शनिवार, अगस्त 07, 2010

सीरीज सार : भारत बनाम श्रीलंका




भारत ने श्रीलंका के साथ खेली जा रही तीन टेस्ट मैचों की सीरीज ड्रा कराने में कामयाबी हासिल कर ली है। बड़ी बात यह कि इस जीत के साथ ही भारत की नम्बर एक की पदवी भी बरकरार रही। अब सीरीज समाप्त हो गई है लिहाजा जरूरी है कि इस दौरान क्या क्या हुआ इस पर विचार किया जाए।
पहली बात तो यह हुई कि धौनी की किस्मत एक बार फिर उनके साथ रही। धौनी ने अब तक अपनी कप्तानी में कोई भी सीरीज नहीं गंवाई है। इस बार भी यह रिकॉर्ड कायम रहा। मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि धौनी किस्मत के धनी हैं, इस बार भी ऐसा ही कुछ हुआ। दूसरी बड़ी बात टेस्ट क्रिकेट से मुरलीधरन जैसे दिग्गज का जाना रहा। उन्होंने दूसरे टेस्ट के बाद संन्यास ले लिया। इतने बड़े और खुशमिजाज स्पिनर की ऐसी की खूबसूरत विदाई होनी थी जैसी की हुई है। श्रीलंकाई टीम पर उनका जाना कितना असर करेगा यह बाद में पता चलेगा। फिलहाल क्रिकेट के चाहने वालों को उनकी कमी खलती रहेगी।
अब बात भारतीय बल्लेबाजों के प्रदर्शन की। इसमें मैं सचिन का प्रदर्शन शामिल नहीं करूंगा, क्योंकि वह निर्विवाद रूप से महान बल्लेबाज हैं और उन पर मैं कोई टिप्पणी करके खतरा मोल लेना नहीं चाहता। बात सुरेश रैना से करते हैं। उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया। उन्होंने पहले की टेस्ट में शतक लगाया और इसके साथ ही वे मोहम्मद अजहरुद्दीन, सौरभ गांगुली और वीरेंद्र सहवाग जैसे दिग्गजों के क्लब में शामिल हो गए। वे बाएं हाथ के बल्लेबाज हैं। उनमें कहीं न कहीं सौरभ गांगुली की झलक मिलती है। सौरभ जैसा जुझारूपन उनमें है कि नहीं यह वक्त और जरूरत के मुताबिक ही पता चलेगा, लेकिन फिलवक्त उन्होंने उज्ज्वल भविष्य की आशा तो जगा ही दी है। अब बात वीवीएस लक्ष्मण की। एकदिनी क्रिकेट में भले वे असफल करार दे दिए गए हों पर टेस्ट क्रिकट में उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि उनका कोई जवाब नहीं। अक्सर लोग सचिन और उनके प्रदर्शन की बात करते हैं पर लक्ष्मण को बिसरा दिया जाता है। लक्ष्मण की उम्र 37 के आसपास है और उनकी कलाइयों का इस्तेमाल अब भी देखते ही बनता है। तीसरे टेस्ट के चौथे दिन भारत को जीत के लिए 257 रन का लक्ष्य मिला। भारत ने दिन का खेल खत्म होने तक 53 रन पर तीन अहम विकेट गवां दिए तो लगा कि भारत यह मैच बचा पाएगा कि नहीं, लेकिन ऐसे समय में अक्सर संकटमोचन बन कर आने वाले लक्ष्मण ने फिर अपनी अहम भूमिका निभाई और भारत को जीत के दरवाजे तक पहुंचाया। लक्ष्मण के साथ दिक्कत यह है कि वे अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी लाइम लाइट में नहीं आ पाते। शायद उन्हें इसका हुनर भी नहीं मालूम। वह अब तक सचिन, सौरभ और यहां तक की धौनी आदि की तरह युवाओं के लिए आइडियल नहीं बन पाए। जबकि यह भी सही है कि लक्ष्मण की बैटिंग स्टाइल से युवाओं को बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। टीम के भीतर जितना मान सम्मान लक्ष्मण को मिलता है उतना बाहर नहीं मिला पाता। खैर, यह युवाओं का मामला है वे किसे माने और किसे नहीं।
अब बात राहुल द्रविण की। दीवार के उपनाम से पहचाने जाने वाले इस बल्लेबाज ने इस बार निराश किया। मुझे पता है कुछ ही दिन में उनको लेकर तरह-तरह की अटकलें लगनी शुरू हो जाएंगी। कहा जाएगा कि दीवार ढह गई है, दीवार टूटने लगी है। पूरी सीरीज की बात करें तो राहुल तीन टेस्ट मैचों की छह पारियों में मिलाकर भी शतक नहीं लगा पाए। वे 19 की मामूली सी औसत से कुल 95 रन ही बना सके। इससे पहले दक्षिण अफ्रीका के दौरे में भी राहुल कुछ खास नहीं कर पाए। पहले राहुल को आउट करने के लिए गेंदबाजों में शर्त लगती थी लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। अब कुछ रन बनाने के बाद उन्हें भी साधारण तरीके से आउट कर दिया जाता है। ऐसे समय में जबकि बहुत से युवा अच्छा प्रदर्शन कर टीम में शामिल होने की दावेदारी पेश कर रहे हैं बहुत संभव है कि टेस्ट क्रिकेट से उनकी जल्द विदाई कर दी जाए। हालांकि मैं खुद नहीं चाहता कि ऐसा हो। भारत को अभी उनकी जरूरत है। राहुल की सौरभ गांगुली की तरह भले जुझारूपन की मिसाल नहीं दी जाती हो पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि वे भी बहुत जुझारू हैं और आने वाले दिनों में कोई शानदार पारी खेलकर सबका मुंह बंद कर दें तो कोई बड़ी बात नहीं। याद करिए वह दौर जब भारत के पास कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं था जो अच्छी कीपिंग के साथ-साथ टीम के लिए रन भी जोड़ सके। ऐसे में राहुल ने यह भूमिका बखूबी निभाई। राहुल टीम में बाहर जाते हैं या वे अच्छा प्रदर्शन कर फिर टीम का अहम हिस्सा बन जाएंगे यह समय पर ही पता चलेगा।
भारत की बात यहीं तक अब बात श्रीलंका की। श्रीलंका में सिर्फ एक ही खिलाड़ी बात करूंगा और वह है सूरज रांदिव। वह ऑफ स्पिन गेंदबाजी करते हैं और युवा हैं। दिग्गज मुरली के बाद श्रीलंका को एक ऐसे स्पिन की जरूरत है, जिससे विरोधी टीम के बल्लेबाज खौफ खाएं। हालांकि अजंता मेंडिस अच्छी गेंदबाजी कर रहे हैं पर बल्लेबाजों में उनका खौफ नहीं दिखता। रांदिव ने अभी दो ही टेस्ट खेले हैं और दूसरे टेस्ट में ही उन्होंने पांच विकेट झटक लिए। खास बात यह कि इसमें सचिन तेंदुलकर का विकेट भी शामिल है। श्रीलंका के लिए जहां यह शुभ संकेत हो सकता है वहीं विरोधी टीमों के लिए खतरे की घंटी। संभव है कि अपने नाम की तरह सूरज सबसे बड़ा सितारा बन जाएं।
भारत को अब श्रीलंका में ही 10 से त्रिकोणीय सीरीज खेलनी है। इसमें तीसरी टीम न्यूजीलैंड की होगी। बहुत से खिलाड़ी भारत वापस लौट आएंगे वहीं कुछ को टीम का हिस्सा बनने श्रीलंका जाना है। तो अब टेस्ट के पांच के दिन के खेल से मुक्ति और अब लीजिए एकदिनी क्रिकेट का मजा।

ये पोस्ट यहां भी प्रकाशित हुई।

सीरीज सार : भारत बनाम श्रीलंका

भारत -श्रीलंका सीरिज़, क्या खोया -क्या पाया -पंकज मिश्र

7 टिप्‍पणियां:

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

अच्छा बिस्लेसन..

'उदय' ने कहा…

...सार्थक पोस्ट !!!

lokendra singh rajput ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत पारी आपकी शब्दों के साथ......... बधाई हो।
शुक्र है कि भारत अपनी लाज बचा गया वरना तो लुटिया डूब ही गई थी। लक्ष्मण का प्रदर्शन उम्दा रहा। उनके पॉपुलर न होने का एक ही कारण है कि वे लगातार अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जब उन्होंने अच्छे खेल का प्रदर्शन किया था तब वे भी बहुत वीवीएस लक्ष्मण से वैरी-वैरी स्पेशियल लक्ष्मण हो गए थे। दीवार को तो पता नहीं क्या हो गया है। आशा है फिर से दीवार मजबूत होकर प्रदर्शन करेगी।

Parul ने कहा…

:).. :) ... :)

बेचैन आत्मा ने कहा…

वन डे में तो लुटिया डूब चुकी लगती है...!

Babli ने कहा…

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बेनामी ने कहा…

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