सोमवार, मई 03, 2010

अजमल आमिर कसाब


अजमल आमिर कसाब। है तो एक आतंकी का नाम लेकिन आज उसे बच्चा बच्चा जानता है। बचपन में सुना था कि या तो बहुत अच्छे बन जाओ या फिर बहुत बुरे। जो बहुत अच्छा काम करते हैं या तो वे याद रखे जाते हैं या फिर दो दुष्टता की हद पार कर जाते हैं वे जाने जाते हैं। बाकी बीच के लोगों को कोई नहीं जानता। आज वह बात सही सी लग रही है। कसाब को बच्चा बच्चा इसलिए जानता है कि उसे जघन्यता की सारी हदें पार कर दीं। बहुत संभव है कि इसमें मीडिया का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। अखबारों और टीवी में उसकी खबरें खूब प्रमुखता से छापी और दिखाई गईं। और जब लगातार तीन दिन तक मुंम्बई पर आतंकी साया रहा तब तो लाइव दिखाया गया। लगातार लाइव। अब २४ घंटे में कोई समय तो एेसा आएगा ही जब बच्चा टीवी देखेगा कि कभी नहीं देखेगा। खैर यह मुद्दा नहीं है। मूल बात कुछ और ही है।
वही हुआ जिसकी उम्मीद थी और जो होना चाहिए था। अजमल आमिर कसाब को अदालत ने दोषी करार दे दिया है। यानी उसके ऊपर जो आरोप लगे वे सही हैं। अब बहस होगी कि उसे सजा क्या दी जाए। इस पर तरह तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि उसे मौत की सजा दे कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। कोई कह रहा है कि मौत की सजा से क्या होगा। उसे जिन्दा रख कर ऐसी सजा दी जाए जो वह याद रखे। अजमल तो खुद ही चाहता है कि उसे मार दिया जाए। कुछ लोगों को मत इससे हटकर है। उनका कहना है कि यह सब सजाएं तो किसी को भी मिल ही जाती हैं। पहले से चली आ रही हैं यानी परम्परागत सजाएं हैं। अजमल भारत के ऊपर अब तक के इतिहास में हुए सबसे बड़े हमले का आरोपी है। उसने 166 भारतीयों क जान ली है। इन 166 लोगों में विजय सालस्कर,हेमंत करकरे और अशोक काम्टे जैसे भारत के सपूतों को मार डाला हो। उसे कोई परम्परागत सजा कैसे मिल सकती है। इस जघन्य अपराध के लिए तो कोई नई सजा बनानी चाहिए, जिसे देख कर कोई भी कांप जाए और आतंक फैलाने वालों और उनका साथ देने वाले अपना काम करने से पहले सौ बार सोचें। अदालत को इसके लिए कुछ खास कदम उठाने चाहिए। उसी पिटी पिटाई लकीर पर चलकर कुछ नहीं होगा। इस तरह की परम्परागत सजा कितनों को मिली। कितनों को उम्रकैद दी गई और कितनों को फांसी की सजा दी गई। उससे क्या हुआ।
इन्हीं सब बातों के बीच एक सवाल मेरे जहन में भी कौंधा। सवाल यह कि अदालत ने अगर कसाब को दोषी माना है तो बहुत हद तक संभव है कि उसे उम्रकैद तो न ही हो। हो सकता है उसे फांसी की सजा दे दी जाए। लेकिन असल सवाल सही है कि क्या उसे फांसी पर लटकाया जा सकेगा। क्या अब तक आतंक फैलाने वालों को अदालत से फांसी की सजा दी गई उन्हें लटका दिया गया। क्या अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। यही भारतीय लोकतंत्र की कहें या किसी भी कहें विडम्बना है। वे सब अभी जिंदा हैं और शान से रह रहे हैं। यही नहीं जिस देश के खिलाफ उन्होंने षड्यंत्र रचा जिस देश के लोगों को उन्होंने माना उसी देश के लोगों की मेहनत की रोटी वे खा रहे हैं। उनके लिए सुरक्षाकर्मी भी तैनात किए गए हैं। बस यही सवाल मुझे परेशान कर रहा है। मैं खुद यह समझ नहीं पा रहा हूं कि अजमल आमिर कसाब को क्या सजा मिलनी चाहिए। क्या उसे मौत दे देनी चाहिए या फिर जिंदा रखकर ऐसा सबक सिखाना चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। कुछ भी हो लेकिन मेरा खुद का मानना भी यही है कि कुछ तो खास इस बार होना चाहिए। हालांकि, इस बात पर संतोष जाहिर किया जा सकता है कि यह केस मात्र ५२१ दिन में ही पूरा हो गया और उसे दोषी करार दिया गया। शायद यही कारण है कि लोगों में न्यायपालिका के प्रति थोड़ा बहुत सम्मान अभी बचा है। अगर सजा का निर्धारण भी जल्द कर लिया जाए और उसका क्रियान्वयन भी ध्रुत गति से हो तो शायद लोगों के मन में यह आए कि चलो कोई हो या न हो लेकिन न्यायपालिका अभी जिंदा है और उस पर भरोसा किया जा सकता है।
हालांकि, इस आपाधापी के जीवन में बहुत कम लोग एेसे होते हैं जो ब्लॉग के लेख को पूरा पढ़ते हैं। कुछ लोग चार लाइनें पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं। यह जरूरी नहीं कि जो टिप्पणी कर रहा है उसने पूरी पोस्ट पढ़ी ही हो। फिर भी मेरा फर्ज है इसलिए लिख रहा हूं कि अगर आपने पूरी पोस्ट पढ़ी है और टिप्पणी करने का मन कर रहा है तो कृपया कम से कम इस पोस्ट पर चलताऊ टिप्पणी न करें। अगर हो सके तो यह बताएं कि अजमल आमिर कसाब को क्या सजा दी जा सकती है। क्या हो सकता है। हालांकि यह बहुत छोटा मंच है। यहां लिखने से कोई खास फर्क पडऩे वाला नहीं है। जो न्यायाधीश इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं वह इस ब्लॉग को नहीं पढ़ेंगे और मैं कहता हूं पढ़ भी लें तो आपके कहने से सजा का निर्धारण नहीं करेंगे। लेकिन फिर भी यह मामला चुंकि बहुत संवेदनशील है इसलिए उतनी ही संवेदनशीलता से ही टिप्पणी कीजिएगा। कुछ समझ में न आए तो कुछ मत कीजिएगा पर फिर वही बात कहूंगा कि चलताऊ टिप्पणी कृपया इस पोस्ट पर न करें।

8 टिप्‍पणियां:

BINDASS ने कहा…

jante hkyon likh rhe ho. frk to padta hai ji....

lokendra singh rajput ने कहा…

बहुत शानदार......
दोस्त मेरा मत तो यह है की....
ऐसे कमीने लोगों को बीच चौराहे उल्टा टांग कर.... जनता के हवाले कर देना चाहिए और फिर जनता दुनिया को बताएगी की ऐसे पापिओं को कैसी सजा मिलनी चाहिए......

neeraj ने कहा…

कसाब को तो होटल ताज के बाहर फांसी दे दी जानी चाहिए

Jitender 'Jeet' ने कहा…

बहुत बढ़िया......
ऐसे लोगों को तत्काल फांसी दे देनी चाहिए
फांसी देने का अधिकार उन लोगों को देना चाहिए जिनके परिजनों को कसाब ने मारा था।
मैं नीरज जी की बात से भी सहमत हूँ। ऐसे लोगों को ताज के बाहर सरेआम फांसी पर लटका देना चाहिए।

bundelkhand life ने कहा…

acha lika kitabe or pado jab bhi time mele

Dr. Subhash Rai ने कहा…

pakaj, achchha likh rahe ho. roj ek post dal diya karo. chhoti bhi ho to chalegi. shubhkamnayen.

सूर्य गोयल ने कहा…

अजमल आमिर कसाब। है तो एक आतंकी का नाम लेकिन आज उसे बच्चा बच्चा जानता है। बचपन में सुना था कि या तो बहुत अच्छे बन जाओ या फिर बहुत बुरे। जो बहुत अच्छा काम करते हैं या तो वे याद रखे जाते हैं या फिर दो दुष्टता की हद पार कर जाते हैं वे जाने जाते हैं।

बहुत ही बढ़िया लेने. रही बात कसाब को फांसी देने की तो मै इस बात का समर्थन करता हूँ की उसको ताज होटल के बहार की फांसी देनी चाहिए. जिससे आतंक फ़ैलाने वालो को भी पता लगे की भारत में आतंक फ़ैलाने की क्या सजा मिलती है. अगर अबकी बार कसाब के साथ ऐसा नहीं किया गया तो आतंकियों को यह सन्देश देने में भारत के हाथ आया मौका छुट जायेगा. कभी समय मिले तो मेरी गुफ्तगू में भी शामिल होने का कष्ट करे.
www.gooftgu.blogspot.com

Mahendra Arya ने कहा…

अजमल कसब का दंड? फांसी देना उसे मुक्ति देने जैसा है.उसे आजीवन कारावास की सजा मिलनी चाहिए.लेकिन असाधारण कारावास.जिस में उसे किसी से मिलने की इजाजत न हो . कोई काम न करे. २४ घंटे उसके सेल में एक बड़े स्क्रीन पर वो तमाम दहशत की तस्वीरें चलती दिखे जो सारे हिंदुस्तान ने उन तीन दिनों में लगातार देखी थी. और किसी भी हालत में उसे उम्र पूरी होने से पहले मरने नहीं दिया जाये.

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