गुरुवार, अगस्त 19, 2010

हंगाम है क्यों बरपा...



वीरेंद्र सहवाग। एक विस्फोटक बल्लेबाज। दुनिय भर के गेंदबाज उनके नाम से कांप जाते हैं। बहुत से लोग उनमें सचिन का अक्स देखते हैं। अब तक भारत के लिए 225 एक दिनी मैच खेल चुके हैं। सात हजार से अधिक रन बना चुके हैं। उन्होंने 12 शतक और 36 अद्र्धशतक लगाए हैं। टेस्ट क्रिकेट में तो उनका रिकॉड और भी अच्छा है। माना जाता है कि जब सहवाग बल्लेबाजी करते हैं तो भारतीय टीम के लिए खेलते हैं। उन्हें शतक और अद्र्धशतक की चिंता नहीं रहती। जब वह अपनी रौ में हों तो तभी आउट होते हैं जब वे खुद कोई गलती करें। शतक और अद्र्धशतक क्या दोहरे शतक के नजदीक होने पर भी वे दबाव में नहीं आते और तब भी छक्का लगा सकते हैं। ऐसा यूं ही नहीं कहा जाता। कई बार वे ऐसा करके दिखा भी चुके हैं।
लेकिन, यह क्या। सारी बातें धरी की धरी रह गईं। सहवाग शतक नहीं बना पाए तो यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया। क्यों भई? क्या सहवाग जैसा बल्लेबाज शतक के लिए इतना परेशान हो सकता है? मेरा व्यक्तिगत मानना है कि सहवाग जब चाहते हैं शतक लगा सकते हैं। दिक्कत ये है कि वे शतक की परवाह नहीं करते। एक दिनी और ट्वेंटी-20 क्रिकेट में बहुत कम देखने को मिलता है कि उन्हेंने जितने रन बनाए हो उससे ज्यादा गेंद खेली हों। लेकिन अब मेरी राय कुछ हद तक बदलने सी लगी है।
सचिन तेंदुलकर निर्विवाद रूप से देश के ही नहीं वरन् दुनिया के महान बल्लेबाज हैं। लेकिन उन पर अक्सर यह आरोप लगता रहता है कि वह टीम के लिए नहीं, रिकॉर्ड के लिए खेलते हैं। यह बात अलग है कि सचिन अब रिकॉर्ड के मोहताज नहीं बल्कि रिकॉर्ड उनके मोहताज हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि देसी या विदेशी किसी ने भी कभी भी सहवाग पर मजाक में ही सही यह आरोप लगाया हो।
मजे की बात तो यह है कि मैच के बाद सहवाग ने कहा कि श्रीलंकाई गेंदबाज ने हार से डर से उन्हें नो बॉल डाल दी। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इतने बड़े और विस्फोटक बल्लेबाज से इस तरह के बयान की उम्मीद कैसे की जा सकती है। क्या रंदीव के नो बाल डालने से श्रीलंका की हार टल गई। क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है कि लेकिन उस समय मैच की जो स्थिति थी, श्रीलंका के जीतने की संभावना कहीं से भी नहीं थी। फिर हार के डर से रंदीव नो बॉल कैसे फेंक सकते हैं।
सहवाग अभी लम्बे समय तक क्रिकेट खेलेंगे और शतक ही नहीं दोहरा शतक तक बनाने के अनेक मौके उनके पास आएंगे। उन्हें उस ओर ध्यान देना चाहिए। और अच्छा प्रदर्शन कर खुद के रिकॉर्ड की फिक्र किए बगैर भारत को जिताने पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि देश के लिए खेलने का मौका हर किसी को नहीं मिलता। उन्हें मौका मिला है तो अपने रिकॉड के लिए इतनी तुच्छ बात नहीं करनी चाहिए।
अब एक और महत्वपूर्ण बात, जो इस पूरे लेख को अपूर्ण करती है। मेरे यह सब लिखने का मतलब यह कतई नहीं निकला जाना चाहिए कि श्रीलंका ने जो किया वह ठीक किया। क्रिकेट को शायद इसलिए इतनी प्रसिद्धि मिली कि उसे भद्र जनों का खेल कहा जाता है। और श्रीलंका ने जो हरकत की वह निश्चित रूप से भद्र जनों वाली नहीं है। खेल को खेल की भावना से खेला जाना चाहिए। और यह बात श्रीलंका को ही नहीं भारत को भी ध्यान में रखना चाहिए। मेरा कहना और मानना सिर्फ इतना है कि पूरे मामले को इतना तूल नहीं दिया जाना चाहिए।
पूरे मामले में रंदीव को सजा मिल चुकी है उन्हें एक मैच के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। दिलशान का भी इसमें हाथ पाया गया इसलिए उन पर भी बैन लगाया गया है। संगकारा को भी चेतावनी दी गई है। यह सही है कि इन सब के बाद भी सहवाग की सेंचुरी वापस नहीं आ सकती पर सहवाग अगर अच्छा खेलेंगे तो फिर से शतक लगा सकते हैं।
अंत में बस इतना ही कहूंगा खेल का खेल ही रहने दो कोई नाम न दो....

7 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

खेल को खेल की भावना से खेला जाना चाहिए-यही बात बस ख्याल रखनी होगी.

DEEPAK BABA ने कहा…

अंतिम पंक्ति ही सटीक बैठती है...
खेल को खेल रहने दो.. कोई और नाम न दो
सुंदर लिखा..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

मिसिर जी, कहाँ गायब हो जाते हैं आप बीच बीच में... आजकल त आना भी छोड़ दिए हैं... खैर मन नहीं हो त हमरा कहला से आने का जरूरत नहीं है..अरे हम त बकवास करते ही रहते हैं...बढिया बात लिखेहैं..सहवाग जईसा बाल्लेबाज त ओइसहूँ इ सबका मोहताज नहीं है...आने वाला दिन में रेकॉर्ड उसके पीछे भागेगा...हमरा सुभकामना है उसके लिए..

प्रमोद जोशी ने कहा…

महत्वपूर्ण है मैच को जीतना। खिलाड़ियों के रिकॉर्ड उसके बाद हैं।

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! खासकर "खेल को खेल रहने दो" अत्यंत सुन्दर लगा! बिल्कुल सही विचार के साथ उम्दा प्रस्तुती!

क्या लिखू, क्या कहूं? ने कहा…

भाई... का हो गया है तुम्हे... आजकल सभी बातों में निगेटिव एस्पेक्ट क्यों खोज रहे हो... सहवाग का शतक ना बना पाना मुद्दा है, क्योंकि, जब आप देश के लिए इतना कुछ करते हो और दूसरे कि वजह से आपका नुकसान होता है तो वहीं देश तो आपके साथ खड़ा होगा ही, कि, क्यों नहीं बनने दिया सहवाग का शतक... श्रीलंका को पता था कि वो हार चुके हैं... जो खुंन्नस में सहवाग का शतक ही रोक दिया... इसलिए ये राष्ट्रीय मुद्दा बनकर सब जगह छा गया... फिर शतक रोकने वाला भी कौन? उनका अपना साथी... दिलशान... डेल्ही डेयरडेविल का साथी... इसलिए बात और भी गंभीर... विभीष्ण ने इस बार लंका नहीं... भारत को ढहा दिया... समझे...

lokendra singh rajput ने कहा…

माना वह देश के लिए खेलते हैं और हर किसी को खेलना भी चाहिए।, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं होना चाहिए की गलत बात का विरोध न किया जाए। जो हुआ वह गलत था, खेल भावना के विपरीत था। इस पर सहवाग ने जो कहा उसमें कोई गलती निकालने की आवश्यकता ही नहीं। हर कोई चाहता है कि देश के लिए खेलते समय उसका व्यक्तिगत रिकॉर्ड भी अच्छा बने। सो पकंज जी बहस व्यर्थ की है दोषी को सजा मिल गई यह भी एक जीत है। हां एक बात और है असली दोषी तो बच ही गया, उस पर भी एक मैच का प्रतिबंध लगना चाहिए था।

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