकार करने में तनिक भी देरी नहीं की। उन्होंने कहा कि जो बात कही गई है वह सही है। एक बात जो अमिताभ ने नहीं कही, वह यह कि चुंकि इसमें मीडिया को निशाना बनाया गया है इसलिए कोई प्रश्न ही नहीं था कि अमिताभ इस डायलॉग को फिल्म से हटाने या फिर किसी और प्रकार से रखने के लिए कहते। वो तो चाहते ही हैं कि मीडिया को गाली दी जाए।
कुछ दिन पहले ही अंग्रेजी के एक टीवी चैनल ने एक संगठन का स्ट्रिंग ऑपरेशन किया और उसके मंसूबों का खुलासा कर दिया। संगठन के कार्यकर्ता इतने नाराज हुए कि उन्होंने संबंधित टीवी चैनल के दफ्तर पर हमला बोल दिया और जमकर तोडफ़ोड़ की। बात जब संगठन के बड़े नेताओं तक पहुंची तो उन्होंने कह दिया कार्यकर्ताओं ने जो कुछ भी किया है वह सही है। अगर मीडिया को अभिव्यक्ति की आजादी है तो हमें भी विरोध की आजादी है। विभिन्न टीवी चैनलों पर तोडफ़ोड़ के जो दृश्य दिखाए जा रहे थे उसमें साफ दीख रहा था कि वहां सुरक्षा के लिए मौजूद पुलिसकर्मी मूक दर्शक बने थे। ऐसा लग रहा था जैसे वे खुद चाह रहे हो कि ऐसा ही होता रहे। यानी मीडिया वाले पिटते रहें।
इन सब बातों पर गौर करें तो एक बात साफ है कि कोई व्यक्ति हो या संगठन, मीडिया को गरियाने का मौका कोई भी हाथ से नहीं जाने देता। अमिताभ के मन में तो मीडिया के प्रति इतना क्रोध भरा है कि न चाहते हुए भी वह समय समय पर दिखाई पड़ ही जाता है। बोफोर्स कांड के समय में मीडिया की रिपोर्ट से अमिताभ इतना खफा हुए थे कि काफी समय तक उन्होंने कोई साक्षात्कार ही नहीं दिया। अगर मीडिया के बिना उनका गुजारा हो जाए तो शायद वह आज भी उससे बात न करें। अभी भी अमिताभ जब भी मीडिया से मिलते हैं तो सिर्फ अपने मतलब के लिए। जब उनकी कोई फिल्म रिलीज हो रही होती है तो वह टीवी चैनल के दफ्तर में आकर बैठ जाते जाते हैं, लेकिन जब उनके बेटे की शादी होती है तो देश की पूरी मीडिया पर लाठी तक चलवाने में अमिताभ को हिचक नहीं होती। फिल्म 'पा' में अभिषेक बच्चन के चरित्र में अमिताभ खुद ही नजर आते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि अमिताभ में जैसे कह कह फिल्म बनवाई हो।
एक ऐसा संगठन जो अपने आप को अनुशासित और भारतीय होने का दंभ भरता है उसके प्रवक्ता कहते हैं कि मीडिया को अगर किसी बात की स्वतंत्रता है तो उन्हें भी है। उनकी स्वतंत्रता का मतलब मीडिया पर हमला करने से होता है। उनकी स्वतंत्रता इसमें निहित है कि वह किसी सम्मानित और बड़े मीडिया हाउस के दफ्तर में हमला कर तोडफ़ोड़ करें। आश्चर्य तो तब होता है जब उनके वरिष्ठ भी इस पर आपत्ति नहीं करते और इसे जायज ठहराते हैं। जहां तक पुलिस की भूमिका की बात की जाए तो पुलिस और मीडिया में हमेशा ठनी ही रहती है। पुलिस का अदना सा सिपाही हो या फिर वरिष्ठ अधिकारी, हमेशा इसी फिराक में रहता है कि किस तरह मौका निकाल कर मीडियाकर्मियों को पीटा जाए या कुछ ऐसा किया जाए, जिसे वह हमेशा याद रखें। कस्बे, शहर और जिला स्तर के पत्रकारों को अक्सर इस तरह की दिक्कतों का सामना करना ही पड़ता है। अब राष्ट्रीय स्तर पर भी यह देखने को मिल रहा है। मीडिया पर हमले के बाद सिर्फ टीवी में दिखने और अखबार में छपने के लिए सभी नेताओं ने कह दिया कि यह गलत है और ऐसा नहीं होना चाहिए पर उसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। क्यों? क्योंकि कहीं न कहीं उसे भी लगा कि चलो ठीक ही हुआ। ये मीडिया वाले इसी लायक हैं। अब खुलेआम तो कह नहीं सकते कि ठीक हुआ तो चुप ही रहा जाए ज्यादा बेहतर है।
बात यहीं खत्म नहीं होती। कोई कलाकार हो या खिलाड़ी, जब उसे जरूरत होती है तो अपने हिसाब से मीडिया का इस्तेमाल करता है और जब सब ओर वह चर्चित हो जाता है तो उसी मीडिया को दूध की मक्खी की तरह बाहर निकाल कर फेंक दिया जाता है। जब कभी भी मीडिया पर हमला होता है तो मीडिया अकेला रह जाता है। अब सवाल यह भी उठ सकता है कि मीडिया के खिलाफ लोगों में इतना आक्रोश आखिर क्यों है? क्या वाकई मीडिया रास्ता भटक गया है या फिर भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है और साजिशें इतनी ज्यादा है कि जब मीडिया इनका खुलासा करती है तो वे बर्दाश्त नहीं कर पाते? और कहीं न कहीं मीडिया को पीटने का मौका देखते हैं। एक बात तो साफ है कि भ्रष्टाचार तो बढ़ा है। देश में कितने ही नामी अखबार हैं और सभी में लगभग रोज किसी न किसी भ्रष्टाचार की पोल खोली जाती है, पर फिर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। रोज उसी गति से भ्रष्टाचार होता रहता है। यह तो बात अखबार की है। टीवी में भी किसी ने किसी स्केंडल का पर्दाफाश होता ही है। फिर भी भ्रष्टाचार रुक नहीं रहा। तो क्या मीडिया का जिसके लिए जन्म हुआ, वह बिसरा देना चाहिए और इन्हीं के साथ मिलकर इन्हीं जैसा हो जाना चाहिए। या फिर यूं ही पिटते हुए अपने काम को अंजाम देते रहना चाहिए यह सोचते हुए कि अच्छा काम करोगे तो विरोध तो होगा ही।

यह आलेख कई बेवसाइटों पर भी प्रकाशित हुआ है। यहां उनका यूआरएल दे रहा हूं। चाहें तो वहां जाकर भी पढ़ सकते हैं। अपनी टिप्पणी देकर बात को आगे बढ़ाएंगे तो अच्छा रहेगा।


http://vichar.bhadas4media.com/home-page/37-my-view/346-2010-07-21-06-30-47.html

http://www.aajkikhabar.com/blog/1113472807.html

http://mediamanch.com/Mediamanch/NewSite/Catevar.php?Catevar=8&Nid=2182

http://jansattaexpress.net/news.php?news=2152

http://www.voiceofjournalist.com/topstory.php?headline=headline&val_id=96&type=1

28 टिप्‍पणियां:

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

...प्रभावशाली पोस्ट!!!

Divya ने कहा…

.अभी देखी तो नहीं यह फिल्म , लेकिन यह चर्चा देखकर मनं जरूर बन रहा है। आम आदमी और सेलिब्रिटी में फर्क तो रहता ही है।
.

प्रमोद जोशी ने कहा…

मैं फिल्म के बारे में नहीं जानता, पर मीडिया के बारे में इतना कह सकता हूँ कि जैसे-जैसे उसका विस्तार होगा, उससे उम्मीदें भी बढ़ेंगी। उससे जो शिकायतें हैं, उनकी उपेक्षा भी ठीक नहीं। हाँ, जिन स्वार्थी तत्वों के हितों पर चोट लगती है, वे हमला भी करते हैं। उनका मुकाबला करना चाहिए।

lokendra singh rajput ने कहा…

पंकज जी सबसे पहले आपके सवाल का जवाब। आपने पूछा है कि क्या मीडिया रास्ता भटक गया है? तो उसका अधिकांश लोग उसका उत्तर 'हांÓ में ही देंगे। हां कुछ इसे स्वीकार न करें ऐसे लोग भी हो सकते हैं। अब बात करते हैं अमिताभ या उन खास लोगों की जो मीडिया का इस्तेमाल करते हैं फिर उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंकते हैं और गरियाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। मुझे यह समझ नहीं आया कि बुद्धिजीवियों और चतुर सियारों से भरी मीडिया खुद का इस्तेमाल कैसे हो जाने देता है? रही बात भ्रष्टाचार तो मीडिया भी इसमें आकंठ डूबी है, लेकिन यह कहां छप सकता है और कौन उसका स्टिंग ऑपरेशन कर सकता है? अब उपरोक्त पंक्ति का अनर्थ मत निकालिएगा क्योंकि मैं भ्रष्टाचार की तरफदारी नहीं कर रहा हूं। रामकृष्ण परमहंस के पास एक माता अपने बालक को लेकर आईं और महाराज से निवेदन किया कि इसकी अत्यधिक गुड़ खाने की आदत छुड़वा दीजिए। महाराज ने उन्हें अगली बार आने को कहा। वह फिर आई, महाराज ने फिर उन्हें अगली बार आने को कहा। यह क्रम चार-पांच बार चला। अंत में वे बालक से बोले बेटा अत्यधिक गुड़ खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ऐसा मत किया करो। यह सुनकर मां बोली-महाराज यह तो आप तब ही कह देते इतनी बार परेशान क्यों किया? तब परमहंस जी ने कहा-माता पहले मुझे भी गुड़ खाने की आदत थी। जब वह दोष मुझमे ही था तो बालक को किस मुंह से मना करता। कहने का अर्थ है मीडिया पहले अपना घर तो ठीक करे।
जिस चैनल ने संगठन के तथाकथित कार्यकर्ताओं का स्टिंग क्यों किया और स्टिंग में क्या किया? इस पर खूब सवाल खड़े हो रहे हैं। तमाम पत्रकार इसे टीआरपी का ओछा फंडा बता रहे हैं। स्टिंग में जो दिखाया और जो संवाद रहे उन पर किसी ने गौर नहीं किया। करते भी क्यों? उस स्टिंग से एक ऐसे संगठन का नाम जो जुड़ा था जिस पर कीचड़ उछालने के लिए मीडिया के कुछ लोग हमेशा तैयार रहते हैं। इसके पीछे भी तमाम कारण हैं। स्ंिटग में जो वार्तालाप चला वह स्वयं संदेह बढ़ा रहा है। मीडिया का काम संदेश बढ़ाना नहीं बल्कि संदेह खत्म करना है। रही बात चैनल पर कथित हमले की तो जो कोई इस कृत्य के पीछे है वह दोषी है, चाहे वह चैनल ही स्वयं क्यों न हो या फिर उक्त संगठन। इसकी कड़े शब्दों में आलोचना की जानी चाहिए।
हां चलते-चलते एक बात और। उक्त संगठन ने बहुत पहले पहले ही प्रवक्ता पद समाप्त कर दिया है। अत: जिस कथित प्रवक्ता ने जो भी बयान जारी किया है वह उस संगठन के मत का प्रतिनिधित्व नहीं करता वरन् वह उसकी व्यक्तिगत राह अवश्य हो सकती है।
जब मीडिया किसी को गरियाने का मौका नहीं छोड़ती तो कोई क्यों मीडिया को गरियाने का मौका छोड़े।

बेनामी ने कहा…

Sach kaha apne....jab bhi koi fasta hai to media hee jariya hota hai..aur jo es jariye se fasta hai vo media ko hi gariyata hai....

SAURABH ने कहा…

Sach kaha apne....jab bhi koi fasta hai to media hee jariya hota hai..aur jo es jariye se fasta hai vo media ko hi gariyata hai....

Regards,
Saurabh
YOUTH BRIGADE OF INDIA
http://www.facebook.com/group.php?gid=119040128141215

बेनामी ने कहा…

सवाल उठ रहे हैं.. मीडिया के अच्छे कार्यों का भी उदाहरण है और उसके दोहरे चरित्र का भी.. कई बार सीना तन जाता है और कई बार निगाहें झुक जाती हैं,.. सवाल उठने चाहिए.. ताकि अकबर इलाहाबादी के इस शेर को न दुहराना पड़े कि -
मेरा ईमान क्या पूछती हो मुन्नी,
शिया के साथ शिया सुन्नी के साथ सुन्नी..

Anand Rai ने कहा…

सवाल उठ रहे हैं.. मीडिया के अच्छे कार्यों का भी उदाहरण है और उसके दोहरे चरित्र का भी.. कई बार सीना तन जाता है और कई बार निगाहें झुक जाती हैं,.. सवाल उठने चाहिए.. ताकि अकबर इलाहाबादी के इस शेर को न दुहराना पड़े कि -
मेरा ईमान क्या पूछती हो मुन्नी,
शिया के साथ शिया सुन्नी के साथ सुन्नी..

Devesh ने कहा…

Jinhone bhi ye kiya galat kiya...kisi bhi sangthan ka ye kahna ki unhe puri ajadi hai ye puri tarah se galat hai...ek admi sadak se ja raha tha..uske hath me ek chhdi thi..wo usko charo taraf ghuma raha tha...jisse aas pas ke logo dikkat ho rahi thi...logo ne roka to wah bola mai ek ajad desh ka ajad nagrik hu...aur kuchh bhi kar sakta hu..to kuchh ne use bataya ki wah bhi ajad hai kuchh bhi karne ke liye...kahne ka matlab kisi ki bhi ajadi waha akar khatm ho jati hai jaha se dusro ko dikkat hone lagti hai...isliye media kobhi kuchh kadam soch samjh ke uthane chhaiye...To rahi medi par hamle ki bat...to media desh ki badi takat thi aur hai...sabhi neta media se darte the...lekin ab midea bikau ban chuka hai...jab ek chanal par ek sangthan hamla kar raha hai to dusre chanal madad ke bajay usi sangthan ke pas bhage ja rahe hai...aur kuch hamle ko dikha rahe hai...agar sabhi chanal T.R.P. ki hod me ek dusre ko pitte dekhte rahe..to ek din media ko log manoranjan ke liye dekhenge...agar amitabh bachhan apne swarth ke liye media ko use kar raha hai...to isme media ka hi dosh hai...

Jyoti ने कहा…

post is jus like any debate isme jyada media ke support mein tha..
media ne kuch aisa kahen to apne publicity yah trp ke chakkar apni value kam ki hai..........aaj bhi achhe journalist hain jinme media ki sahi values aur power ke sahi use ka pata hai.........
aise kuch exception chod maximum apne power ka galat fayda jyada utha lete hai...........
ppl hardly uses media, rather media itself get involved into vague and cheap issues, a little anything they get they pronounce as the "BREAKING NEWS"........
media has forgotten the word journalism..it is rather involved into word of mouth funda
jo pehle batayega uski jyada suni jayegi aur sahi mani jayegi.....
chahe woh kuch bhi kyun na ho.

JOURNALISM IS REALLY MISSING

aur jisko publicity chahiye woh usko media ko use karne me jyada dikkat nahin hoti...
very simple........ if media ppl can filter reporting and journalism then i hope media ko har koi pasand karega.

Media should be the mirror of society that must make people see the good and ugly side of everything instead of making money out of it

avadhesh gupta ने कहा…

पंकज जी, आपने मीडिया की दुखती रग पर हाथ रखा है। हालांकि मैंने फिल्म तो नहीं देखी, लेकिन मीडिया के बारे में आपने हकीकत बयां की है। मीडिया रास्ता भटक गया है, ये बहस का विषय है। हालांकि जो कुछ हुआ, वह गलत था। लाख टके का सवाल ये है कि चाहे वह राजनेता, अभिनेता, खिलाड़ी या आम आदमी ही क्यों न हो। मीडिया के प्रति चिढ़ सी हो गई है। कोई खास अच्छी छवि लोगों के सामने मीडिया की नहीं है। दरअसल, वे जान गए हैं कि मीडिया को कैसे इस्तेमाल करना है ? बिल्कुल दूध में गिरी मक्खी की तरह। आखिर ऐसा क्यों ? प्रतिस्पद्र्धा और टीआरपी के चक्कर में कुछ का कुछ परोस रहे हैं? इतने सारे चैनल और अखबारों के लिए खबर नहीं है? सानिया क्या पहनती है वो खबर है, लेकिन देश के हजारों बच्चों के तन पर कपड़े नहीं वो खबर नहीं? लोग सिर्फ सेलिब्रिटी को ही देखना चाहते हैं, इससे दीगर कुछ नहीं? मीडिया पंडितों को समीक्षा करनी होगी। और बुराईयों को दूर हटाकर मीडिया का एक साफ-सुथरा चेहरा लोगों के सामने लाना होगा।
जब कोई पत्रकार किसी ऑफिस में या थाने में खबर के सिलसिले में जाता है, तो सामने वाला भले ही अभिवादन की मुद्रा में दिखे लेकिन अंदर तो यही कहता है, कहां से आ गया है। मैं काम कैसे करूं। अनुभव के आधार पर कह रहा हूं। लेकिन यदि उसी व्यक्ति को आपसे कोई काम होगा तो वही आगे-पीछे फिरेगा, आपको दस बार फोन करेगा। अगर देखा जाए तो मीडिया का शुरू से ही विरोध होता आ रहा है। जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हमारे दिग्गज पत्र निकालते थे, उन्हें दबा दिया जाता था, मारा जाता था, लाइसेंस निरस्त कर दिया जाता था, प्रतियां फाड़ दी जाती थीं और भी न जाने क्या-क्या।
इतिहास गवाह है मीडिया के प्रति गुस्सा उतारने का मौका कोई नहीं छोड़ता। क्या हम अपनी ताकत को भूल गए ? ऐसे लोगों को सबक सिखाना जरूरी हो गया है। सब जानते हैं कि मीडिया चाहे तो एक रात में स्टार बना दे, चाहे तो सड़क पर ले आए। फिर क्यों हम ऐसे लोगों को इतना भाव देते हैं। सेलिब्रिटी हों तो बनी रहें। कितना भी बड़ा नेता हो तो बना रहे। हम जनता के लिए हैं, उसके दुखदर्द में शामिल होकर काम करें। चंद राजनेताओं और सेलिब्रिटी के चक्कर में पड़ जाते हैं। धिक्कार है, हम पर। अगर हम ऐसा करेंगे तो फिर देखिए कभी कोई इस तरह की जुर्रत नहीं करेगा। लेकिन हां, अपनी हद में रहकर। अमिताभ बच्चन की बात करें तो कभी अमिताभ मीडिया के मुरीद हुआ करते थे। लेकिन कुछ तो ऐसा हुआ, जिससे उन्हें मीडिया के प्रति ऐसा रूखा बर्ताव करने पर मजबूर कर दिया। सोचा होगा।

निर्मला कपिला ने कहा…

उमदा पोस्ट । सही कहा अच्छी बात को कोई नही बोलेगा । जहांम बुराई है वहाँ अच्छाइ भी है। बाकी फिल्म देखी नही। धन्यवाद।

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत ही इंटेलेकचुअली लिखा गया ....सुंदर आलेख ...

राजू मिश्र ने कहा…

मीडिया को शिकायतों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सीधी सी बात है कि जिस किसी के भी हितों पर चोट लगेगी, वह भी चोट करेगा अपने तरीके से। आलेख अच्‍छा बन पड़ा है। बधाई।

राजू मिश्र ने कहा…

मीडिया को शिकायतों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सीधी सी बात है कि जिस किसी के भी हितों पर चोट लगेगी, वह भी चोट करेगा अपने तरीके से। आलेख अच्‍छा बन पड़ा है। बधाई।

Pankaj Dwivedi ने कहा…

आपके सवाल में ही जवाब है. ऐश्वर्या का चाँद न देख पाना न्यूज़ है. नहीं ये न्यूज़ नहीं हैं. इसे कहतें हैं नौटंकी. पैसे के लालच में मीडिया जरूर कुछ रास्ता भटकी है और नौटंकी को न्यूज़ के रूप में परोस रही है. कहा जा रहा है जो बिकता है वही चलता है. लेकिन ये बात सच नहीं. उदहारण के तौर पर इंडियन एक्सप्रेस और दा हिन्दू जैसे अखबार सामने हैं जो वो छापते हैं जो उनके हिसाब से बेहतर है. NDTV भी ठीक है.

मीडिया में मार्केट के रूल्स नहीं चलने चाहिए. लोगों को वह पढाना और दिखाना होगा जो उनके लिए बेहतर है. जब हम अपना काम ठीक से करेंगे तब किसी से डरने की जरूरत नहीं होगी और न ही किसी की गाली सुनानी पड़ेगी. इसके बाद अगर कोई डराता या गाली देता है तो हम उसका डटकर विरोध कर सकने की स्तिथि में भी होंगे. लेकिन सबसे पहले हमें तय करना होगा क्या न्यूज़ हैं और क्या नौटंकी?

shashank ने कहा…

dear pankaj baat to tumhari sahi hai. lekin sirf dusron ko kyon dosh diya jaye. media me kaam karne wale sabhi dudh ke dhule to nahe hain. Mana ki aise chad log hi hain, lekin hain to sahe na. abhi bhi waqt hai aise logon ko media se baahar kar credibility banane ka. nahe to DALAL jo apne ko kathit patrakar kahte hain vo media persons per laathi chalwate he rahenge..............

shashank

Parul ने कहा…

behad prabhaavshali lekhan hai..tabhi jung sa mahaul hai ..behasbari jari hai.. :)
badhai ho sir aapko :))

pradeep dubey ने कहा…

प्रभावशाली पोस्ट
hum ney ya film dakhi aur phir aap ka blog accha laga jo hum ney socha aap ney pahley he soch bhe leya aur yaha chipa bhe deya.
accha laga
जब मीडिया किसी को गरियाने का मौका नहीं छोड़ती तो कोई क्यों मीडिया को गरियाने का मौका छोड़े।

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

मीडिया का मतलब बिजनेस और चलाने का मतलब मुनाफा वसूली से जुड़ा है। ये चैप्टर उस न्यू इकॉनमी की देन है, जिसमें न्यूज चैनल के लिये लाइसेंस खरीदने से चौथा खम्भां होने की शुरुआत होती है।

न्यूज चैनल के लिये लाइसेंस का मतलब आपका हाथ-चेहरा । अगला-पिछला सबकुछ सफेद हो । वैचारिक तौर पर सेक्यूलर और लोकतांत्रिक होने की पहचान आपके साथ जुड़ी हो । अपराध या भ्रष्टाचार का तमगा आपकी छाती पर न टंगा हो। जाहिर है यह ऐसी नियमावली है, जिसकी कोई कीमत नहीं लगा सकता और जो लगायेगा वह वसूली भी ऐसी करेगा कि सामने वाले का सबकुछ काला हो, तभी संभव है। तो सरकार के मंत्री से लेकर चढ़ावा लेते बाबूओ की पूरी फौज, एनओसी की मुहर की व्यवस्था आईबी रिपोर्ट से लेकर थाने की रिपोर्ट तक की करा देती है।

-पुण्य प्रसून बाजपयी

उपरोक्त उदगार ज्यों के त्यों मै प्रसून जी के ब्लोग से कट-पेस्ट कर रहा हूँ. इसके बाद अपनी पोस्ट पर पुनर्विचार किजिये.

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

सवाल है कि किसी के पास न्यूज चैनल का लाइसेंस जब इतने चढ़ावे के बाद आ ही जाता है तो वह अपनी मुनाफा वसूली कैसे करेगा । पहला तरीका है लाइसेंस को एक साल के लिये किसी बेहतरीन पार्टी को बेच देना। कीमत एक करोड़ से लेकर कुछ भी । यानी सामने वाला लाइसेंस लेकर बाजार को किस तरह दुह सकता है....यह उसकी काबिलियत पर है । और अगर लाइसेंस के जरुरतमंद की पहुंच-पकड़ राजनीतिक पूंजी से जुड़ी होगी तो लाइसेंस की कीमत पांच करोड़ तक लगती है। न्यूज चैनल के कई लाइसेंस इस तरह खुले बाजार में लगातार घुम रहे हैं। कुछ खरीदे भी गये और चल भी रहे हैं। लेकिन सवाल है इस हालात में न्यूज रुम को भी करोड़ों के वारे न्यारे करने हैं...और चूकि चैनल का प्रोडक्ट खबर है तो खेल को पूंजी में बदलने का खेल यहीं से शुरु होता है। सबसे पहले खबर को कवर करने वाले पत्रकारों को चैनल का मंच देकर वसूली के नियम कायदे बता दिये जाते हैं। उसके भी दो तरीके हैं। खबरों को दिखाने के बदले सीधे पांच से पचास लाख तक का टारगेट सालाना पूरा करना । या फिर राज्यों के ब्यूरो को पचास लाख से लेकर एक करोड़ तक में बेच देना। यह तरीका सीधे खबरों को बिजनेस में फुटकर तौर पर भी बदलना माना जा सकता है।

लेकिन संभ्रात तरीका किसी राजनीतिक दल या किसी राज्य सरकार से सौदेबाजी को मूर्त रुप में ढालना है । यह सौदा चुनाव के वक्त जोर पकड़ता है। जिसमें पांच करोड़ से लेकर पचास करोड़ तक सौदा हो सकता है। राज्यों के चुनाव में यह सौदा राजनीतिक दलों में खूब गूंजता है। पिछले चुनाव में जो पांच राज्यों के चुनाव हुये, उसमें कई चैनलों के वारे न्यारे इसी सौदे से हो गये। चुनाव चाहे लोकतंत्र की पहचान हो लेकिन चुनाव का मतलब लोकतांत्रिक तरीके से पूंजी और मुनाफा वसूली की सौदेबाजी का तंत्र भी है, जो सभी को फलने फूलने का मौका देता है । लेकिन यह तंत्र इतना मजबूत है कि इसके घेरे में समूचा मीडिया घुसने को बेताब रहता है। यानी यहां टीवी या अखबार की लकीर मिट जाती है। लोकतंत्र में चुनाव का मतलब महज यही नहीं है, मायावती टिकटो को बेचती हैं या फिर बीजेपी और कांग्रेस में पहली बार टिकट बेचे गये। असल में चुनाव में खबरों को बेचने का सिलसिला भी शुरु हुआ। इसका मतलब है अखबारों में जो छप रहा है, न्यूज चैनलो में जो दिख रहा है, वह खबरें बिकी हुई हैं। इसके लिये भी रिपोर्टर को टारगेट दिया जाता है। और संस्थान संभ्रात है तो हर सीट पर सीधे चुनाव लड़ने वाले प्रमुख या तीन उम्मीदवार से वसूली कर एडिटोरियल पॉलिसी बना देता है कि खबरो का मिजाज क्या होगा। यह सौदेबाजी प्रति उम्मीदवार अखबार के प्रचार प्रसार और उसकी विश्वसनीयता के आधार पर तय होती है, जो एक लाख से लेकर एक करोड़ तक होती है। मसलन उत्तर प्रदेश के बहुतेरे अखबार इस तैयारी में है कि लोकसभा चुनाव में कम से कम पचास से सौ करोड़ तो बनाये ही जा सकते हैं। बेहद रईस क्षेत्र या वीवीआईपी सीट की सौदेबाजी का आंकलन करना बेवकूफी होती है क्यकि उस सौदेबाजी के इतने हाथ और चेहरे होते हैं कि उसे नंबरो से जोड़कर नहीं आंका जा सकता है। इन परिस्थितियो में खबरों को लिखना सबसे ज्यादा हुनर का काम होता है, क्योंकि खबरों को इस तरह पाठको के सामने परोसना होता है, जिससे वह विज्ञापन भी न लगे और अखबार की विश्वसनीयता भी बरकार रहे। मतलब खबरों के दो चेहरे है मगर मकसद एक है। पहला "किस-सीन" सरीखे प्रोग्राम टीआरपी देंगे और समाज को जो लुभायेगा,उसे बिजनेस और मुनाफे में बदला जा सकता है । दुसरा खबर को ही धंधे में बदल दिया जाये, जिससे मुनाफा वसूली के लिये टीआरपी ना देखनी पडी और न्यूज प्रोडक्ट का जामा भी बरकरार रहे ।
-पुण्य प्रसून बाजपयी

उपरोक्त उदगार ज्यों के त्यों मै प्रसून जी के ब्लोग से कट-पेस्ट कर रहा हूँ. इसके बाद अपनी पोस्ट पर पुनर्विचार किजिये

YOUTH BRIGADE OF INDIA ने कहा…

Please click on below link to join YBI

http://www.facebook.com/group.php?gid=119040128141215

Description:
A group of all youths who really want to join hands with those youths of INDIA who want to change the face of Today's Indian politics...who really care for their country and people.

BINDASS ने कहा…

aap ki bat men dam hai..lage raho bhai

पंकज मिश्रा ने कहा…

सभी अग्रजों और साथियों का बहुत बहुत शुक्रिया, जो उन्होंने इस पोस्ट पर इतना प्यार दिया। बड़े की गर्व के साथ यह कहना चाहता हूं कि यह पोस्ट अब तक की सबसे ज्यादा पसंद की गई पोस्ट साबित हुई है। सबसे ज्यादा कमेंट इस पोस्ट पर मिले हैं। ज्याद कुछ न कहते हुए बस इतना ही कहना चाहूंगा कि हो सके तो आने वाली पोस्ट को और भी ज्यादा प्यार दें। कहीं गलती कर रहा होऊं तो उस ओर भी इंगित करें। एक बार फिर सभी का बहुत बहुत शुक्रिया।

newspostmartem ने कहा…

पंकज जी कहा तो आपने सही है. लेकिन एक बात यह भी हमें स्वीकार करनी ही पड़ेगी की अब हममें भी दोष आ गया है. ईमानदारी से आप यदि देखेंगे तो पाएंगे कि इलेक्ट्रानिक चैनल के 60 फीसदी स्थानीय प्रतिनिधि तो न्यूज सेंस से ही परे होते हैं. उनके लिये घटना दुर्घटना और अस्पताल में आने वाले घायल लोग ही खबर होते है. या फिर वे पंचायत के सरपंचों पर निशाना बनाते है. शेष 30 फीसदी सनसनी के पीछे भागते है. 10 फीसदी ईमानदारी से काम कर रहे है. हालांकि प्रिंट में भी यह कमिया आ रही है लेकिन अभी ज्यादा नहीं है. बहरहाल मेरा आशय पत्रकारों या पत्रकारिता की गंदगी पर नहीं है. फिर भी इस ओर भी ध्यान देना होगा क्योंकि आज विकास परक पत्रकारिता कम होती जा रही है. रही बात आपके मैटर की तो वह शत प्रतिशत सही है. यहां पहली बार आया अच्छा लगा. मैं सतना से हूं. एक मुहिम हमने भी छेड़ी है लेकिन नाम छिपा के.

statesmanil ने कहा…

apaki bat se mai sahamat hun likin apane yah hu nahi bataya ki kis TV channel ne kya bhandabhor kiya aur kis SANGHI GIROH ne hamala kiya? yah batane par hi tasvir saf hogi. nahi to agar maine bhi hamala kiya ho to mai bhi kah sakata hun ki jisane bhi kiya vo galat kiya. qki na ap mera nam batayenge aur na mai apana nam bataunga. yan indian media ki sabase badi kami hai. ek channel ne bataya, ek akhabar ne chaapa, ek sangathan ne hamala kiya. are vo kaun log hai ap qko nahi batate?

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…
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Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

देखिये हमारे देश में मीडिया बहुत को बहुत उंचा स्थान प्राप्त था, इसे लोकतंत्र का एक मजबूत स्तम्भ माना जाता है. पर पिछले ५-१० वर्षों में मीडिया ने ऐसा छिछोरापन दिखाया है की अब ज्यादातर लोग इसे गरियाने लगे हैं. जिधर देखिये उधर मीडिया में (एक्का-दुक्का को छोड़ कर) सभी जगह ग्लेमर, सेक्स की भरमार है. सल्लू मियां जेल गए तो पूरी मीडिया बिरादरी रात-रात भर गला फाड़ के चिल्लाते रहे, ऐसा क्या गज़ब हो गया था सल्लू के साथ?

लगभग सभी चेनलों में परोक्ष रूप से सरकार का बचाव किया जाता रहा है, जनता का ध्यान मुख्य मुद्दे से हटा कर नौटंकी वाली खबरों पे लगाया जाता रहा है... इतनी महंगाई के बावजूद किस मीडिया चेनेल ने सरकार पे सीधा निसाना साधा है? भाई साहब निसाना साधेंगे कैसे खुद ही बीके हुए हैं (एक-आध मीडिया अपवाद स्वरुप जरुर हैं पर अकेला चना भांड नहीं ...) .

सब लोग नेताओं की स्विस बैंक में अकाउंट की बात करते हैं ... कभी किसी ने ये पूछा है की आखिर कर पिछले १०-१५ वर्षों में NDTV ने अरबों-खरबों की संपत्ति कैसे बनाई है? कभी किसी ने ये पूछा की किस-किस मीडिया वालों के स्विस बैंक अकाउंट हैं?

मीडिया आज-कल दुमेहेंपण/दोगलेपन की शिकार हो गई है. एक मुह से कहती है आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता इसलिए इस्लामिक आतंकवाद नहीं बल्कि आतंकवद शब्द का प्रयोग करते हैं .... पर हिन्दू आतंकवाद कहने में मीडिया को कोई गुरेज नहीं.

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